Skip to main content

Posts

कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह

वैसे तो यह टाइटल युवा कथाकार अनुज जी के कहानी संग्रह और उसमें पहली कहानी का है, लेकिन इस समय जो किस्सा मैं यहां कहने जा रहा हूं, उसके लिए मुझे यह बिल्कुल सटीक लगा। जिन लोगों ने यह कहानी पढ़ी है वो समझ ही गए होंगे कि मैं राजधानी के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के 'विद्रोही जीÓ की बात करने जा रहा हूं। अनुज जी की कहानी भी पीडीएफ के रूप में इस आलेख के आखिर में दे रहा हूं।     रमाशंकर यादव विद्रोही को जेएनयू में गोपालन जी की लाईब्रेरी कैंटीन में बैठे हुए अक्सर देखा जा सकता है। बहुत से नए आने वाले लोग उन्हे पागल के तौर पर ही पहचानते हैं, तो कुछ वामपंथी मित्रों के लिए वे एक ऐसे शख्स हैं जो दुनिया बदलने की कोशिश में दुनिया से ही बेगाने हो गए। विद्रोही से पिछले महीने तक मेरा कोई परिचय नहीं था, उनके बारे में जानने की उत्सुकता तो बहुत हुई, पर कभी उनसे पूछने का साहस नहीं जुटा पाया। अभी कल रात को ही, बीबीसी की वेबसाइट पर उनकी तस्वीर देख और नाम पढ़कर चौंक सा गया। धक्का सा लगा कि यही वो विद्रोही जी हैं, जिनके बारे में काफी कुछ सुना व पढ़ा है। खबर यह है कि पिछले हफ्ते विश्वविद्यालय ...

जनता से रूबरू करवाती: पीपली लाइव

१५ अगस्त पर राजधानी में हुई बारिश के बाद लोग अपने घरों में दुबके हुए थे, प्रधानमंत्री भी लालकिले पर औपचारिकता पूरी करके वापिस लौट चुके थे। और युवाओं को शाम का इंतज़ार था, जब वे आजादी के नाम शाम का जश्र करेंगे। ऐसे में हम जा पंहुचे राजधानी के एक लो-प्रोफाइल सिनेमा हॉल में, आमिर खान की नई आई फिल्म पीपली लाइव देखने, अफवाह थी कि इस फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया है, लेकिन सिनेमा हॉल में उमड़ी हुई भीड़ इस अफवाह को सिरे से नकार रही थी।     पीपली लाइव, मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव पीपली में रहने वाले नत्था की कहानी है। सरकारी ऋण न चुका पाने के कारण नत्था की जमीन डूबने वाली होती है। तभी एक छुटभैय्ये से उसके भाई को विदर्भ के किसानों की आत्महत्याओं के विषय में पता चलता है, और साथ ही यह भी कि सरकार मरने वाले किसानों के परिवार को लाख रुपए मुआवजा भी दे रही है। दोनो भाइयों में बहस के बाद फैसला होता है कि नत्था जमीन बचाने के लिए आत्महत्या करेगा। सूबे के एक लोकल अखबार का रिपोर्टर राकेश इस खबर को लपक लेता है, और जल्द ही यह खबर राजधानी के सबसे बड़े टीवी चैनल पर हाईलाइट हो जाती है। उस...

आज कुछ यूं हुआ कि

" यह कविता 'NK' कहलाने वाली उस लडकी के लिये लिखी गई थी जिसकी सुनहरी गहरी आखों में यह कवि अनंत तक डूबे रहने का इच्छुक था... "  आज कुछ यूं हुआ कि बीते समय की परछाईयां यूं ही चली आईं लगा कुछ ऐसा जैसे 'कल’ जिसे हमने साथ जीया था बस पल में सिमट भर रह गया हो। वो जेएनयू का सपाट सा रास्ता तुम्हारी सुगंध से महकता हुआ, नहीं-नहीं, वो तो बासी रजनीगंधा की बेकरार सी एक महक थी! वो कोने वाली कैंटीन की मेज जहां तुम बैठा करती थीं, कुछ झूठे चाय के कप, सांभर की कटोरी वहां अब भी रखे हुए हैं! डीटीसी की बस की कोने की सीट जहां तुम्हारे सुनहरे बाल और आंखे, धूप में चमका करते थे, अब वहां बस मैं अकेला बैठता हूं! वो दिन, जब हम पहली बार मिले थे, वो कूड़े वाला पासपोर्ट, वो बस के बोनट पर बैठ मुस्कुराती सी तुम तुम्हारा साथ, अब सब स्मृति तस्वीर में तुम्हारा साथ न आना दूर दूर चलते जाना वो लंबी बेचैनी , वो तन्हा थे दिन तुम्हारे लिए, मैने उम्मीद को जिंदा बनाए रखा, लगता था मुझे तुम आओगी पास ...

बेरंग महोत्सव

  थिएटर देखने का मन बहुत दिनो से कर रहा था, कारण भी था, जब से सुरेश शर्मा जी ने इंटरव्यू बाइट लेते हुए अपनी महानता की झिड़की दी थी तब से इस माध्यम से मोह-भंग सा होता हुआ प्रतीत हुआ था। भोपाल के थिएटर कलाकार होणाजी भाई ने अभी कुछ ही दिन पहले सूचना दी कि वे रंग महोत्सव में भाग लेने के लिए दिल्ली आ रहे हैं, तब जाकर ही थिएटर की ओर फिर से ध्यान गया। और बस जा पंहुचे बहवालपुर हाउस में स्थित एनएसडी कार्यालय।     जैसे ही टिकट काउंटर के नजदीक पंहुचे तो देखते क्या हैं, एक लंबी सी तटस्थ क्यू। सोवियत रूस के अंतिम दिनों में राशन के लिए इस तरह की क्यू लगा करती थीं। यहां फर्क सिर्फ इतना है कि कला-दर्शन की अपनी क्षुधा शांत करने के लिए लोग कतार में लगे हुए थे किसी भी कीमत पर मनपसंद नाटक का एक टिकट पाने की ललक में। लेकिन अफसोस सुबह से शाम तक क्यू में लगे रहने के बाद भी नंबर नहीं आया, आशुतोष ने तिकड़म भिड़ाई और दो सज्जनों को पटा कर उनके जरिए चार टिकटों का इंतजाम करवा लिया। मनपसंद नाटक तो नहीं मिले पर जो मिले वो ही सही। आखिर नाटक करने वाले भी इंसान हैं कितने शो करेंगे एक ही नाटक के, क...

मेरी शिक्षा-तेरी शिक्षा

फिर से एग्ज़ाम शुरु होने वाले हैं, रोज-रोज की इस बला से अब उक्ताहट भी होने लगी है। कभी-कभी लगता है कि एग्ज़ाम बंद हो जाने चाहिएं, लेकिन फिर सोचता हूं कि बौद्धिक स्तर को जांचने का इससे बेहतर विकल्प और क्या हो सकता है। शायद यही कारण है कि शिक्षाविद एग्जाम्स को आउट-कास्ट करने से बचते रहे हैं, लेकिन क्या वाकई?     इम्तिहान या एग्ज़ाम ऐसे दानव का नाम है जो शुरु से बच्चों को डराता आया है। कारण शायद विषय पर कमजोर पकड़ भी या फिर कम समय में बहुत ज्यादा ठूंसने की मजबूरी, या फिर फेल हो जाने का डर। एग्जाम सिरदर्द ज्यादा बनते हैं, बच्चों के लिए भी और शिक्षकों के लिए भी। कोर्स खत्म करवाने से लेकर, उत्तर जांचने सरीखे बहुत से काम होते हैं जो परेशानी का सबब बनते हैं। इतनी सारी परेशानियां होते हुए भी एग्जाम सबसे ज्यादा उम्दा तरीका समझा जाता है। इसके बहुत से कारण हो सकते हैं, सबसे प्रमुख तो यह कि हमारे देश में कोई एकीकृत शिक्षा प्रणाली नहीं है, डीपीएस जैसे स्कूल होने के बावजूद भी बच्चे गांवों और कस्बों के इंटर कॉलेजों में जाया करते हैं! वाकई कितनी अजीब बात है, मैरी अंतोनेत जिंदा होती त...

गलियों में बसी मेरी दिल्ली

जैसे रात के घने सन्नाटे के बाद प्रभात के आदित्य की पहली किरणें धरती का आलिंगन करती हैं, कुछ उसी तरह का अहसास मुझे इतने दिनों के बाद कलम उठाते हुए हो रहा है। बहुत से किस्से हैं बांटने के लिए, आप सोच रहे होंगे कि दिल्ली की गलियों का मेरे किस्सों से क्या संबंध? लेकिन पुरानी दिल्ली की गलियां कहीं न कहीं मुझे सम्मोहित करती रही हैं, कारण शायद यह भी कि यह मुझे मेरे शहर **** की याद तो दिलाती ही हैं लेकिन न जाने क्यों हर बार किसी न किसी तरह से मुझे एक किस्सा भी दे जाती हैं।     आप यह जानने को उत्सुक होंगे कि आखिर वो कौन सी वजह रही जो मुझे इतने दिन कलम उठाने से दूर रखे रही? वजह कुछ बड़ी थी, इस सेमेस्टर में हमें ईवेन्ट प्लान करने होते हैं। मैं कॉरपोरेट ईवेंटस में विश्वास नहीं रखता, इसलिए सोचा कि क्यों न कुछ कलात्मक ईवेंट प्लान करूं! नतीजा सामने था, फोटोग्राफी एक्जीवीशन। शुरुआत में सोचा था कि खुद का पैसा लगाकर इसे कामयाब बनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन फिर वीडियोकॉन, बीएचईएल, और ऑलटरनेटिव पैट्रोलियम टेक्रोलॉजिस से हमे मदद मिल गई। मदद भी इतनी मिली कि इस ईवेन्ट को हम पूरे दिल्ली के ले...

हाय रे ऑटो

उम्मीद है कि आज रात ऑटो चालकों की दिल्ली में दो दिनो से जारी हड़ताल भी खत्म हो जाएगी। साथ ही हम यह भी उम्मीद करते हैं कि ट्रैफिक पुलिस के जिस भ्रष्ट रवैये को लेकर यह हड़ताल हुई थी, उस पर भी कुछ नकेल कसी जाएगी। लेकिन इस हड़ताल के और भी कई पहलू ऐसे थे, जिन पर विचार कर लेना जरूरी है।     ट्रैफिक पुलिस का रौब-दाब आपको जबतब दिल्ली की सड़कों पर दिख ही जाएगा। ठीक भी है, बहुत से अनुशासन-हीन चालकों पर लगाम लगनी ही चाहिए। लेकिन परेशानी तब होती है जब ट्रैकिफक पुलिस अपनी वर्दी का नाजायज इस्तेमाल करती है। अपनी पॉकेट गर्म करने के लिए वो बेमतलब चालान काटती है। अब ऐसे में अगर कोई ऑटो वाला इस सब में फंस जाए तो एक बार में ही उसकी पूरे महीने की कमाई चली जाती है। इस सारी भ्रष्ट-तंत्र के खिलाफ ही यह आज की और कल की हड़ताल थी।     वैसे हड़तालों से परेशानी तो होती है, खास तौर से तब ,जब बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने वाले संस्थान मसलन स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन या जल/विद्युत वितरण से संबंधित संस्थाएं जब हड़ताल पर चले जाते हैं। हड़तालें जरूरी भी हैं, जब अत्याचार ही कानून की शक...