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हाय रे ऑटो

उम्मीद है कि आज रात ऑटो चालकों की दिल्ली में दो दिनो से जारी हड़ताल भी खत्म हो जाएगी। साथ ही हम यह भी उम्मीद करते हैं कि ट्रैफिक पुलिस के जिस भ्रष्ट रवैये को लेकर यह हड़ताल हुई थी, उस पर भी कुछ नकेल कसी जाएगी। लेकिन इस हड़ताल के और भी कई पहलू ऐसे थे, जिन पर विचार कर लेना जरूरी है।     ट्रैफिक पुलिस का रौब-दाब आपको जबतब दिल्ली की सड़कों पर दिख ही जाएगा। ठीक भी है, बहुत से अनुशासन-हीन चालकों पर लगाम लगनी ही चाहिए। लेकिन परेशानी तब होती है जब ट्रैकिफक पुलिस अपनी वर्दी का नाजायज इस्तेमाल करती है। अपनी पॉकेट गर्म करने के लिए वो बेमतलब चालान काटती है। अब ऐसे में अगर कोई ऑटो वाला इस सब में फंस जाए तो एक बार में ही उसकी पूरे महीने की कमाई चली जाती है। इस सारी भ्रष्ट-तंत्र के खिलाफ ही यह आज की और कल की हड़ताल थी।     वैसे हड़तालों से परेशानी तो होती है, खास तौर से तब ,जब बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने वाले संस्थान मसलन स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन या जल/विद्युत वितरण से संबंधित संस्थाएं जब हड़ताल पर चले जाते हैं। हड़तालें जरूरी भी हैं, जब अत्याचार ही कानून की शक...

धुंध के साए में बारिश

आसमान में घने बादल छाए हुए थे, रह रहकर बूंदे भी पड़ रहीं थीं, ऐसा लग रहा था कि तेज बारिश होने वाली है। साउथ कैंपस के अहाते में पड़ी बेंचों पर बैठे कुछ दोस्त आपस में बतिया रहे थे। कॉफी के सिपों के बीच बातचीत का दौर चल ही रहा था कि तभी अतुल वहां आ धमका, और उन सब के बीच जा बैठा। अतुल के आते ही सब के चेहरे फक्क पड़ गए। और जैसे कि उम्मीद थी अतुल ने आकर देश-विदेश की राजनीति को मुद्धा बनाकर डिंपल की टांग खींचनी शुरु की। इस सब से उक्ता डिंपल सब से विदा लेकर वहां से चली गई।     अतुल कुछ बरस पहले ही दिल्ली आया था और पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था। इन दिनों सिर्फ एक कोर्स कर के पत्रकार बना जा सकता है, उसके लिए गहन अनुभव होने की जरूरत नहीं है। अतुल के अंदर भी  एक नामी पत्रकार बनने की तीव्र आकांक्षा थी। वो पत्रकारिता के दिग्गजों का अनुसरण करने का प्रयास करता रहता। ऐसे में बहुत सी चीजों को लेकर उसकी एक अजीब सी समझ बन गई थी। खुद ग्रामीण परिवेश से होने के बावजूद इतने बड़े स्तर पर फैली गरीबी उसे विचलित नहीं कर पाती थी। न ही इस बारे में वो बहुत ज्यादा चिंता करता था। उसे बस अपनी का...

बारिश

बारिश के  उस दिन, कीचड़-पानी भरे फ्लाईओवरों के नीचे से निकलते हुए किसी तरह मैं और साथी महावीर बस पकडऩे में कामयाब हो गए। बारिश भरी सड़कों को चीरते हुए बस अपने गंतव्य की ओर सरकती जा रही थी, और मुझे इस बात पर खुशी हो रही थी कि कम से कम मुझे उन पानी भरी सड़कों को पैदल चल कर पार नहीं करना पड़ रहा था। मैं बाहर फैले प्रकृति के असीम नजारों को देखने में व्यस्त था कि तभी महावीर ने मुझे सामने वाली सीट पर जाकर बैठने को कहा, जहां वो लड़की बैठी हुई थी। जैसे ही मैं वहां पंहुचा, वो उठकर मेरी सीट पर आ गई, और मुझे उस सीट पर पहले से ही बैठे महानुभाव के साथ बैठना पड़ गया। बीच-बीच में अपनी उपस्थति दर्ज करवाने के लिए वे व्यर्थ की बकवास करने से भी नहीं चूकते थे। मैं काफी देर तक कंफ्यूसन में पड़ा रहा कि आखिर महावीर नें उस लड़की को मेरी सीट पर क्यों शिफ्ट करवा दिया? और जब बस से उतरते वक्त महावीर ने उस लड़की को समझाया कि, उसे लोगों की बदसलूकी का जवाब देना आना चाहिए, तब जाकर सारी बात समझ में आई।     वाकई ऐसे महानुभावों को देखकर विक्षोभ की अनुभूति होती है, जो भीड़ भरी बसों में महिलाओं के ...

आधी आबादी

दुनिया की आधी आबादी! क्यों क्या हुआ, पड़ गए न सोच में, जी हां हम मानवजाति के आधे हिस्से यानी कि महिलाओं के बारे में ही बात कर रहे हैं। पार्टियों के दफ्तरों से लेकर संसद की सभाओं तक, मंचों से लेकर अखबारों के कलम-नवीसों तक और अब तो गली के हर नुक्कड़ वाले घर में भी, सिर्फ महिला सशक्तिकरण की ही चर्चाएं हो रहीं हैं। अब ऐसे में मैने भी सोचा चलो हम भी कुछ खामख्याली कर ही लें, शायद कोई भूला-भटका मुसाफिर मेरे लिखे को भी पढ़ ही ले। फिर भई डेमोक्रेसी है, मुझे भी तो बोलने का, अपनी बात सब के आगे कहने का पूरा हक है, तो यह मौका हाथ से जाने क्यों दूं।     आप लोग सोच रहे होंगे कि पिछले कई दिनों से न तो इस मुद्धे पर संसद में बहस हो रही है, न अखबार इस पर कोई बहुत ज्यादा लिख रहे हैं, तो फिर इसे फालतू में अपनी कलम घिसने की क्या पड़ी है। लेकिन आपसे झूठ नहीं बोलूंगा, मैं ऐसा पत्रकार नहीं हूं जो हर वक्त हवा के साथ उडऩे की ही सोचता है, मुझे तो बहाव के विपरीत तैरने में ज्यादा मजा आता है। और यह मुद्धा कुछ ऐसा है जिसने मुझे बीते काफी समय से झकझोर कर रखा हुआ है।  हम महिलाओं को ३३ फीसदी आरक्ष...

राजू जोकर

क्या किसी ने सोचा है कि जो जोकर पूरी दुनिया को हंसाता है, उसके खुद के दिल में ही कितना गम भरा पड़ा है, या फिर क्या हमने उस कवि के बारे में सोचा है, जिसकी कविताएं एक नई दुनिया का सपना देखती हैं, उसकी यथार्थ की जिंदगी कैसे रही होगी। नहीं हम ऐसा नहीं सोच सकते क्योंकि हमारी सोच तो बस उसके उसी स्वरूप तक सिमट कर रह जाती है, जैसा वो हमारे सामने नज़र आता है।     हां-हां आप ठीक समझे, राजकपूर की, मेरा नाम जोकर देख कर ही इस टिप्पणी को लिखने के लिए इंस्पायर हुआ हूं। वाकई क्या बेहतरीन फिल्म थी, राजू जोकर पूरी दुनिया को ताउम्र हंसाता तो रहता है, वहीं उसकी खुद की जिंदगी न जाने कितनी ज्वालाओं में सुलगती रहती है। ऐसा नहीं है कि यह कहानी सिर्फ राजू जोकर की ही हो, हमारे अपने जीवन में भी इस तरह के हजारों राजू मिल जाएंगे। जिनमें से हो सकता है कोई कवि हो, तो कोई थियेटर का कलाकार, कोई रैंप वॉक करने वाली मॉडल, तो कोई ऐसा मामूली सा इंसान जिसका काम इतना साधारण रहा हो कि उसे यहां लिख पाना संभव न हो सके।     अक्सर हम अपनी गफ़्लत में इतने बिज़ी रहते हैं कि हमें फुर्सत ही नहीं होती क...

बाजार में स्वागत है

जी हां, यह बाजार है। एक ऐसा बाजार जहां जेब में अगर पैसा है तो रोटी से लेकर डिग्री तक और मोहब्बत से लेकर नाम, शोहरत और मान-सम्मान तक खरीद लीजिए। अगर पास में पैसा है तो अपने कचरे को भी एडवरटाइज़ कर किसी को भिड़ा दीजिए, जी हां यह बाजार है, और यहां आपका स्वागत है। वैसे दिनकर ने ठीक ही कहा है, कि पैसे के दम पर तुम बाजार से नाक भी खरीद सकते हो। जी हां, दुकानदार कहते हैं कि वे सामान इसलिए बेच रहे हैं, क्योंकि लोग उसे खरीद रहे हैं। और लोग उसे इसलिए खरीद रहे हैं क्योंकि योग्यता की जगह उनके पास पैसे बरस रहे हैं। आज कोई युवक किसी युवती का प्यार इसलिए खरीद पाता है क्योंकि वो उसे मारूती में घुमा पाने की हैसियत रखता है। बहुत से लायक युवक नौकरी के लिए मारे-मारे फिरते हैं, लेकिन नौकरी उसे ही मिलती है जो इसे खरीद पाता है। अभी सुनने में आ रहा है कि गुलशन कुमार की बेटी तुलसी कुमार अपना नया एल्बम, लव हो जाए, लेकर आ रही हैं। वही प्यार पर लिखे गये घिसेपिटे गाने, लेकिन हम इसे भी खरीदेंगे, और यही बाजार का कमाल है। यह जो बाजार है न, वो एक ताश के पत्तो की दीवार की तरह है, एक पत्ता गिरा नहीं कि पूरी की पूरी द...

हिंदुस्तानी तालिबान

मैं और आनंद जी इन दिनों दफ्तर से जरा झुटपुटा होते ही निकल लेते हैं। क्या करें आनंद जी की शिफ्ट जल्दी ही ओवर हो जाती है, तो मेरे साथ ही निकल चलते हैं। नुक्कड़ के दो-चार रेहड़ी वाले दुकानदारों से उन्होने दोस्ती कर रखी है। उस दिन भी हम ऐसे ही एक रेहड़ी वाले के पास जाकर खड़े हो गए। बातचीत का सिलसिला चल निकला। बस में चढ़ने का टाइम हो रहा था, तो बातों का रुख भी बसों की ओर ही मुड़ गया। बस के हर पहलू, डीटीसी के डिसइंवेस्टमेंट, भीड-भड़क्का, ब्लूलाइन वालों की दादागिरी, हर पहलू पर बातें हुईं। वैसे रेहड़ी वाले भाईसाहब बहुत ही विद्वान जान पड़ रहे थे। अचानक से उन्होने हम दोनो का ध्यान बसों में महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की ओर खींचने का प्रयत्न करा। मुझे उन प्रोग्रेसिव माईंडेड भाईसाहब की सोहबत में बडे़ हर्ष की अनुभूति हो रही थी। हो भी क्यों न, आखिर महिलाओं के प्रति पुरुषों की ऐसी उजली सोच बहुत कम ही देखने को मिल पाती है। लेकिन न मालूम अचानक से भाईसाहब को क्या हुआ, उन्होने ब्राहमणवाद के परम श्लोकों सा वज्रपात करते हुए कहा कि, महिलाओं के साथ जो कुछ भी होता है उसके लिए वे खुद ही तो जिम्मेदार हैं, कि...