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नेरूदा से दानिलोव तक

पाठक मित्रों, दिल का भारीपन और बोझ वाकई बेहद कश्टकारी अवस्था है। लेकिन ऐसे समय में भी इंसान नेरूदा की ओर देख सकता है, उनके विशाद गीतों से सहारा पा सकता है। नेरूदा ने इस भयंकर वक्त में भी प्रेम के विभिन्न स्वरूपों को आनंद उठाया, उसके उल्लास में, उसके विशाद में गीत, सोनेट और कविताएं लिखीं। विचारधारा की बात अलग है, आप अपनी विचारधारा खुद चुनते हैं पर कुछ चीजें कुछ वर्ग ऐसे होते हैं कि आप न चाहते हुए भी उनमें शामिल हो जाते हैं। कोई ऐसा शख्स ढूंढ कर दिखाइये जो प्रेम से नफरत करता हो, या फिर ऐसा न चाहता हो कि कोई तो उससे भी प्रेम करे, मेरे ख्याल से ऐसे इंसान विरले ही मिलें। लेकिन अफसोस हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां प्रेम का सर्वथा अभाव है। बेहद प्रगतिशील विचारों में, यूटोपियन विचार वैसे प्रेम को लेकर उदासीन तो नहीं हैं, लेकिन मेरा ऐसा मानना है जिस ‘‘आइडिया इन प्रेक्सिस’’ का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, मार्क्स से लेकर हम तक सभी लोग इसी बात को कहते आए हैं कि महज विचार बन जाने से समाज बदल नहीं जाता, इसे बदलने के लिए मैदान में डटना पडता है, पुरानी व्यवस्था को ध्वस्त करना होता है। लेकिन प्रेम की ...

यूटोपिया का चस्का

कई बरस हो गए राहुल जी की एक पुस्तक पढ़ी थी, ‘‘साम्यवाद ही क्यों’’, बहुत प्रेरणा देने वाली पुस्तक या यूं कह लीजिए पुस्तिका थी। राहुल दा के बाद आए बहुत से प्रकांड विद्वानो ने यहां तक कि प्रोग्रेसिव विद्वानो ने भी इस पुस्तिका को यूटोपियन बताकर इसकी आलोचना की थी। लेकिन सच मानिए तो इस पुस्तिका ने मेरे विकसित होते युवा मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। नौकरी करना एक अच्छी बात है, पैसा कमाना और भी अच्छी बात है, लेकिन ऐसा भी क्या पैसा क्या नौकरी कि आपका पूरा वक्त पूरी जिंदगी बस उन्ही की गुलाम बन कर रह जाए। राहुल दा ने एक बात लिखी थी, कि ऐसा समय भी आएगा ‘‘जब इंसान का एक घंटे का श्रम उसके लिए पूरी जिंदगी की रोटी की व्यवस्था कर देगा।‘‘ इस पोस्ट को पढ़ने वालों को मैं मूरख प्रतीत हो सकता हूं,। लेकिन इससे भी एक बात तो साफ हो ही जाती है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां इस तरह की बातें सोच पाना तक असंभव समझा जाता है, और ऐसा सोचने वालों को यूटोपीयन घोषित कर समाज से अलग-थलग करने की पूरी कोशिश की जाती है। कहा यह जाता है कि मुझ जैसे लोग बस हर वक्त अपनी कल्पनाओं में खोए रहने वाले ‘‘धुनिराम‘‘ हैं, हमें डोन किखोते ...

कुछ तो लिखूं

वैसे लिखना बहुत दिनों से ही चाह रहा हूं, कॉम्‍नवैल्‍थ के ऊपर बहुत सा विक्षोभ प्रकट करना था, फिर आई रामलीला तो उस पर भी एक अच्‍छा आलेख तैयार करने का सोचा था, दिवाली पर भी कहने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन हाय रे आलसीपन बीते दो महीने से कुछ भी नहीं लिखा, एक शब्‍द भी नहीं टिपटिपाया। शीतल जी भी अक्‍सर कुछ अच्‍छा पढने की चाह में मेरे ब्‍लाग का चक्‍कर लगाती थीं, लेकिन निराशा ही उनके हाथ लगती थी। लेकिन वे निरंतर मुझे लिखने के लिए कहती रहती थीं। चलिए इस लंबी आलस से भरी हुई चुप्‍पी के बाद कुछ बात करते हैं, भारीभरकम मुदृदों को कुछ और पल आराम के दे देते हैं। चलिए आज के पूरे दिन की बात करते हैं। ज्‍यों-ज्‍यों धरती हमारी सूरज से दूरियां बढाने में जुटी है, त्‍यों-त्‍यों जिंदगी की तरह दिन भी कुछ ज्‍यादा ही सर्द महसूस होने लगे हैं। सर्दी के कपडे बाहर निकलने को तैयार, और हाफ बाजू बुशर्ट को अगले साल तक के लिए विदा। सुबह आज इन्‍ही जरूरी कामों के साथ हुई। वैसे इन दिनों किताबों से ज्‍यादा फिल्‍मों से दोस्‍ती कर रखी है, साथी कोंपल ने कोई दो-एक साल पहले एक फिल्‍म क्‍लब बनाने का जिक्र किया था, वो तो बन नहीं पाया...

कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह

वैसे तो यह टाइटल युवा कथाकार अनुज जी के कहानी संग्रह और उसमें पहली कहानी का है, लेकिन इस समय जो किस्सा मैं यहां कहने जा रहा हूं, उसके लिए मुझे यह बिल्कुल सटीक लगा। जिन लोगों ने यह कहानी पढ़ी है वो समझ ही गए होंगे कि मैं राजधानी के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के 'विद्रोही जीÓ की बात करने जा रहा हूं। अनुज जी की कहानी भी पीडीएफ के रूप में इस आलेख के आखिर में दे रहा हूं।     रमाशंकर यादव विद्रोही को जेएनयू में गोपालन जी की लाईब्रेरी कैंटीन में बैठे हुए अक्सर देखा जा सकता है। बहुत से नए आने वाले लोग उन्हे पागल के तौर पर ही पहचानते हैं, तो कुछ वामपंथी मित्रों के लिए वे एक ऐसे शख्स हैं जो दुनिया बदलने की कोशिश में दुनिया से ही बेगाने हो गए। विद्रोही से पिछले महीने तक मेरा कोई परिचय नहीं था, उनके बारे में जानने की उत्सुकता तो बहुत हुई, पर कभी उनसे पूछने का साहस नहीं जुटा पाया। अभी कल रात को ही, बीबीसी की वेबसाइट पर उनकी तस्वीर देख और नाम पढ़कर चौंक सा गया। धक्का सा लगा कि यही वो विद्रोही जी हैं, जिनके बारे में काफी कुछ सुना व पढ़ा है। खबर यह है कि पिछले हफ्ते विश्वविद्यालय ...

जनता से रूबरू करवाती: पीपली लाइव

१५ अगस्त पर राजधानी में हुई बारिश के बाद लोग अपने घरों में दुबके हुए थे, प्रधानमंत्री भी लालकिले पर औपचारिकता पूरी करके वापिस लौट चुके थे। और युवाओं को शाम का इंतज़ार था, जब वे आजादी के नाम शाम का जश्र करेंगे। ऐसे में हम जा पंहुचे राजधानी के एक लो-प्रोफाइल सिनेमा हॉल में, आमिर खान की नई आई फिल्म पीपली लाइव देखने, अफवाह थी कि इस फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया है, लेकिन सिनेमा हॉल में उमड़ी हुई भीड़ इस अफवाह को सिरे से नकार रही थी।     पीपली लाइव, मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव पीपली में रहने वाले नत्था की कहानी है। सरकारी ऋण न चुका पाने के कारण नत्था की जमीन डूबने वाली होती है। तभी एक छुटभैय्ये से उसके भाई को विदर्भ के किसानों की आत्महत्याओं के विषय में पता चलता है, और साथ ही यह भी कि सरकार मरने वाले किसानों के परिवार को लाख रुपए मुआवजा भी दे रही है। दोनो भाइयों में बहस के बाद फैसला होता है कि नत्था जमीन बचाने के लिए आत्महत्या करेगा। सूबे के एक लोकल अखबार का रिपोर्टर राकेश इस खबर को लपक लेता है, और जल्द ही यह खबर राजधानी के सबसे बड़े टीवी चैनल पर हाईलाइट हो जाती है। उस...

आज कुछ यूं हुआ कि

" यह कविता 'NK' कहलाने वाली उस लडकी के लिये लिखी गई थी जिसकी सुनहरी गहरी आखों में यह कवि अनंत तक डूबे रहने का इच्छुक था... "  आज कुछ यूं हुआ कि बीते समय की परछाईयां यूं ही चली आईं लगा कुछ ऐसा जैसे 'कल’ जिसे हमने साथ जीया था बस पल में सिमट भर रह गया हो। वो जेएनयू का सपाट सा रास्ता तुम्हारी सुगंध से महकता हुआ, नहीं-नहीं, वो तो बासी रजनीगंधा की बेकरार सी एक महक थी! वो कोने वाली कैंटीन की मेज जहां तुम बैठा करती थीं, कुछ झूठे चाय के कप, सांभर की कटोरी वहां अब भी रखे हुए हैं! डीटीसी की बस की कोने की सीट जहां तुम्हारे सुनहरे बाल और आंखे, धूप में चमका करते थे, अब वहां बस मैं अकेला बैठता हूं! वो दिन, जब हम पहली बार मिले थे, वो कूड़े वाला पासपोर्ट, वो बस के बोनट पर बैठ मुस्कुराती सी तुम तुम्हारा साथ, अब सब स्मृति तस्वीर में तुम्हारा साथ न आना दूर दूर चलते जाना वो लंबी बेचैनी , वो तन्हा थे दिन तुम्हारे लिए, मैने उम्मीद को जिंदा बनाए रखा, लगता था मुझे तुम आओगी पास ...

बेरंग महोत्सव

  थिएटर देखने का मन बहुत दिनो से कर रहा था, कारण भी था, जब से सुरेश शर्मा जी ने इंटरव्यू बाइट लेते हुए अपनी महानता की झिड़की दी थी तब से इस माध्यम से मोह-भंग सा होता हुआ प्रतीत हुआ था। भोपाल के थिएटर कलाकार होणाजी भाई ने अभी कुछ ही दिन पहले सूचना दी कि वे रंग महोत्सव में भाग लेने के लिए दिल्ली आ रहे हैं, तब जाकर ही थिएटर की ओर फिर से ध्यान गया। और बस जा पंहुचे बहवालपुर हाउस में स्थित एनएसडी कार्यालय।     जैसे ही टिकट काउंटर के नजदीक पंहुचे तो देखते क्या हैं, एक लंबी सी तटस्थ क्यू। सोवियत रूस के अंतिम दिनों में राशन के लिए इस तरह की क्यू लगा करती थीं। यहां फर्क सिर्फ इतना है कि कला-दर्शन की अपनी क्षुधा शांत करने के लिए लोग कतार में लगे हुए थे किसी भी कीमत पर मनपसंद नाटक का एक टिकट पाने की ललक में। लेकिन अफसोस सुबह से शाम तक क्यू में लगे रहने के बाद भी नंबर नहीं आया, आशुतोष ने तिकड़म भिड़ाई और दो सज्जनों को पटा कर उनके जरिए चार टिकटों का इंतजाम करवा लिया। मनपसंद नाटक तो नहीं मिले पर जो मिले वो ही सही। आखिर नाटक करने वाले भी इंसान हैं कितने शो करेंगे एक ही नाटक के, क...