प्यार , जिस शब्द को शायद हम बचपन से ही सुनते आ रहे हैं , हालांकि उम्र के अलग अलग पड़ावों के साथ इस शब्द के मायने बदलते जाते हैं। बचपन में मां की गोद , और उसके लाड़ - दुलार से बढ़कर शायद कुछ नही लगता। कुछ और बड़े होते हैं तो , संगी साथियों के याराने के चलते न जाने पहाड़ जैसी ज़िन्दगी के कितने सारे टीले हम यूं ही चढ़ जाते हैं। जब युवावस्था में कदम रखते हैं , तो दिल एक ऐसे साथी की तलाश करने लगता है , जिसके पास रहकर , जिससे बातें करके सुकून सा मिलता हो , और जिसके साथ न होने से खालीपन और नीरवता सी दिल में सुलगती हो। और बड़े - बूढ़ों के मुंह से हमने उम्र के उस पड़ाव के भी किस्से सुने हैं , जब प्रेम अपनी उच्च अवस्था में होता है , उसका स्वरूप परस्पर गहरा हो चुका होता है। अभी बुढ़ापा बहुत दूर है , और बचपन की स्मृतियां इतनी स्पष् ट नहीं हैं , याराने की चर्चा किसी दिन और करेंगे , फिलहाल प्यार के उस स्वरूप को आपसे बांटना चाहता हूं , जिसे मै हर वक्त ...