दुनिया की आधी आबादी! क्यों क्या हुआ, पड़ गए न सोच में, जी हां हम मानवजाति के आधे हिस्से यानी कि महिलाओं के बारे में ही बात कर रहे हैं। पार्टियों के दफ्तरों से लेकर संसद की सभाओं तक, मंचों से लेकर अखबारों के कलम-नवीसों तक और अब तो गली के हर नुक्कड़ वाले घर में भी, सिर्फ महिला सशक्तिकरण की ही चर्चाएं हो रहीं हैं। अब ऐसे में मैने भी सोचा चलो हम भी कुछ खामख्याली कर ही लें, शायद कोई भूला-भटका मुसाफिर मेरे लिखे को भी पढ़ ही ले। फिर भई डेमोक्रेसी है, मुझे भी तो बोलने का, अपनी बात सब के आगे कहने का पूरा हक है, तो यह मौका हाथ से जाने क्यों दूं।
आप लोग सोच रहे होंगे कि पिछले कई दिनों से न तो इस मुद्धे पर संसद में बहस हो रही है, न अखबार इस पर कोई बहुत ज्यादा लिख रहे हैं, तो फिर इसे फालतू में अपनी कलम घिसने की क्या पड़ी है। लेकिन आपसे झूठ नहीं बोलूंगा, मैं ऐसा पत्रकार नहीं हूं जो हर वक्त हवा के साथ उडऩे की ही सोचता है, मुझे तो बहाव के विपरीत तैरने में ज्यादा मजा आता है। और यह मुद्धा कुछ ऐसा है जिसने मुझे बीते काफी समय से झकझोर कर रखा हुआ है। हम महिलाओं को ३३ फीसदी आरक्षण देने की बात करते हैं, यह एक ऐसा सुझाव है जिसको जल्द से जल्द अमल में लाया जाना बेहद जरूरी है। कारण साफ है, अगर हमारे समाज में आप दलितों को बेहद दबा-कुचला मानते हैं, तो उनमें भी दलित महिलाओं की दुर्दशा क्या होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। महिलाएं हमारे समाज की सबसे ज्यादा सताई गयी प्राणी हैं। आज शूद्रों पर बेशक बहुत सी जगह अत्याचार होने बंद हो गए हों, लेकिन उनकी महिलाएं अभी भी रूढिय़ों के बंधन तले कराह रही हैं। और यह हाल सिर्फ गरीबों का नहीं है, बड़े-बड़े घरों में, ऊंचे-ऊंचे दफ्तरों में आज भी महिलाओं को एक तुच्छ बाजारू सामान समझा जाता है। मै जब भी यार-दोस्तों की मंडली में निकलता हूं तो महिलाओं के बारे में उनके बोलवचन सुनकर मुझे अपने मानव होने पर अत्यंत शर्म आती है। क्या इस धरती पर जीवन का सृजन करने वाली स्त्री के ऐहसानों के बदले उसका यही दर्जा हमारे समाज ने रख छोड़ा है। तमाम तरह के अश्लील सामान को आज इस देश में डेमोक्रेसी के नाम पर परोसा जा रहा है, दलीलें दी जा रही हैं कि एडल्ट कंटेंट है, जिसपर रोक लगाने का हक सरकारों को नहीं है। समलैंगिकता को गाली देने वाले तमाम दल और बाबा लोग, इस तरह की चरित्रहीनता पर मुंह तक नहीं खोलते, क्योंकि ओशो जैसे परम-तपस्वी इसी के जैसी चीजें परम-आनंद के रूप में लोगों को परोस रहे हैं। उनके आश्रम रूपी क्लब रोज नए-नए ग्राहकों की भीड़ से भरते जा रहे हैं। इस सब की आलोचना करने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है, और वो यह कि इसमें स्त्री को एक बाजारू सामान की तरह परोसा जा रहा है। सदियों से चाहे वेश्याओं का प्रश्र हो या आज की आधुनिक मल्टीमीडिया सामग्री का हमने महिलाओं को एक ही तरह से देखना चाहा है। हमने कभी भी उसके उस रूप को महसूस करने की कोशिश नहीं की जो निरंतर समाज में अच्छे कामों का सूत्रपात कर रहा है। हमने घरेलू स्तर पर दिए जा रहे उसके महत्वपूर्ण योगदान को हमेशा नजरअंदाज किया। जिस तरह से हमारा समाज तमाम क्रांतियों और बगावतों को कुचलना जानता है, उसी तरह से घरेलू और सामाजिक स्तर पर किया जा रहा महिलाओं का शोषण उनकी इसी खामोश बगावत को कुचलने का काम करता है। चाहे हिंदू फासीवाद हो या फिर और भी किसी भी तरह का धार्मिक कट्टरवाद, हर मजहब में स्त्री को पढऩे लिखने के अधिकार से वंचित रखा गया। इस्लामिक कठमुल्लों के फतवे तो हम जानते ही हैं, अगर इस देश में भी राममोहन रॉय जैसे सुधारक न हुए होते, तो राष्ट्रवाद और हिंदूवाद का दंभ भरने वाले दल महिलाओं को हर सूरत में शिक्षा के अधिकार समेत न जाने कितने बुनियादी अधिकारों से वंचित रख देने वाले थे।
जब दलितों को आरक्षण मिल गया तो उनके नाम पर तमाम सुख-सुविधा में पले बढ़े, नाम-मात्र के दलितों के बच्चे तमाम यूनिवस्र्टियों और नौकरियों में लाभ पाने लगे। जबकि लालटेन की रोशनी में अपना जीवन झोंक रहा देहाती दलित का बच्चा इस काबिल भी नहीं था कि शहर तक जाकर किसी यूनीवस्र्टी में खुद को एनरॉल करवाने का आवेदन भी दे पाए। महिलाओं में भी कई तबके बटे हुए हैं। ऊंचे-ऊंचे ख्वाबों में रहने वाली नवयुवतियां भी हैं, तो इन्द्रा नुई और हिलेरी क्लिंटन जैसी महिलाएं भी, जो अगर चाहें तो फिलिस्तीन, और यूगोस्लाविया जैसे मुल्कों को नेस्तनाबूत करवा दें। वहीं बिलकिस बानो, गुडिय़ा जैसी अनगिनत महिलाएं ऐसी भी हैं, जो आज भी सामाजिक बर्बरता का शिकार बन रहीं हैं। वास्तव में अगर आरक्षण का विधेयक पास कर दिया जाता है, तो कोशिश यह की जानी चाहिए कि उसका अधिक से अधिक फायदा इन दबी कुचली महिलाओं को मिले।
हम सामाजिक बदलाव की बात करते हैं, लेकिन समाज तब तक नहीं बदल सकता जब तक उसे बदलने का एक जज़्बा हमारे लोगों के भीतर न हो, नेताओं में जज़्बा होना भी जरूरी है, लेकिन नेता भी लोगों के बीच से आता है, लोगों की सोच बदलेगी तो नेता तो खुद-ब-खुद बदल जाएंगे। और लोगों की सड़ी-गली सोच को बदले बगैर समाज में कोई भी बदलाव रातों-रात ला देना मुमकिन नहीं। असल में हम भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और हर तरह के अन्याय के साथ जीने की आदत पड़ गई है, अब कचरे में जीने में भी हमें आनंद आने लगा है। हम इतने ज्यादा भ्रष्ट हो चुके हैं कि कोई ईमानदार और बदलाव का इच्छुक आदमी भी हमें भ्रष्ट नजर आता है।
इधर खबर मिली है कि जानीमानी महिला अधिकार कार्यकर्ता कालिंदी देशपांडे जी का निधन हो गया है। वे बीते कुछ बरसों से कैंसर से पीडि़त थीं। उनका यूं असमय ही चला जाना इस देश के जनवादी महिला आंदोलन के लिए एक गहरा धक्का है। विक्षोभ बीमारी के दिनों में भी उनके द्वारा अपने कार्य को लेकर दिखाए गए जज्बे को सलाम करता है।
आज बहुत सी यादों को अलविदा कहने का दिन था, मसलन हमारे कॉलेज की लाईब्रेरी को ही ले लीजिए जिसमें न जाने कितने सारे अच्छे पल बिताए हैं, तीन साल तक पल-पल उसके प्यार की सुगबुगाहट को महसूस किया है, कितने सारे एग्जाम्स के नोट्स वहीं पर कलम घिस-घिसकर तैयार किए हैं, कल अपनी इस पुरानी जगह से एक नए रूम में शिफ्ट हो जाएगी। आज आखिरी दिन उसने(लाईब्रेरी ने) बड़ी बेरुखी दिखाई। खैर यह वही कॉलेज है जिसमें प्रो. ओम गुप्ता, महेश सर, शशि नैयर सर, धर सर, अमिय मोहन सर, और पवन सर जैसे दिग्गजों ने जहां हमारी प्रतिभा को तराशा वहीं पूजा मैम, शिखा मैम, हनी मैम, सुप्रज्ञा मैम, सिल्की मैम व किरण मैम के स्नेह ने हमेशा हमारे लक्ष्य की राह पर हमें अडिग रखा। इसी कॉलेज में अक्षर-अक्षर जोड़ कर हमने टाइप करना और लिखना सीखा, आशुतोष और शुक्ला जैसों के साथ बहुत से गंभीर मुद्दों पर जमकर बहसें भी हुईं। जिंदगी के बहुत से सबक जिनसे शायद भविष्य में दो-चार होना पड़े, वे भी हमें इसी दौरान सीखने को मिले। तो जनाब आज इतनी सारी यादों को अलविदा कहने का दिन था, खैर ऑफिश्यल अनाउंसमेंट(फेरवेल) में अभी समय है, लेकिन मेरे इस दिल पर तो क...
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