<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640</id><updated>2011-11-13T02:53:40.996+05:30</updated><title type='text'>विक्षोभ</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>43</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-6589238215569200244</id><published>2011-07-09T00:24:00.004+05:30</published><updated>2011-07-09T00:54:21.688+05:30</updated><title type='text'>जीवन की धूप</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-EqvVFuyPxD8/ThdYcrO3gxI/AAAAAAAAALs/vknKEeW4OL8/s1600/phoolnagar%2Bke%2Bbaune.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 207px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5627063509087388434" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-EqvVFuyPxD8/ThdYcrO3gxI/AAAAAAAAALs/vknKEeW4OL8/s320/phoolnagar%2Bke%2Bbaune.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; एक बार एक बालसुलभ मन, अपनी पुश्तैनी हवेली के पुस्तकालय में पुरानी किताबों को टटोल रहा था, मिखाइल शोलोखोव की एक किताब उसके हाथ लगी, किताब का तो याद नहीं पर उसमें लिखी एक पंक्ति उसके मानस पटल पर सदा के लिए अंकित हो गई, ‘‘मानव की मुक्ति के लिए संघर्श करने वालों को बचपन से ही पुस्तकों के प्रति गहरा अनुराग होता है।‘‘&lt;br /&gt;समय आखिर समय होता है, सूरज और चांद की लुखाछिपी के बीच बचपन का दौर निकल गया, बालसुलभ मन पर किशोरमय चंचलता और जिद छा गई। किताबों की लत ऐसी कि बडे से बडे जुआरी और खिलाडी मात खा गए। कस्बाई इलाकों की डेमोग्राफी कुछ ऐसी रही है कि वहां पाठक वगैरह के मोटे.मोटे थ्रिलर उपन्यास तो कुछ टके खर्चके आसानी से हर नुक्कड पर मिल जाते हैं पर विश्वसाहित्य की अनमोल धरोहरें और ऐसी किताबें जिनपर इंटैलैक्चुअल ठप्पा लगा होता है, कस्बाई देहाती इलाकों में नहीं उपलब्ध होतीं।&lt;br /&gt;किशोर मन को अक्सर सुनने को मिलता था कि आजादी के बाद कुछ कम्युनिस्ट नौजवानों ने इस कस्बे में जनजागरण की जडों को मजबूत करने के लिए ‘‘जनवादी लाईब्रेरी‘‘ बनाई थी, लेकिन ज्यों ज्यों कम्युनिस्ट आंदोलन में दरार पडी लाईब्रेरी भी दरक के न जाने कितने हिस्सों में विघटित हो गई। खैर जिस दौर की हम बात कर रहे हैं, तब सोवियत संघ को टूटे कुछ ही बरस हुए थे और येल्स्तिन को चिंता सता रही थी कि कैसे भी करके कम्युनिस्म के बुखार से रूस को मुक्ति दिला दे, बस जहाज पर जहाज भरकर लाखों की संख्या में बाकी रह गई किताबों को तीसरी दुनिया के देशों में भेजा जा रहा था। लेकिन अफसोस भारत में आया यह किताबों का मानसून भी बस महानगरों में ही बरस कर चला गया और गांव.देहात कस्बाई इलाके भयंकर सूखे की मार झेलते रहे।&lt;br /&gt;खैर भूखा कैसे भी करके अपने भोजन का सुराग लगा ही लेता है किशोर मस्तिष्क ने भी डाक विभाग का पूरा इस्तेमाल करने की ठान ली, दिल्ली, लखनउ , कलकत्ता में बैठे छोटे बडे सभी प्रकाशकों से उसने डाक के जरिए किताबें मंगानी शुरू कर दी थीं। इस तरह से एक ऐसे माहौल में भी जहां आसानी से मानव मस्तिश्क का हास हो सकता है या वह बिल्कुल निकृश्टम प्राणियों में बदल सकता है, किताबों ने इस किशोर मस्तिश्क का परिचय जैक लंदन के अलास्का, ट्वेन की मिसिसिपी, तोलस्तोय के राजनैतिक कैदियों, और शोलोखोव के कज्जाकों से कराया। किताबों ने उसे सोचना सिखाया, कल्पनाओं के घोडे दौडाना सिखाया। हर बार उसे किताबें पंहुचाने आने वाला बूढा डाकिया भी हमेशा किताबों के बंडलों को लेकर उत्साहित रहा करता था और उसे उत्सुकतार रहती थी कि इसके अंदर जाने कौन सी रोचक किताबें हो।&lt;br /&gt;समय बीता, कब कस्बा, वहां के लोग, नुक्कड, बूढा डाकिया पीछे छूट गए पता ही नहीं चला। चेहरे की तरूणाई गायब हो गई और उसका आकार युव ने ले लिया, चिट्ठी तार बेतार सब बीते जमाने की बातें लगने लगीं इनकी जगह ईमेल और एसएमएस ने ले ली। वीपीपी भी ऐसे ही बीते जमाने की चीज बन गया, महानगरों में सारी बढिया किताबें दुकानों पर जो उपलब्ध होती हैं। दुकानों की भी अपनी एक सीमा होती है, वह बाजार द्वारा संचालित होती हैं, जो बाजार का भाव होगा वही दुकान पर माल होगा, यानी सीधे शब्दों में कहा जाए तो जैसा ट्रेंड ग्राहकों को पसंद आ गया दुकानें भी वैसी ही किताबें अपनी रैकों में सजाती हैं, कुछ हट कर करने के लिए व्यापार में कोई जगह नहीं होती।&lt;br /&gt;जीवन की धूप अब कुछ पुरानी सी हो गई थी, जो युव का बसंत था वह जीवन की जेठ में तपने लगा था। चेहरा काम.घर, रोजमर्रा के कलेशों, बीवी की नोक झोंक, बच्चों के बोझ तले दब कर दम तोड रहा था। जवानी की सारी प्रगतिशीलता हवा हो रही थी। किताबों पर से तो धूल की चादर झाडे मानो सदियां बीत गई थीं। खैर जीवन की जलती जेठ के बीच सोचा क्यों न सब कुछ पीछे छोड सन्यास लेकर कहीं दूर चला जाए। चल निकला मुसाफिर लैपटापवा उठाए, जंगल की सैर पर। पहाडों का जंगल, शायद वैली आफ फ्लावर के आसपास कहीं, दूर दूर तक वीरान पसरा हुआ प्रकृति अपने अलंकरण की सारी सीमाओं को पार करती हुई, बस जेठ की दोपहरी में तपे मन को ऐसी शीतलता में क्या चाहिए एक कुटिया के सिवाय। तो वह भी खाली पडी एक कुटिया में टिक गया। जीवन में कहने को इतना कुछ था, और इंटरनेट जैसे संसाधन का सहारा भी, कल का क्लर्क आज का लेखक हो गया, ऐसा लेखक जो जनता के बीच जाकर शोहरत बटोरने में नहीं बल्कि जनता से कट कर एकांत में रहकर खुद की बात कहने में यकीन रखता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोटः&lt;/strong&gt; माफी चाहूंगा पाठक मित्रों, लिखने कुछ और बैठा था लिख कुछ और गया वह भी शायद अधूरा। मुझे लगता है कि मेरी उंगलियों में भी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस का विकास होने लगा है। इस रचना के लिए जो भी विचार आपके मन में आएं , मैं हमेशा ही जानने के लिए उत्सुक रहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff99;"&gt;चित्र साभार- निकोलाई नोसोव की ''फूलनगर के बौने'' पुस्तिका का मुखपृष्ठ&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-6589238215569200244?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/6589238215569200244/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/6589238215569200244'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/6589238215569200244'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='जीवन की धूप'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-EqvVFuyPxD8/ThdYcrO3gxI/AAAAAAAAALs/vknKEeW4OL8/s72-c/phoolnagar%2Bke%2Bbaune.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-3340896863818817793</id><published>2011-06-07T05:22:00.003+05:30</published><updated>2011-06-07T05:50:24.887+05:30</updated><title type='text'>अयथार्थवादी सोच, यथार्थवादी समय</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.artinfo.com/media/image/29375/PicassoBacchanale.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 366px; FLOAT: left; HEIGHT: 257px; CURSOR: hand" border="0" alt="" src="http://www.artinfo.com/media/image/29375/PicassoBacchanale.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; कितना अच्छा होता कि बच्चे के जन्म से पहले&lt;br /&gt;उससे पूछा जाता कि क्या वह आना चाहता है इस दुनिया में,&lt;br /&gt;कितना अच्छा होता कि दरवाजे पर दस्तक देने से पहले हर बीमारी&lt;br /&gt;इक पल के लिए पूछती कि क्या आ जाउं मैं अंदर,&lt;br /&gt;कितना अच्छा ब्याह देने से पहले हजारों लडकियों से पूछा जाता&lt;br /&gt;कि क्या चाहती हो तुम अपने जीवन पर बंदिशों के अंकुश लगवाना,&lt;br /&gt;कितना अच्छा होता अगर हर बार हमारा शोषण करने से पहले&lt;br /&gt;पूछा जाता कि क्या हमे शोषण करने की इजाजत है,&lt;br /&gt;क्या यह भी बेहतर नहीं होता कि बडा होने से पहले पूछती यह जिंदगी&lt;br /&gt;कि जनाब कौन सा प्लान लेंगे अपने लिए अब आप,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुमकिन है कि इसके जवाब में हम चाहते&lt;br /&gt;हर बेहतरी अपने लिए, शायद कहते हर बीमारी को न&lt;br /&gt;कहते तमाम बंदिशों को न&lt;br /&gt;हर शोषण का जवाब भी न ही होता&lt;br /&gt;और जिंदगी का टापअप सबसे बेहतर चुनते अपने लिए&lt;br /&gt;फिर तो शायद यूं होता कि जिंदगी के इतने दर्दों को जानने के बाद&lt;br /&gt;बच्चा कहता मुझे अजन्मा ही रहने दो,&lt;br /&gt;शायद शोषण से मुक्त हो जाती एक जिंदगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर जनाब इतनी अयथार्थवादी सोच कैसे संभव है&lt;br /&gt;कैसे संभव है तकदीर के बनने से पहले तकदीर को समझना,&lt;br /&gt;क्या इसका रास्ता हमारे यथार्थ से होकर नहीं गुजरता,&lt;br /&gt;संवेदना भी तो तभी जन्म लेती है जब होती है वेदना&lt;br /&gt;यह कविता भी तो तभी है जब मर्म का कोई टुकडा लिपटा है वेदना में,&lt;br /&gt;यकीनन कुछ सवाल तो ऐसे हैं जिन्हें आपका दर्शन भी न कहता है&lt;br /&gt;जानवर बनकर बगैर सोचे विचारे जीना आसान है इस दुनिया में&lt;br /&gt;और अगर जानवर नहीं बन सकते तो आपका अजन्मा रहना ही बेहतर है&lt;br /&gt;क्योंकि ''काश'' जैसे शब्द यथार्थ के शब्दकोष में छपे ही नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#c0c0c0;"&gt;* चित्र साभार-पिकासो की कृति ''बशनाल''&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-3340896863818817793?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/3340896863818817793/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3340896863818817793'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3340896863818817793'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='अयथार्थवादी सोच, यथार्थवादी समय'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-7733146085600536155</id><published>2011-01-19T17:39:00.003+05:30</published><updated>2011-01-19T17:54:05.879+05:30</updated><title type='text'>यूटोपिया का चस्का</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/TTbUzKhMFaI/AAAAAAAAALU/FfyvngeKWUQ/s1600/rahul_da.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 206px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5563868365124801954" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/TTbUzKhMFaI/AAAAAAAAALU/FfyvngeKWUQ/s320/rahul_da.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; कई बरस हो गए राहुल जी की एक पुस्तक पढ़ी थी, ‘‘साम्यवाद ही क्यों’’, बहुत प्रेरणा देने वाली पुस्तक या यूं कह लीजिए पुस्तिका थी। राहुल दा के बाद आए बहुत से प्रकांड विद्वानो ने यहां तक कि प्रोग्रेसिव विद्वानो ने भी इस पुस्तिका को यूटोपियन बताकर इसकी आलोचना की थी। लेकिन सच मानिए तो इस पुस्तिका ने मेरे विकसित होते युवा मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा था।&lt;br /&gt;नौकरी करना एक अच्छी बात है, पैसा कमाना और भी अच्छी बात है, लेकिन ऐसा भी क्या पैसा क्या नौकरी कि आपका पूरा वक्त पूरी जिंदगी बस उन्ही की गुलाम बन कर रह जाए। राहुल दा ने एक बात लिखी थी, कि ऐसा समय भी आएगा ‘‘जब इंसान का एक घंटे का श्रम उसके लिए पूरी जिंदगी की रोटी की व्यवस्था कर देगा।‘‘ इस पोस्ट को पढ़ने वालों को मैं मूरख प्रतीत हो सकता हूं,। लेकिन इससे भी एक बात तो साफ हो ही जाती है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां इस तरह की बातें सोच पाना तक असंभव समझा जाता है, और ऐसा सोचने वालों को यूटोपीयन घोषित कर समाज से अलग-थलग करने की पूरी कोशिश की जाती है। कहा यह जाता है कि मुझ जैसे लोग बस हर वक्त अपनी कल्पनाओं में खोए रहने वाले ‘‘धुनिराम‘‘ हैं, हमें डोन किखोते का अवतार साबित करने की कोशिश भी की जाती है। वैसे कल्पना करने में कोई बुराई नहीं है, अच्छी कल्पनाएं, अच्छे सपने , एक अच्छे और नए कल के निर्माण के लिए जरूरी होते हैं। लेकिन दो तरह के लोगों को काल्पनिकों से चिढ़ हो जाती हैः पहले श्रेणी में वह लोग आते हैं जिन्हे ढेर सारा पैसा कमाना और हर वक्त पैसा कमाने के नए नए तरीकों के आविष्कारों में ही खोए रहना पसंद है, इन जैसे लोग हम जैसों को अपना वर्ग शत्रु मानते हैं। दूसरी श्रेणी में वो शामिल हैं जो प्रोग्रेसिव तो हैं, लेकिन जरा यथार्थवादी हैं, उनके लिए मैं वर्ग शत्रु तो नहीं लेकिन वर्ग शत्रु से कम भी नहीं।&lt;br /&gt;खैर जीवन मेें इंसान को सिर्फ रोटी की ही तो जरूरत नहीं, उसे बाकी तमाम सुविधाओं मसलन रहने के लिए मकान , घूमने के लिए गाड़ी, स्वास्थय सेवाओ इत्यादि बुनियादी सुविधाओं की भी जरूरत होती है। फिर ऐश अशरत पर भी मन ललचा ही जाता है। बैल जैसी बीवी भी पल्ले से बांध दी जाती है, कि लो अब अपनी जिम्मेदारी तो संभाल पा नहीं रहे हो इस टमटम को भी संभालो। आगे बाल-गोपालों का बोझ भी उठाने के लिए आप मजबूर हो जाते हैं। तो ऐसे में एक इंसान कैसे रचनात्मक कार्यों में दिल लगा सकता है। कॉलेज के दिनों में शुक्ला एक बात कहा करता था, ‘‘आप दिल लगा कर जंगल में एक शेर की फोटोग्राफी कैसे कर सकते हो, जब आपके पीछे एक खूंखार शेरनी खड़ी हो?‘‘ तो ऐसे में एक और यूटोपीयन ख्याल दिमाग में आता है, कि ‘‘अगर ऐसा हो एक इंसान के पैदा होने के दिन से उसके रुख्सत होने के दिन तक का सारा निर्वाहन देश की सरकार करे, सरकार ही उसे नौकरी दे, शिक्षा दे, खाना दे, मकान दे, मोटर दे, और सोशल सिक्योरिटी की उसके लिए व्यवस्था करे‘‘, इंसान को नौकरी के बारे में सोचकर पढ़ाई बीच में ही न छोड़नी पड़े, बल्कि कुछ ऐसा हो कि वह जितना जी में आए उतना पढ़े, फिर अपनी सामर्थय को वह समाज कल्याण में , राष्ट्र निर्माण में लगाए और खाली बच गए बहुत से समय का रचनात्मक इस्तेमाल करे। अगर चित्रकारी पसंद हो तो वह करे , फोटोग्राफी अच्छी कर सकता हो तो जंगलों में बेशक घूमता फिरे, कहानियां अच्छी लिख सकता हो तो फिर साहित्यकार ही बनें। मतलब यह कि जीवन निर्वाहन की चिंता उसके व्यक्तित्व उसके रुझान में बाधक न बनें। राहुल दा कहते थे , ‘‘साम्यवाद का ध्येय है, सारे देश या विश्व को एक सम्मिलित परिवार बना देना और देश की सारी संपत्ति को उस परिवार की संपत्ति करार कर देना। भारत-जैसे देश में जहां कि जीवन की सभी आवश्यक चीजें उत्पन्न की जा सकती हैं- काम है, वार्षिक आवश्यकता का अंदाजा लगाकर उसके उत्पादन के लिए सारे परिवार के आदमियों में काम बांट देना। और फिर उत्पन्न चीजों को भी आवश्यकतानुसार दे देना है। स्वस्थ आदमी को खाना-कपड़ा, स्वच्छ मकान, बीमार के लिए दवा और पथ्य और लड़कों के लिए शिक्षा का प्रबंध भी हो गया, बस काम खतम। नफा तो दूसरे की मेहनत की चोरी का प्रतिष्ठित नाम है। उसके लिए साम्यवाद में स्थान नहीं है।‘‘&lt;br /&gt;हो सकता है, जो कुछ मैने यहां लिखा वह आप लोगों को थोड़ा कंफ्यूसिंग लग रहा हो, तो इसका सिर्फ एक ही समाधान है, किताब महल प्रकाशन को फोन कीजिए और महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुस्तिका ‘‘साम्यवाद ही क्यों‘‘ मंगाकर पढ़ लीजिए। क्या मालूम यूटोपिया का चस्का आप को भी लग जाए।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-7733146085600536155?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/7733146085600536155/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7733146085600536155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7733146085600536155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='यूटोपिया का चस्का'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/TTbUzKhMFaI/AAAAAAAAALU/FfyvngeKWUQ/s72-c/rahul_da.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-8038231810771678268</id><published>2010-11-12T21:06:00.006+05:30</published><updated>2011-01-19T17:52:25.077+05:30</updated><title type='text'>कुछ तो लिखूं</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/TTbXYWgKx-I/AAAAAAAAALc/e09Io0SdAkM/s1600/picasso.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 240px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5563871203020163042" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/TTbXYWgKx-I/AAAAAAAAALc/e09Io0SdAkM/s320/picasso.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;वैसे लिखना बहुत दिनों से ही चाह रहा हूं, कॉम्‍नवैल्‍थ के ऊपर बहुत सा विक्षोभ प्रकट करना था, फिर आई रामलीला तो उस पर भी एक अच्‍छा आलेख तैयार करने का सोचा था, दिवाली पर भी कहने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन हाय रे आलसीपन बीते दो महीने से कुछ भी नहीं लिखा, एक शब्‍द भी नहीं टिपटिपाया। शीतल जी भी अक्‍सर कुछ अच्‍छा पढने की चाह में मेरे ब्‍लाग का चक्‍कर लगाती थीं, लेकिन निराशा ही उनके हाथ लगती थी। लेकिन वे निरंतर मुझे लिखने के लिए कहती रहती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए इस लंबी आलस से भरी हुई चुप्‍पी के बाद कुछ बात करते हैं, भारीभरकम मुदृदों को कुछ और पल आराम के दे देते हैं। चलिए आज के पूरे दिन की बात करते हैं। ज्‍यों-ज्‍यों धरती हमारी सूरज से दूरियां बढाने में जुटी है, त्‍यों-त्‍यों जिंदगी की तरह दिन भी कुछ ज्‍यादा ही सर्द महसूस होने लगे हैं। सर्दी के कपडे बाहर निकलने को तैयार, और हाफ बाजू बुशर्ट को अगले साल तक के लिए विदा। सुबह आज इन्‍ही जरूरी कामों के साथ हुई। वैसे इन दिनों किताबों से ज्‍यादा फिल्‍मों से दोस्‍ती कर रखी है, साथी कोंपल ने कोई दो-एक साल पहले एक फिल्‍म क्‍लब बनाने का जिक्र किया था, वो तो बन नहीं पाया फिल्‍मों से मेरा जुडाव और गहरा होता गया। माफ कीजिएगा, बात करते-करते मैं फ्लैशबैक में न मालूम क्‍यों चला जाता हूं, शायद आशुतोष ठीक ही कहता था मैं एक वक्‍त में बहुत सी बातें सोचता रहता हूं शायद। खैर हम आज सुबह की बात कर रहे थे, सुबह टीवी पर अमेरिका के बेहद पॉपुलर कार्टून कार्यक्रम रगरैट्स पर फिल्‍म आ रही थी। बस फिर क्‍या था सब कुछ छोडकर उसे ही देखने बैठ गया। न मालूम क्‍यों मुझे वो कार्यक्रम, मैगजीन, किताबें इत्‍यादी अब भी इतने अच्‍छे क्‍यों लगते हैं जिनका मैं बचपन में दीवाना हुआ करता था। समय बडा हो गया पर मैं नही शायद। लेकिन मुझे यह देखकर बेहद अफसोस होता है कि बडे होने की होड में लोग अपने बचपन को भुला देते हैं, या फिर पबों, डिस्‍को, मैक-डी और काफी डे में जाने वाले इस बहुलतावादी तबके का खुद का एक व्‍यक्तित्‍व होता है, एक ऐसा व्‍यक्तित्‍व जो मेरे घर वालों के लाख चाहने के बाद भी मुझ में नहीं पनप पाया। मैं बहुलतावादियों में से एक नहीं हूं, इसका मुझे कभी अफसोस नहीं हुआ, कुछ चीजों को छोडकर।&lt;br /&gt;दूसरी बात जो आज की दुखदायी घटना कही जा सकती है, वो है दिवाली की मिठाइयों के चलते मेरी तबियत के हल्‍का-फुलका गडबडा जाने को लेकर। हां अब मैं शीतल जी को जरूर सलाह दे सकता हूं कि पटाखे न छोडने के साथ साथ, मिठाइयों पर भी ज्‍यादा भरोसा न करें। एक जमाना होता था, जब घरों में होली के अव्‍सर पर गुझिया, पंजीरी वगैरह बना करती थीं, दिवाली चूंकि सर्दियों का त्‍यौहार है तो मेवों से सुसज्जित लड्डू इस मौसम के लिए तैयार किए जाते थे। लेकिन बचपन की बाकि चीजों की तरह यह सब भी दूर अतीत का हिस्‍सा बन चुका है, व्‍यस्‍तता के चलते अब इस सब की फुर्सत कहां।&lt;br /&gt;शाम हुई तो अखबार के एक पन्‍ने पर नजर गई, सलमान खुर्शीद साहब हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की बुक वॉल स्‍कीम को सपोर्ट कर रहे हैं। यह स्‍कीम अवीवा व हिंदुस्‍तान समूह का इनीशिएटिव है। इन लोगों ने दिल्‍ली वालों की मदद से 93,000 पुस्‍तके गरीबों के भारत को मुफ्त में उपलब्‍ध करवाई, खुद कपिल सिब्‍बल साहब ने इस कार्यक्रम में मौजूद रहकर इसकी शोभा बढाई। अब जब सरकार की मंशा में शिक्षा का स्‍थान अहम न होकर ओबामा का स्‍थान अहम है, तो हम इन निजी व्‍यापारियों और शिक्षा का व्‍यवसाय करने वाले सलमान साहब जैसे लोगों से ही उम्‍मीद कर सकते हैं कि वो कमसे कम कुछ हजार लोगों का मुफ्त में किताबे तो उपलब्‍ध करवा ही रहे हैं। बाकि अरबों का भारत अब सार्वजनिक शिक्षा के रहे सहे साधनो से भी हाथ धोने जा रहा है। वैसे इंडिया शाइनिंग और कांग्रेस शाइनिंग में यकीन रखने वालों के लिए यह कोई बडा मुद्दा नहीं है। ओबामा भारत पधारे यह उनके लिए बडी खुशी की बात है, संघी लोग भी बेमन से ओबामा का छिटपुट विरोध करते नजर आए, लेकिन सुदर्शन चक्र का असली निशाना यूपीए की शिक्षा नीतियां न होकर सीआईए की कथित ऐजेंट सोनिया जी बन गईं। बस यही आरोप-प्रत्‍यारोप का दौर चलता रहता है, संपादकगण इसी पर खुश होकर चुटकी लेते रहते हैं, और असली मुद्दे अनगिनत आहों में घुटकर दम तोड देते हैं।&lt;br /&gt;आप सोच रहे होंगे कि कॉम्‍नवैल्‍थ इतना अच्‍छा मुद्दा था, कलमनवीस साहब उस पर क्‍यों नहीं कुछ बोले। तो जनाब मैं तो सही मौके की ताक में था, कुछ उसी तरह जैसे बिल्‍ला अपने शिकार पर झपटने को तैयार रहता है। आज मौका मिल ही गया। शाम ढले, पेट दर्द से परेशान मैं, बोरियत में टीवी के चैनल बदल ही रहा था कि नजर पडी दूरदर्शन पर, जो सोलहवें ऐशिआड की ओपनिंग सेरेमनी दिखा रहा था। इस बार यह चीन के गुआनझू में आयोजित किए जा रहे हैं। उसी समय फेसबुक खोला तो पता चला कि गौरव भाई भी इसके ऊपर कुछ टिपटिपा चुके हैं, उनकी टिप्‍पणी मेरे पूरे विक्षोभ की अभिव्‍यक्ति के लिए काफी है; ''गुआनझू में ऐशियन खेलों का स्‍वागत समारोह भी गजब का आकर्षक रहा, कलमाडी वहां बैठा हुआ था, और उसे सीखना चाहिए था कि कैसे बडे आयोजन भी बिना भ्रष्‍टाचार के संभव हो सकते हैं''।&lt;br /&gt;खैर चलते-चलते एक बात और, चौदह नवंबर को, कैनवास भी जेएनयू के स्‍कूल ऑफ सोशल साइंसेज में बंग महोत्‍सव का आयोजन कर रहा है। इस महोत्‍सव के केन्‍द्र में रहेगी एक फोटोग्राफ प्रदर्शनी जिसमे प्रीतम दा के कहने पर मैने भी अपनी कुछ तस्‍वीरों को भेजा था, तो उम्‍मीद है आप लोग यहां जाएंगे और कार्यक्रम का आनंद उठाएंगे। यह संयोग ही है कि इसी दिन ठीक एक साल पहले हमने भी आइरिस नाम से एक फोटोग्राफ प्रदर्शनी आयोजित की थी।&lt;br /&gt;खैर चलिए निकलते बढते, विक्षोभ पर दोबारा मिलना होगा, तो जैसा रूसी लोग कहा करते हैं, दस्‍वीदानिया, फिर मिलेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* चित्र साभार- विश्‍व प्रसिद्ध कलाकार 'पाब्‍लो पिकासो' की 'स्टिल लाइफ' &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-8038231810771678268?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/8038231810771678268/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/11/blog-post.html#comment-form' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/8038231810771678268'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/8038231810771678268'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='कुछ तो लिखूं'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/TTbXYWgKx-I/AAAAAAAAALc/e09Io0SdAkM/s72-c/picasso.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-2861021557096349489</id><published>2010-09-01T14:16:00.001+05:30</published><updated>2010-09-04T03:04:09.618+05:30</updated><title type='text'>कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TH4S90BWemI/AAAAAAAAAKQ/6XZ3N4CH_Yc/s1600-h/vidrohi_ji%5B8%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 5px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="vidrohi_ji" border="0" alt="vidrohi_ji" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TH4S-cEU-7I/AAAAAAAAAKU/L4mJFv9ey18/vidrohi_ji_thumb%5B6%5D.jpg?imgmax=800" width="246" height="190" /&gt;&lt;/a&gt; वैसे तो यह टाइटल युवा कथाकार अनुज जी के कहानी संग्रह और उसमें पहली कहानी का है, लेकिन इस समय जो किस्सा मैं यहां कहने जा रहा हूं, उसके लिए मुझे यह बिल्कुल सटीक लगा। जिन लोगों ने यह कहानी पढ़ी है वो समझ ही गए होंगे कि मैं राजधानी के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के 'विद्रोही जीÓ की बात करने जा रहा हूं। अनुज जी की कहानी भी पीडीएफ के रूप में इस आलेख के आखिर में दे रहा हूं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; रमाशंकर यादव विद्रोही को जेएनयू में गोपालन जी की लाईब्रेरी कैंटीन में बैठे हुए अक्सर देखा जा सकता है। बहुत से नए आने वाले लोग उन्हे पागल के तौर पर ही पहचानते हैं, तो कुछ वामपंथी मित्रों के लिए वे एक ऐसे शख्स हैं जो दुनिया बदलने की कोशिश में दुनिया से ही बेगाने हो गए। विद्रोही से पिछले महीने तक मेरा कोई परिचय नहीं था, उनके बारे में जानने की उत्सुकता तो बहुत हुई, पर कभी उनसे पूछने का साहस नहीं जुटा पाया। अभी कल रात को ही, बीबीसी की वेबसाइट पर उनकी तस्वीर देख और नाम पढ़कर चौंक सा गया। धक्का सा लगा कि यही वो विद्रोही जी हैं, जिनके बारे में काफी कुछ सुना व पढ़ा है। खबर यह है कि पिछले हफ्ते विश्वविद्यालय प्रशासन ने अभद्र भाषा के प्रयोग के चलते तीन बरस तक विद्रोही जी के जेएनयू में प्रवेश पर रोक लगा दी है। सुनकर काफी बुरा तो लगा, क्योंकि विद्रोही की न तो आजीविका का कोई साधन है और न इस महानगर में रहने का कोई ठिकाना।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; रमाशंकर विद्रोही, वैसे तो उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर के रहने वाले हैं, और युवावस्था में ही जेएनयू आ गए थे, यह कोई आज से तीस बरस पहले की बात है। जेएनयू के राजनैतिक माहौल में पढ़कर विद्रोही भी वामपंथी हो गए और एसएफआई के सदस्य बन बैठे। आप यकीन नहीं मानेंगे लेकिन इस विक्षिप्त से दिखने वाले शख्स ने हिंदी साहित्य में एमफिल तक पढ़ाई की हुई है। पीएचडी में आए तो एक ऐसी महत्वाकांक्षी मनमोहिनी से दिल लगा बैठे कि पीएचडी तो अधूरी रह ही गई, दीन-दुनिया से भी बेगाने हो गए। वैसे हिंदी के इतने मेघावी छात्र रहे विद्रोही जी को कविता रचने का बहुत शौक है, और बीबीसी के अनुसार अब तक उनके पास चार सौ कविताएं ऐसी हैं जिन्हे अगर छपवा दिया जाए तो अच्छा खासा संकलन तैयार हो सकता है। कुछ समय पहले तक विद्रोही जी से जेएनयू में कविता सुन पाना मुमकिन था, लेकिन अब इसके आसार धूमिल ही नजर आते हैं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इधर सुन रहे हैं कि बीते तीन बरसों से बंद पढ़े जेएनयू छात्र संघ के चुनावों को दोबारा शुरु करवाने के लिए सारे छात्र तगड़ा आंदोलन करने की फिराक में हैं। तो ऐसे में कुछ उम्मीद तो जरूर जगती है कि निरंकुश प्रशासन के तानाशाही कदमों पर एक मजबूत छात्र संघ कुछ अंकुश तो लगा ही देगा।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; यहां अनुज जी की कहानी भी अटैच कर रहा हूं, साथ ही बीबीसी की उस खबर का लिंक भी दे रहा हूं। कौन जानता है कि कभी जेएनयू में यूं ही घूमते हुए विद्रोही जी से फिर मिलना हो जाए। &lt;/p&gt;  &lt;ul&gt;   &lt;li&gt;     &lt;div align="justify"&gt;&lt;u&gt;&lt;a href="http://sachkahun.blogspot.com/2007/10/2.html" target="_blank"&gt;अनुज भाई की कहानी 'कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह’&lt;/a&gt;&lt;/u&gt;         &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;   &lt;/li&gt;    &lt;li&gt;     &lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2010/08/100831_poet_vidrohi_jnu_adas.shtml" target="_blank"&gt;&lt;u&gt;विद्रोही जी के बारे में बीबीसी की रपट&lt;/u&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;   &lt;/li&gt;    &lt;li&gt;     &lt;div align="justify"&gt;&lt;u&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://vidrohijimarchon.blogspot.com/" target="_blank"&gt;विद्रोही जी की कविताएं&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;   &lt;/li&gt; &lt;/ul&gt;  &lt;hr /&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#c0c0c0" size="5"&gt;ताजा अपडेट&lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;आज तीन सितंबर 2010 को छात्र समुदाय के प्रबल प्रतिरोध के आगे हार मानते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय प्रशासन ने विद्रोही जी का रस्टीकेशन ऑडर निरस्त करते हुए उन पर लगे सभी आरोप वापिस ले लिए। अब विद्रोही जी से जेएनयू में मिलना संभव हो सकेगा।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;यहां&amp;#160; इस मसले पर विद्रोही जी का आत्मक‍थ्य दे रहा हूं।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TIFpsrJz_kI/AAAAAAAAAKY/qJj2IhjsuhM/s1600-h/vidrohi1%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="vidrohi1" border="0" alt="vidrohi1" src="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TIFpuTSYcuI/AAAAAAAAAKc/xhSpqOb3wOM/vidrohi1_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800" width="173" height="240" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TIFpvVUpI-I/AAAAAAAAAKg/ZLzd-PtAzTo/s1600-h/vidrohi2%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="vidrohi2" border="0" alt="vidrohi2" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TIFpwSNZ5ZI/AAAAAAAAAKk/aYAi8t6x0bg/vidrohi2_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="191" height="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-2861021557096349489?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/2861021557096349489/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2861021557096349489'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2861021557096349489'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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बाद लोग अपने घरों में दुबके हुए थे, प्रधानमंत्री भी लालकिले पर औपचारिकता पूरी करके वापिस लौट चुके थे। और युवाओं को शाम का इंतज़ार था, जब वे आजादी के नाम शाम का जश्र करेंगे। ऐसे में हम जा पंहुचे राजधानी के एक लो-प्रोफाइल सिनेमा हॉल में, आमिर खान की नई आई फिल्म पीपली लाइव देखने, अफवाह थी कि इस फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया है, लेकिन सिनेमा हॉल में उमड़ी हुई भीड़ इस अफवाह को सिरे से नकार रही थी।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; पीपली लाइव, मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव पीपली में रहने वाले नत्था की कहानी है। सरकारी ऋण न चुका पाने के कारण नत्था की जमीन डूबने वाली होती है। तभी एक छुटभैय्ये से उसके भाई को विदर्भ के किसानों की आत्महत्याओं के विषय में पता चलता है, और साथ ही यह भी कि सरकार मरने वाले किसानों के परिवार को लाख रुपए मुआवजा भी दे रही है। दोनो भाइयों में बहस के बाद फैसला होता है कि नत्था जमीन बचाने के लिए आत्महत्या करेगा। सूबे के एक लोकल अखबार का रिपोर्टर राकेश इस खबर को लपक लेता है, और जल्द ही यह खबर राजधानी के सबसे बड़े टीवी चैनल पर हाईलाइट हो जाती है। उस चैनल की एंकर इस खबर को कवर करने गांव में क्या पंहुचती है, कि सारे के सारे टीवी चैनलों को लावलश्कर जो अमूमन टीआरपी को लेकर भिड़ा रहता है, भी वहां पंहुच जाता है। नेताओं में भी दो गुट बंट जाते है, एक गुट नत्था के मरने की पैरवी करता है तो दूसरा गुट जो सूबे की सत्ता पर आसीन है, नत्था को मरने नहीं देना चाहता है जिससे कि उसकी गद्दी पर कोई आंच न आ जाए। इन सब दांवपेंचों में नत्था का जीवन तबाह हो जाता है, रिपोर्टर राकेश एक हादसे मे मारा जाता है और उसकी लाश को नत्था समझ कर मीडिया, नेता और पुलिस वहां से अपना डेरा समेट कर वापिस हो लेते हैं। लेकिन नत्था गया कहां, उसके परिवार को हर्जाने की रकम भी नहीं मिली क्योंकि उसका(राकेश) मरना तो एक हादसा था आत्महत्या नहीं। उधर नत्था गांव से भाग कर बहुत दूर राजधानी की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूर हो जाता है और फिल्म भी समाप्त होती है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; फिल्म का अंत एक बेहद मधुर ग्रामीण गीत से होता है, लेकिन तब तब दर्शक अपनी कुर्सियां छोडऩे लगे थे, और शायद इसी कारण वो फिल्म का मुख्य संदेश पढ़ ही नहीं पाए। नवउदारवाद की नीति के लागू होने के बीते बीस सालों में हमारे देश के आठ लाख से ज्यादा किसान, खेतीबाड़ी छोड़&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TG6u11Br3XI/AAAAAAAAAJ0/h0nOaSrNsAQ/s1600-h/peepli_live3%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 5px 10px 5px 5px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="peepli_live3" border="0" alt="peepli_live3" align="right" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TG6u3HXmxmI/AAAAAAAAAJ4/837jhHfamd0/peepli_live3_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="278" height="209" /&gt;&lt;/a&gt; देने पर मजबूर हुए हैं। विदर्भ देश का एक ऐसा इलाका है जहां से सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याओं की बात सामने आई है। सरकार इसे रोकने का दावा करती है, और बिल्कुल फिल्म की तर्ज पर ही गेंद लुढ़का कर राज्य के पाले में डाल देती है, उधर राज्य भी किसानों की समस्या से निबटने का थोथा दावा जरूर करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं हो पाता। केन्द्र में बैठे बड़े नौकरशाह आराम से चाय की चुस्कियां भरते हैं, और मामले को और उलझाने में अपनी सक्रिय भूमिका अदा करते हैं। राज्य में बैठे कलेक्टर व अन्य सरकारी कर्मचारी कोई ढंग की परियोजना न होने की बात कह कर किनारे हो जाते हैं या बहुत हुआ तो नत्था को एक बगैर पानी का हैंडपंप देकर उसकी गरीबी मिटाने की खानापूर्ति कर आते हैं। राज्य से केन्द्र में और केन्द्र से राज्य में यह तनातनी चलती रहती है, बिना सोचे समझे व्यर्थ की परियोजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। नेताओं के यहां तो नाश्ते से लेकर रात के खाने तक में एक से एक उम्दा भोजन बनते हैं, वहीं गांव के गरीब प्याज और सूखी रोटी के भरोसे ही अपना पूरा जीवन काट देते हैं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; हमारे देश के मीडिया के 'बहुआयामीÓ चरित्र को भी यह फिल्म उभार कर सामने लाती है। अंग्रेजी का मीडिया जो बहुत प्रगतिशील होने का दम भरता है, अंतत: टीआरपी और पूंजी के मायाजाल में ही फंसा नजर आता है। वहीं हिंदी भाषी जनता की नब्ज जानने का दावा करने वाला एक चैनल, जो बहुत हद तक स्टार न्यूज़ से प्रेरित लगता है, कुछ और नहीं मध्य(मुख्य) प्रदेश की सत्ता में आसीन और राष्ट्रवादी होने का दंभ भरने वाली एक पार्टी का प्रचारक ही साबित होता है। राष्ट्रवादी चैनल के पत्रकार दीपक में हम इसी नाम वाले असली जिंदगी के एक बेहद मशहूर पत्रकार की झलक पा सकते हैं, वहीं अंग्रेजी चैनल की एंकर नंदिता मलिक का किरदार भी एनडीटीवी की एक मशहूर पत्रकार सा जान पड़ता है। एक ऐसे देश में जहां जनता व होरी जैसे लाखों किसान भूख से मर रहे हों, तब भी मीडिया को अपनी टीआरपी की पड़ी रहती है। ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को आकर्षित करके अंतत: अधिक से अधिक विज्ञापनदाताओं से ज्यादा से ज्यादा पैसा बटोर पाना उनका मकसद रहता है। स्थानीय रिपोर्टर राकेश से होरी नामक उस किसान की मौत नहीं देखी जाती जो अपनी ही जा चुकी जमीन में मिट्टी खोद कर बेचा करता था, और एक दिन उसी गड्ढे में मरा पाया गया। पत्रकार राकेश नंदिता को भी बदलना चाहता है, पर अफसोस नंदिता इतनी ज्यादा प्रोफेशनल हो गई होती है कि इस तरह की मानवीय संवेदनाओं का अब उस पर कोई असर नहीं पड़ता । राकेश जिसका धीरे-धीरे हृदय परिवर्तन हो रहा होता है और जो भविष्य में जनता के हकों के लिए लडऩे वाला पत्रकार बन सकता था, आखिरकार नत्था को अपहर्ताओं से छुड़वाते हुए एक हादसे में मारा जाता है, सब उसे नत्था की लाश समझ लेते हैं, और इस तरह से राकेश के गायब होने का किसी पर कोई असर भी नहीं पड़ता है। दूसरी तरफ हिंदीभाषी चैनल का पत्रकार दीपक जिसका मीडिया की दुनिया में बहुत नाम और रुतबा है, फिल्म के अंत तक या तो ओछी चालबाजियों में लगा रहता है या फिर बचकानी खबरें रिपोर्ट करके जनता को बरगलाने का काम ही करता है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इस फिल्म का मुख्य कलाकार नत्था भी असल जिंदगी में एक मामूली सा कलाकार ही है। ओंकार दास मानिकपुरी अपनी असल जिंदगी में हबीब तनवीर के छत्तीसगढिय़ा नाट्य गु्रप 'नया थिएटरÓ के एक कलाकार हैं। आमिर खान इन दिनों कु छ हट कर फिल्में बनाने में लगे हुए हैं। उन्हे ओंकार दास का अभिनय इतना पसंद आया कि उन्हे लीड रोल में ले लिया गया है। वहीं दूसरी ओर फिल्म की डायरेक्टर अनुषा रिज़वी भी एनडीटीवी चैनल में अच्छे पद पर आसीन हैं। अन्य दूसरे कलाकार मसलन रघुवीर यादव जिन्होने नत्था के भाई बुधिया का किरदार निभाया है, भी बॉलीवुड के एक मशहूर अभिनेता हैं, और लंबे समय से थिएटर से भी जुड़े रहे हैं। लखनऊ में भी कुछ समय तक उन्होने काम किया है। राकेश का किरदार निभाने वाले नवाजुद्धीन सिद्दिकी भी समय-समय पर अलग हट कर बनने वाली फिल्मों में अपनी भूमिकाएं निभाते रहे हैं। नंदिता दास की फिराक में भी वे एक मुख्य भूमिका में थे। नसिरुद्धीन शाह से तो आप भलीभांति परिचित हैं ही।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ग्रामीण परिवेश की छाप को और भी ज्यादा उभारने के लिए फिल्म के अंत में जिस लोकगीत का इस्तेमाल हुआ है 'चोला माटी के रामÓ उसे हबीब तनवीर की बेटी नगीन ने गाया है। इस गीत &lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TG6u4SZKqrI/AAAAAAAAAJ8/9-3tYyMKr5s/s1600-h/peepli_live2%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 5px 10px 5px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="peepli_live2" border="0" alt="peepli_live2" align="left" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TG6u5HIe-UI/AAAAAAAAAKA/-Bmbo3ZEzZk/peepli_live2_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="274" height="205" /&gt;&lt;/a&gt; को लेकर काफी विवाद भी रहा। अन्य गीत इंडियन ओशियन नामक एक पॉप म्यूजिक ग्रुप ने तैयार किए हैं। इस फिल्म का एक गीत जो जनता की जुबान पर जा चढ़ा वो है 'मंहगाई डायन खाय जात हैÓ। वर्तमान समय में जहां मंहगाई शहराती तबके की नाक में दम किए हुए है, वहीं गांवो में तो हालात और भी बदतर हैं, और गांववासियों का वही विक्षोभ इसी गीत के रूप में सामने आता है। एक अच्छी फिल्म से हमेशा यही शिकायत रहती है कि वो कभी भी जनता के बीच में नहीं पंहुच पाती और बुद्धिजीवी तबके के ड्राइंगरूम तक या फिल्म महोत्सवों तक ही सिमट कर ही रह जाती है(मसलन गुजरात दंगों पर बनने वाली बेहतरीन फिल्म नंदिता दास की फिराक को ही ले लीजिए जो आम जनता तक नहीं पंहुच पाई), लेकिन आमिर बड़े ही होशियार निकले और प्रचार के जबर्दस्त माध्यम व मीडिया में अपनी साख का प्रयोग करते हुए उन्होने इस फिल्म को जन-जन तक पंहुचा ही दिया। फिल्म ने बेहतरीन कमाई करते हुए श्याम बेनेगल के उस दावे को भी झुठला दिया जिसमें वो कहते हैं कि यथार्थपरख सिनेमा कमाई नहीं कर सकता है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; कुल मिलाकर यह एक बेहतरीन फिल्म रही। ग्रामीण परिवेश की गालीगलौज भरी भाषा के इस्तेमाल के चलते सेंसर बोर्ड ने इसे एडल्ट श्रेणी में रिलीज़ करवाया। लेकिन तब भी मेरे अनुसार इस फिल्म को देखा जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह हमें उस छद्म आवरण से बाहर निकालती है जो मीडिया और नेता हमारे चारों ओर बुने जा रहे हैं, और हमारा परिचय ऐसे भारत से करवाती है जो आज़ादी के ६३ वर्ष बीत जाने पर भी जीवन की बुनियादी सुविधाओं से मोहताज है और हरकदम पर जिसे आगे बढऩे के लिए इस पूरी व्यवस्था से जूझना पड़ता है जो उसे दबाने पर उतारू है।&lt;/p&gt;  &lt;div style="padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; display: inline; float: left; padding-top: 0px" id="scid:5737277B-5D6D-4f48-ABFC-DD9C333F4C5D:20aa120a-ff7b-4ee7-8030-6e59a9ac1a14" class="wlWriterEditableSmartContent"&gt;&lt;div id="9129ca19-6bfb-4f7c-a894-839818f95487" style="margin: 0px; padding: 0px; display: inline;"&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=4-Gw2DibRNE" target="_new"&gt;&lt;img src="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TG6xhE9P47I/AAAAAAAAAKE/1JARNC2-z20/videob97e2e0d66ce%5B3%5D.jpg?imgmax=800" style="border-style: none" galleryimg="no" onload="var downlevelDiv = document.getElementById('9129ca19-6bfb-4f7c-a894-839818f95487'); downlevelDiv.innerHTML = &amp;quot;&amp;lt;div&amp;gt;&amp;lt;object width=\&amp;quot;425\&amp;quot; height=\&amp;quot;355\&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;param name=\&amp;quot;movie\&amp;quot; value=\&amp;quot;http://www.youtube.com/v/4-Gw2DibRNE&amp;amp;hl=en\&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;\/param&amp;gt;&amp;lt;embed src=\&amp;quot;http://www.youtube.com/v/4-Gw2DibRNE&amp;amp;hl=en\&amp;quot; type=\&amp;quot;application/x-shockwave-flash\&amp;quot; width=\&amp;quot;425\&amp;quot; height=\&amp;quot;355\&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;\/embed&amp;gt;&amp;lt;\/object&amp;gt;&amp;lt;\/div&amp;gt;&amp;quot;;" alt=""&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-8777156320689378437?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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तो सारी कल्पनाओं का जीवंत सार है     &lt;br /&gt;एफिल, गीज़ा और मोनालिसा तो नमूने भर हैं     &lt;br /&gt;सृजन में तो अनंत सा विस्तार है। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बांध तो सृजन को कोई कला से भी सकता है    &lt;br /&gt;लेकिन क्या इतने भर से यह कभी थमा है     &lt;br /&gt;या फिर हर जड़ में चेतन का संचार     &lt;br /&gt;कहीं सृजन से ही तो नहीं बना है! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सृजन उस बच्चे सा सरल है    &lt;br /&gt;जिसने अभी-अभी शब्द का अंतर पहचाना     &lt;br /&gt;या फिर उस ममता सा मधुर भी     &lt;br /&gt;जिसने जीवन के अमरत्व को जाना &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मेरे तुम्हारे सृजन के मायने    &lt;br /&gt;अलग जरूर हो सकते हैं     &lt;br /&gt;लेकिन लक्ष्य सबका एक है     &lt;br /&gt;खुशी की वास्तविकता को महसूस कर पाना। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font color="#faf8a3"&gt;&lt;strong&gt;चित्र साभार- मकबूल फिदा हुसैन की प्रसिद्ध कृति 'मदर टेरेसा'&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-5884489795117235016?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/5884489795117235016/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/06/blog-post_9951.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5884489795117235016'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5884489795117235016'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/06/blog-post_9951.html' title='सृजन'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TCZQlsCEurI/AAAAAAAAAJg/RhUQyO3Vrv8/delhi-paris_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800" width="307" height="211" /&gt;&lt;/a&gt; सड़कें खुद रही हैं     &lt;br /&gt;फ्लाईओवर बन रहे हैं     &lt;br /&gt;मैट्रो उड़ रही है     &lt;br /&gt;क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कॉमनवैल्थ आ रहे हैं    &lt;br /&gt;अफसर इधर-उधर भाग रहे हैं     &lt;br /&gt;शीला भी मुस्कुरा रही हैं     &lt;br /&gt;क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मकबरे फिर से जवां हो रहे हैं    &lt;br /&gt;दिल्ली-वाले एशियाड के किस्से दोहरा रहे हैं     &lt;br /&gt;विश्वविद्यालय-गेस्टहाउस और घर होटल बन रहे हैं     &lt;br /&gt;क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;झुग्गियों पर बुलडोजर चढ़ाए जा रहे हैं    &lt;br /&gt;गांव वाले, वापिस गांव भगाए जा रहे हैं     &lt;br /&gt;एथलीट पूरा जोर लगाने की तैयारी में हैं     &lt;br /&gt;क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;होटलों पर होटल बनते जा रहे हैं    &lt;br /&gt;रोज नए-नए प्लान आ रहे हैं     &lt;br /&gt;रिसेशन के मारे नौकरी को ललचा रहे हैं     &lt;br /&gt;क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मजदूरों के&amp;#160; दस्ते मार्च करते नजर आ रहे हैं    &lt;br /&gt;सुपरवाइजर साहब भी गुर्रा रहे हैं,     &lt;br /&gt;मजदूर के घर में रोटी पक रही है     &lt;br /&gt;क्योंकि दिल्ली पेरिस बन रही है!&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-693999337566895802?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/693999337566895802/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/06/blog-post_27.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/693999337566895802'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/693999337566895802'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/06/blog-post_27.html' title='दिल्ली पेरिस बन रही है'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TCZQlsCEurI/AAAAAAAAAJg/RhUQyO3Vrv8/s72-c/delhi-paris_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4814974890985166534</id><published>2010-06-01T16:21:00.001+05:30</published><updated>2010-06-01T16:21:51.935+05:30</updated><title type='text'>आतंक के साए में गाज़ा</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TATmJTTmuWI/AAAAAAAAAJQ/YYDCn64pKeI/s1600-h/gaza_barbarism%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 5px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="gaza_barbarism" border="0" alt="gaza_barbarism" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TATmKn8dfSI/AAAAAAAAAJU/zVvA_SC0kLA/gaza_barbarism_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800" width="398" height="297" /&gt;&lt;/a&gt; कल एक बहुत ही दर्दनाक खबर पढऩे को मिली, कि गाज़ा के भूख से बिलखते लोगों के लिए राहत सामग्री लेकर जा रहे तुर्की के एक जहाजी बेड़े पर इस्त्राइल ने हमला कर दिया और इस हमले में तुर्की के बीस राहत कर्मी मारे गए। इस समय हर कोई रटी रटाई एक बात दोहरा रहा है, कि यह हमला इस्त्राइल ने अंतर्राष्ट्रीय जल सीमा में जाकर किया है, लेकिन यह भी तो सच ही है कि अगर जहाज गाज़ा की जल सीमा में प्रवेश भी कर जाता तो भी इस्त्राइल को उस पर हमला करने से कोई भी नहीं रोक सकता था। इस्त्राइल ने पिछले दो वर्षों से कुछ अधिक समय से फिलिस्तीन के इलाके गाज़ा की घेराबंदी कर रखी है, कोई भी जहाज, हवाई जहाज, या वाहन वहां पर रसद सामग्री लेकर नहीं जा सकता। अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस संगठन तक ने इस्त्राइल द्वारा वहां बरपाई जा रही हिंसा की कड़े शब्दों में भत्र्सना की है। लेकिन इस्त्राइल तो इस्त्राइल है, उसे पता है कि उसका बाप अमेरिका अपने स्नेह का आंचल फैलाए उसके पीछे खड़ा है, इसलिए वो वही करता है, जो उसको ठीक लगता है। जब इस्त्राइल इतना भयंकर कांड करने में व्यस्त था, उसी समय खबर मिली कि श्री-श्री रविशंकर जी महाराज के कीर्तन में गोली चल गई है। कुछ समय बीता और खबर ने तूल पकड़ लिया। पूरा मीडिया अपने दल-बल के साथ बाबाजी के आसपास तैनात हो गया। क्या एनडीटीवी, क्या टाईम्स नाओ, बाबा पर हमले की खबर के एस्टन चलने लगे, और हर बुलेटिन के बाद उसे पूरे विस्तार से दिखाया जाने लगा। दूसरी तरफ गाज़ा की खबर तब तक टीवी चैनलों पर नहीं चली, जब तक भारत सरकार ने इस्त्राइल के खिलाफ अपना रुख नहीं जाहिर कर दिया। ऐसा है हमारा मीडिया।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आने वाले कुछ दिनों में बहुत मुमकिन है कि गाज़ा के समर्थन में जनसमुदाय पूरे जोरशोर के साथ सामने आएगा, इस्त्राइल के खिलाफ धरने-प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे, लेकिन इस बात की भी पूरी संंभावना है कि हमारा पश्चिम परस्त मीडिया इन खबरों का भी पूरा ब्लैक आउट मारेगा। उधर यहूदी राष्ट्र बनाने का दो हजार साल पुराना सपना लिए बावले हो रहे जियनवादी अभी कितने और रसद जहाज निगल जाते हैं, यह वक्त ही बताएगा। आज उनका समय है, उनकी ताकत है...लेकिन कभी दबे कुचले लोगों का भी वक्त आएगा, उनका आक्रोश हमास के चरमपंथ को नकारते हुए बह निकलेगा, और इस्त्राइल के नस्लवादी राज्य की बुनियाद को हिला कर रख देगा। इस समय पूरी दुनिया फिलिस्तीन और गाज़ा के अवाम के साथ खड़ी है, रसद जहाज फिलोतेला जैसी और भी कोशिशें आगे भी निडरता पूर्वक जारी रहेंगी इसकी हम उम्मीद जता सकते हैं।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4814974890985166534?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4814974890985166534/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4814974890985166534'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4814974890985166534'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='आतंक के साए में गाज़ा'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/TATmKn8dfSI/AAAAAAAAAJU/zVvA_SC0kLA/s72-c/gaza_barbarism_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-7618905118159195203</id><published>2010-05-08T18:40:00.001+05:30</published><updated>2010-05-08T18:41:26.055+05:30</updated><title type='text'>आज कुछ यूं हुआ कि</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S-Vi2r4Pv9I/AAAAAAAAAJA/NZnKtKnWQyA/s1600-h/tum%5B12%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="tum" border="0" alt="tum" align="left" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S-Vi3hapuhI/AAAAAAAAAJE/o-pgnlHI5k0/tum_thumb%5B6%5D.jpg?imgmax=800" width="297" height="223" /&gt;&lt;/a&gt; आज कुछ यूं हुआ कि     &lt;br /&gt;बीते समय की परछाईयां यूं ही चली आईं     &lt;br /&gt;लगा कुछ ऐसा जैसे 'कल’ जिसे हमने साथ जीया था     &lt;br /&gt;बस पल में सिमट भर रह गया हो। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वो जेएनयू का सपाट सा रास्ता    &lt;br /&gt;तुम्हारी सुगंध से महकता हुआ,     &lt;br /&gt;नहीं-नहीं, वो तो बासी रजनीगंधा की     &lt;br /&gt;बेकरार सी एक महक थी! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वो कोने वाली कैंटीन की मेज    &lt;br /&gt;जहां तुम बैठा करती थीं,     &lt;br /&gt;कुछ झूठे चाय के कप, सांभर की कटोरी     &lt;br /&gt;वहां अब भी रखे हुए हैं! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;डीटीसी की बस की कोने की सीट    &lt;br /&gt;जहां तुम्हारे सुनहरे बाल और आंखे,     &lt;br /&gt;धूप में चमका करते थे,     &lt;br /&gt;अब वहां बस मैं अकेला बैठता हूं! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वो दिन, जब हम पहली बार मिले थे,    &lt;br /&gt;वो कूड़े वाला पासपोर्ट,     &lt;br /&gt;वो बस के बोनट पर बैठ मुस्कुराती सी तुम     &lt;br /&gt;तुम्हारा साथ, अब सब स्मृति &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;तस्वीर में तुम्हारा साथ न आना    &lt;br /&gt;दूर दूर चलते जाना     &lt;br /&gt;वो लंबी बेचैनी ,     &lt;br /&gt;वो तन्हा थे दिन &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;तुम्हारे लिए,    &lt;br /&gt;मैने उम्मीद को जिंदा बनाए रखा,     &lt;br /&gt;लगता था मुझे तुम आओगी पास     &lt;br /&gt;पर अब सब... &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अब तुम समय के रथ पर सवार,    &lt;br /&gt;जा रही हो, महाद्वीपों से भी पार     &lt;br /&gt;मैं जमीन का कवि     &lt;br /&gt;जमीन से चस्पां मेरी कविता &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;यह कविता, नेरुदा की तरह    &lt;br /&gt;मेरी आखिरी भेंट है तुम्हे,     &lt;br /&gt;मेरा प्यार, तुम्हारे अभाव में,     &lt;br /&gt;तुम्हे भूलता जाएगा, शायद!!!&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-7618905118159195203?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/7618905118159195203/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7618905118159195203'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7618905118159195203'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='आज कुछ यूं हुआ कि'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S-Vi3hapuhI/AAAAAAAAAJE/o-pgnlHI5k0/s72-c/tum_thumb%5B6%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-966322024316459319</id><published>2010-04-29T11:37:00.001+05:30</published><updated>2010-04-29T12:30:14.470+05:30</updated><title type='text'>वो फिलिस्तिीन का साथ</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S9kiNMU7TqI/AAAAAAAAAI4/FbGAyMYcNjs/s1600-h/gaza_delhi%5B8%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 5px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="gaza_delhi" border="0" alt="gaza_delhi" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S9kiObWdanI/AAAAAAAAAI8/WNFeHI7Mi_c/gaza_delhi_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800" width="282" height="188" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;जनवरी 2009 में जब गाजा पर इस्त्राइल का हमला जारी था, तो दिल्ली के छात्रों और नौजवानों ने इस्त्राइल के दूतावास पर एक विरोध प्रदर्शन निकाला, बाद में उन्हे पुलिस ने गिरफतार भी किया, छोटा ही सही कम से कम यह विरोध सत्तापक्ष के खिलाफ जाकर उस मुल्क के अवाम का साथ देता था, जो आज असहाय और बेबस है, कुछ उसी तरह से जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों में यहूदियों का हाल था।    &lt;br /&gt;बहुत लोग कहेंगे कविता प्रासंगिक नहीं है, लेकिन मन किया तो ब्लॉग पर डाल रहा हूं, पसंद आए तो बताना...     &lt;br /&gt;इसे मेरे कविताओं के ब्लॉग &lt;a href="http://krantikatoofan.blogspot.com/2010/04/blog-post.html"&gt;&lt;font color="#cb0101"&gt;‘क्रांति’&lt;/font&gt;&lt;/a&gt; पर भी पढ़ा जा सकता है &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;…………………………..&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;गाज़ा जिन दिनों सह रहा था यातना    &lt;br /&gt;इस्त्राइली टैंक जब उसका सीना कुचल रहे थे     &lt;br /&gt;बमों के धुंए से घुट रहीं थी जब उसके लोगों की सांसे     &lt;br /&gt;भूख से बिलखते बच्चे टैंको पर पत्थर बरसा रहे थे,     &lt;br /&gt;तब उस सर्द दिन, गाज़ा से बहुत दूर किसी दूर देश में     &lt;br /&gt;दौड़ पड़े सैकड़ों कदम, गाजा तेरे साथ में,     &lt;br /&gt;करने इस्त्राइली बर्बरता का विरोध,     &lt;br /&gt;देने फिलीस्तिीनी अवाम का साथ,     &lt;br /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वो लड़की,    &lt;br /&gt;सख्त चेहरा, मजबूत और एक जिंदा दिल लिए     &lt;br /&gt;जिसके नारों का गर्जन, युवामय उत्साह और जोश     &lt;br /&gt;भीड़ के आक्रोश के साथ मिल,     &lt;br /&gt;सजीव बना रहा था, उस दिन की स्मृतियों को     &lt;br /&gt;गाज़ा धुंए में सुलग रहा था, और कुछ नौकरशाह,     &lt;br /&gt;किसी सुदूर मुल्क के राजदूतावास में चैन की नींद में थे,     &lt;br /&gt;विद्रोह से उनकी नींद में कुछ खलल तो पड़ा शायद,     &lt;br /&gt;या देशी बबर्रों की फौज पर उन्हे पूरा भरोसा था     &lt;br /&gt;अराफत का काफिया बांधे वो दडिय़ल सा युवक,     &lt;br /&gt;सीना तान खड़ा था, उनकी लाठियों को देते चुनौती     &lt;br /&gt;शायद उसे भरोसा था, कि उसकी छोटी सी कोशिश     &lt;br /&gt;साथ ले पाएगी किसी दिन लाखों-लाख अवाम को,     &lt;br /&gt;और तब शायद छंटेंगे,&amp;#160; गाज़ा पर से धुंए के बादल!&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-966322024316459319?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/966322024316459319/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/04/blog-post_29.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/966322024316459319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/966322024316459319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/04/blog-post_29.html' title='वो फिलिस्तिीन का साथ'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S9kiObWdanI/AAAAAAAAAI8/WNFeHI7Mi_c/s72-c/gaza_delhi_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4246562599984776658</id><published>2010-04-09T23:26:00.001+05:30</published><updated>2010-04-09T23:42:37.716+05:30</updated><title type='text'>कॉलेज का आखिरी दिन</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S79qVH6_5HI/AAAAAAAAAIw/fatc6BefmZ4/s1600-h/college%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 5px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="college" border="0" alt="college" align="left" src="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S79qV3aAcgI/AAAAAAAAAI0/xtCyHvaZzYQ/college_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="257" height="194" /&gt;&lt;/a&gt; आज बहुत सी यादों को अलविदा कहने का दिन था, मसलन हमारे कॉलेज की लाईब्रेरी को ही ले लीजिए जिसमें न जाने कितने सारे अच्छे पल बिताए हैं, तीन साल तक पल-पल उसके प्यार की सुगबुगाहट को महसूस किया है, कितने सारे एग्जाम्स के नोट्स वहीं पर कलम घिस-घिसकर तैयार किए हैं, कल अपनी इस पुरानी जगह से एक नए रूम में शिफ्ट हो जाएगी। आज आखिरी दिन उसने(लाईब्रेरी ने) बड़ी बेरुखी दिखाई। खैर यह वही कॉलेज है जिसमें प्रो. ओम गुप्ता, महेश सर, शशि नैयर सर, धर सर, अमिय मोहन सर,&amp;#160; और पवन सर जैसे दिग्गजों ने जहां हमारी प्रतिभा को तराशा वहीं पूजा मैम, शिखा मैम, हनी मैम, सुप्रज्ञा मैम, सिल्की मैम व किरण मैम के स्नेह ने हमेशा हमारे लक्ष्य की राह पर हमें अडिग रखा। इसी कॉलेज में अक्षर-अक्षर जोड़ कर हमने टाइप करना और लिखना सीखा, आशुतोष और शुक्ला जैसों के साथ बहुत से गंभीर मुद्दों पर जमकर बहसें भी हुईं। जिंदगी के बहुत से सबक जिनसे शायद भविष्य में दो-चार होना पड़े, वे भी हमें इसी दौरान सीखने को मिले। तो जनाब आज इतनी सारी यादों को अलविदा कहने का दिन था, खैर ऑफिश्यल अनाउंसमेंट(फेरवेल) में अभी समय है, लेकिन मेरे इस दिल पर तो कुछ ऐसी ही गुजरी।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; तीन साल पहले जब मैं इस कॉलेज में आया था तो यह तो पता था कि पत्रकार बनना है, लेकिन उस समय कोई भी मुझे देखता तो उसे मेरे पत्रकार बनने पर शुबहा ही होता। कारण भी था, मैं बहुत दब्बू था, पहले दिन ही रैगिंग के डर से आशुतोष का हाथ पकड़कर बाहर निकला था। यह डर समय के साथ कब गायब हो गया पता ही नहीं चला। बगल में मौजूद जेएनयू के माहौल का हम सब पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। वहां की चट्टानो में भी हमें जिंदगी का संगीत सुनाई देता था, कितनी दोपहरें हमने वहां फोटोग्राफी करते गुजारी हैं, और फिर थककर गोपालन जी की कैंटीन की किसी मेज किनारे पसर जाना। इस दौड़ में हमने बहुत से वर्चस्व के संघर्षों को भी झेला, खासतौर से जिसे मीडिया की भाषा में 'पालिटिक्स’ कहा जाता है। और साधारण भाषा में इसका अर्थ है कि एक शख्स खुद को ऊपर उठाने के लिए दूसरे की प्रतिभा को कुचलकर आगे बढ़ जाता है। तरह-तरह की तिकड़मी शख्सियतें भी इस दौरान हमसें दो-चार हुईं। पर आखिर में मैगी नूडल्स के पके हुए रसे की तरह हम एक-दो साथी ही एक दूसरे के साथ रह गए। दोस्ती क्या होती है, वो मुझे इस कॉलेज से जानने को मिला।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अब आखिर में तो मुझे लिख ही लेने दो, अपने दिल की बात कहने ही दो। इस कॉलेज से जिंदगी में पहली बार प्यार के विरले अनुभव का भी मुझे मौका हासिल हुआ। बेशक इकतरफा ही सही, लेकिन प्रेम तो प्रेम ही होता है। न जाने क्यूं इन दिनों (या शायद पिछले जमानों में भी) प्रेम को चमक-दमक, पैसे, जायदाद, और स्मार्टनेस से ही जोड़कर क्यूं देखा जाता है? क्या गंवारों(नर्डस) को प्रेम करने का अधिकार नहीं है, या यह कुछ एलीट क्लास के सदस्यों के लिए ही बनाया गया है। जो उनकी सोसाइटी के तौर तरीके अपना लेता है, उसे वे प्रेम करने का स्पेशल पास इश्यू कर देते हैं! तब भी चाहे आशु इसे इंफेच्युएशन(आकर्षण) ही क्यूं न कहे, लेकिन हमने तो इसके सिवा प्रेम के किसी दूसरे रूप को अभी जाना ही नहीं, सामने वाला कभी इधर को इंफेच्युएट हुआ ही नहीं और गाड़ी आगे ही नहीं बढ़ी।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; पढ़ाई! बाप रे, पिछले तीन सालों के दौरान करीब ३२ विषयों की पढ़ाई कर डाली। तीसरी दुनिया से लेकर चौथी दुनिया तक इस दौरान सब ओर दौड़ लगा ली, शायद पत्रकारिता इसे ही कहते हैं। जैसा की पूजा मैम अपने हर लैक्चर में कहा करती थीं,     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; 'जैक ऑफ ऑल ट्रेड, मास्टर ऑफ नन’,     &lt;br /&gt;पर मुझे लगता है इसे मास्टर ऑफ सम कर दिया जाए तो बहुत बेहतर रहे। इस पढ़ाई में ऐसा कहीं न कहीं जरूर महसूस होता रहा कि अकादमिक स्तर पर हमारे विश्वविद्यालय को बड़े पत्रकारों से सलाह करके जरूर चलना चाहिए जिससे कि सेलेबस ऐसा बनाया जा सके जो बच्चों को आगे फील्ड के लिए तैयार कर सके, वर्तमान सेलेबस में यह बात जरूर खलती रही। हमें कांच का गुड्डा बनाने की कोशिश जरूर की गई, पर जरा बाहर निकल कर तो देखिए, यहां तो पी साईनाथ जैसे और प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार काम करते हैं, जिनके ड्रेस सेंस का ख्याल बेशक उन्हे न हो, लेकिन इस देश को किन बुनियादी परिवर्तनों की आकंाक्षा है इसका ज्ञान उन्हे खूब है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इंटरव्यू लेने की हमारी कला को बेशक थिएटर वाले सुरेश शर्मा जी ने नकार दिया हो, पर तब भी ओम सर की क्लासों के लिए की गई रिपोर्टिंग के दौरान हमें बड़ी-बड़ी हस्तियों का साथ नसीब हुआ, जिनके विनम्र स्वभाव और बौद्धिक स्तर के हम कायल हो गए। फिल्मों का ऐसा चस्का पड़ा कि दुनिया भर के प्रोग्रेसिव और यथार्थवादी सिनेमा के फैन हो गए। जनवादी तबकों में भी इस दौरान खूब बैठना रहा, जिसका असर हमारी उभरती हुई सोच पर बखूबी पड़ा।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; खैर इस रामकहानी पर तो मैं पोथियां लिख सकता हूं, बहुत दिनों के बाद अवकाश और कलम टिपटिपाने का मौका जरूर मिला है। पिछले कुछ महीनो से एक मासिक पत्रिका राष्ट्रीय प्रवक्ता में उप संपादक के रूप में तैनात था, अभी छुट्टियों पर हूं, तो ब्लॉग पर भी नजर आ रहा हूं। पर आज तीन साल की यादें और भड़ास आपके साथ बांट लेने से खुद को कुछ हल्का महसूस कर रहा हूं।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4246562599984776658?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4246562599984776658/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4246562599984776658'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4246562599984776658'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='कॉलेज का आखिरी दिन'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S79qV3aAcgI/AAAAAAAAAI0/xtCyHvaZzYQ/s72-c/college_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-7994571732611038512</id><published>2010-03-03T00:27:00.001+05:30</published><updated>2010-03-03T00:30:13.651+05:30</updated><title type='text'>हुसैन हमारा है</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S41fmDgu2BI/AAAAAAAAAH4/fsSwREZUPF8/s1600-h/hussain%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img title="hussain" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin: 0px 5px 0px 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="259" alt="hussain" src="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S41fm0Y5NyI/AAAAAAAAAH8/gGfHnqBoX0Q/hussain_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="172" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; हम रंगों का त्योहार मनाने में व्यस्त थे और खबर थी कि लगभग आधी सदी से ज्यादा वक्त तक रंगों से खेलने वाला हिंदुस्तान का मशहूर फनकार इस देश से हमेशा के लिए विदा लेने को मजबूर हो गया है। जी हां खबर है कि मकबूल फिदा हुसैन कतर की नागरिकता स्वीकारने को तैयार हो गए हैं। हुसैन का देश की नागरिकता को त्याग देना, भारत के संविधान की भी अघोषित मृत्यु का सूचक होगा, जिसकी अभिव्यक्ति की आजादी अब एक फासीवादी आंदोलन के हाथों दम तोड़ चुकी होगी।    &lt;br /&gt;हुसैन की कला पूरी एक सदी के विस्तार में बिखरी पड़ी है और उसकी उम्र आजाद हिंदुस्तान की उम्र से भी ज्यादा है। हुसैन ने अपना शुरु आती जीवन फिल्मों के पोस्टर बनाने वाले एक कलाकार के रूप में शुरु किया था, उस दौर में बड़े होर्डिंग छापे नहीं जाते थे, बल्कि दक्ष पेंटर उनको अपने हाथों से तैयार किया करते थे। जल्द ही लोगों को उनकी कला में प्रगतिशीलता का पुट दिखाई देना शुरु हुआ उनके चित्रों को प्रसिद्धि मिलनी शुरु हो गई। आजादी के बाद देश के विभिन्न शहरों में और खासतौर से दिल्ली में नेहरू के आह्वान पर हुसैन ने बहुत सी नए बन रहे सरकारी भवनों को अपनी तस्वीरों से एक नया आवरण दिया। ऐसा नहीं है कि हुसैन की कला सिर्फ चित्रों तक ही सीमित रह गई, बल्कि उन्होने तो उतने ही शौक से कुछ फिल्में भी बनाईं। बेशक उनकी फिल्में 'आर्ट' कैटेगेरी में ही रहीं लेकिन फिर भी हुसैन ने हर वो मुमकिन काम किया जिसके जरिए वे अपनी कला को अपने विचारों को अभिव्यक्त कर पाएं। शायद यही उनके लिए निकट भविष्य में मुसीबतों का कारण भी बना।    &lt;br /&gt;हुसैन की वो तस्वीरें जिन पर विवाद हुआ करीब ४० वर्ष पुरानी हैं&amp;#160; जबकि विवाद अभी बहुत हाल की ही चीज़ है। १९९० का दशक वो दौर था जब भारतीय जनता पार्टी ज्यादा से ज्यादा हिंदुओं का धु्रवीकरण करके इस देश की सत्ता हथियाना चाहती थी। बाबरी भी इसी मुहिम का एक हिस्सा भर थी। और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से जुड़े सहस्त्रमुखी संगठन भी इसमें शामिल थे। ऐसे ही कुछ संगठनो को उस दौर में हुसैन की तस्वीरों में भी कुछ ऐसा दिखाई दिया जिसके जरिए वे अपनी नफरत की इस मुहिम को कुछ और ईंधन मुहैया करवा सकें। बस तब से सिलसिला शुरु हुआ, हुसैन के घर पर हमले का, उनकी तस्वीरों वाली कला दीर्घाओं को तोडऩे-फोडऩे का और धार्मिक भावनाएं आहत होने के नाम पर कचहरियों में केस दर्ज करवाने का। आज हुसैन जैसे प्रतिष्ठित कलाकार के ऊपर अलग-अलग अदालतों में लगभग ९०० के करीब मामले दर्ज हैं, और सब की थीम वही है 'हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को पंहुचा&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S41foQDmPpI/AAAAAAAAAIA/VhrWXbAN_sY/s1600-h/mfhussain3%5B9%5D.jpg"&gt;&lt;img title="mfhussain3" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin: 5px 0px 0px 5px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="229" alt="mfhussain3" src="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S41fpM75FOI/AAAAAAAAAIE/e6MAHCgdMIg/mfhussain3_thumb%5B7%5D.jpg?imgmax=800" width="200" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आघात'! वैसे आज जिस रूप में हम देवी-देवताओं को अपने घर के मंदिरों में सजाते हैं, उनका वो स्वरूप ज्यादा पुराना नहीं है। तमाम तरह के हीरे जवाहरातों से लदे हुए, मलमल के वस्त्र पहने और मुकुट लगाए देवी देवताओं का पहला चित्रण हम 'राजा रवि वर्मा'(१८४८-१९०६) के चित्रों में पाते हैं। बस उसके बाद से देशी कलाकारों को वो ट्रेंड इतना पसंद आया कि उसके आधार पर ही बाद के तमाम चित्र, कैलेंडर, मूर्तियां इत्यादि बनाए जाने लगे। लेकिन इस सब के बीच कोर्णाक और खजुराहो को हम भुलाए दे रहे हैं। हुसैन के जिन चित्रों को अश्लील बताया जा रहा है दरअसल उनका उद्गम इन्ही कोर्णाक और खजुराहो के मंदिरों और गुफाओं में बनी मूर्तियों से होता है। इन मंदिरों की शिल्पकला को अगर गौर से देखा जाए तो उस दौर के शिल्पकारों ने भी ईश्वर को किसी सुपरफीशियल वस्तु के रूप में चित्रित नहीं किया है बल्कि उसे मनुष्य जैसा ही सरल बनाया है। और इस सब को दिखाने के लिए ही शिल्पकारों ने अपने शिल्प में 'काम भावना' का बढ़चढ़कर चित्रण किया है। हमारे आज के दौर का हिंदुस्तानी तालिबान शायद कला की मामूली समझा भी नहीं रखता है, या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनने के ढोंग में विश्वास रखता है। हुसैन के बारे में अक्सर एक बात बड़े जोर-शोर से प्रचारित की जाती है कि हुसैन हिंदू देवी-देवताओं के तो नग्न चित्र बनाते हैं, वे मुसलमानों के धार्मिक चरित्रों के साथ जरा सा खिलवाड़ कर के तो देखें! लेकिन जहां तक मुझे पता है हुसैन खुद को किसी धर्म का आदमी तो नहीं मानते, अपने जैसे बहुतों की तरह शायद वो भी नास्तिकता का पालन करते हैं। और वैसे भी उनका जन्म, लालन-पालन पंढरपुर में हुआ है जहां मुसलमान भी हिंदू धार्मिक त्यौहारों को उतना ही अपना मानते हैं जितना कि हिंदू। कुछ समय पहले वीर सांघ्वी की हिंदुस्तान टाइम्स में एक टिप्पणी छपी थी जिसके अनुसार उनका मानना था कि 'मुसलमानों में वैसे भी बुत पूजा का चलन नहीं होता इसलिए उनकी भी धार्मिक भावनाएं हुसैन यदि ऐसा कोई चित्र बनाते हैं तो आहत नहीं होंगी'! लेकिन वास्तिविकता और भी भयानक है, मुसलमानों में भी हमारे इन हिंदू तालिबानियों के जैसे तत्व सक्रिय हैं जो जनता को एक खुले अंदाज में सोचने का मौका नहीं देते हैं और उन्हे वो ही सोचने पर मजबूर करते हैं, जो वो उनके अनुसार 'समाज के दायरे में है'। हुसैन की 'भारत-माता' करके एक तस्वीर सबसे ज्यादा विवादों में रही। खासतौर से इसलिए कि इसने संघ परिवार की उस देवी के चरित्र पर प्रहार किया था जिसे वो पिछले इतने बरसों से एडवर्टाइज करते आए थे। इस तस्वीर में एक नग्न स्त्री के प्रसव के समय का चित्रण किया था जो भारत देश को जन्म दे रही थी। मैं नहीं समझता कि इस तस्वीर में कुछ भी अश्लील था, और अगर किसी को यह तस्वीर अश्लील लगती भी है तो फिर वो एक प्राकृतिक कार्य और अश्लीलता के बीच के फर्क को नहीं जानता है।     &lt;br /&gt;वैसे हुसैन की कला जो इतने उम्दा विचारों से लैस है, एक बाजार की वस्तु बना दी गई है, और वह भी खुद उन्ही के द्वारा। १९८९ की बात है खुद हुसैन के द्वारा बनाई गई तस्वीर सफदर हाशमी को भरत शाह नामक एक फिल्म व्यवसायी ने दस लाख रुपयों में खरीद कर अपने ड्राइंगरूम में सजा लिया। सफदर हाशमी मजदूरों का कलाकार था, जो उनके अधिकारों के लिए लड़ते-लड़ते आखिरकार १९८९ में ही शहीद हो गया था। मेरे विचार में इस तस्वीर का और सफदर की शहादत का इससे बड़ा अपमान कुछ भी नहीं हो सकता था। आज हुसैन एक बड़े चित्रकार हैं उनकी हर जगह मांग है। कतर के शाह ने भी एक संग्राहलय में बनने वाले भित्तीचित्रों को उनके निर्देशन में बनाने का काम उन्हे सौंपा था, आज हुसैन उसी कतर में बसने जा रहे हैं। वास्तव में यह व्यवस्था किसी उभरती हुई प्रतिभा को किस तरह से अपने आगोश में ले लेती है। हुसैन के कतर जाने का मैं विरोध तो नहीं करता हूं, हो सकता है उन्हे वहां कोई बहुत ज्यादा अभिव्यक्ति की आजादी उपलब्ध न हो, लेकिन कम से कम उम्र के इस आखिरी पड़ाव में उन्हे वहां कुछ पल सुकून के तो मिल ही पाएंगे।    &lt;br /&gt;कैसा होगा वो समय जब चित्रकार, पत्रकार और अन्य तबके कुछ भी काम करने से पहले इन कट्टरवादी संगठनो या नेताओं से इजाजत लेने पंहुचे। इसे देखकर मुझे याद हो आती है १५०० वर्ष पुरानी 'बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं' की जिन्हे तालिबान के लड़ाकों ने ध्वस्त कर दिया था और जहन में दूसरी तस्वीर उभरती है एक 95 वर्ष के बूढ़े शख्स और उसकी तस्वीरों की जो हमारे खुद के फासीवादी तालिबान के कारण अपनी जन्मभूमि से जुदा कर दिया जाएगा।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S41fqy6CnuI/AAAAAAAAAIc/TmYwK3tyNcg/s1600-h/mahabharata%5B11%5D.jpg"&gt;&lt;img title="mahabharata" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin: 5px 0px 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="257" alt="mahabharata" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S41fsHvOT1I/AAAAAAAAAIk/TL_S-I9qNP8/mahabharata_thumb%5B9%5D.jpg?imgmax=800" width="597" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-7994571732611038512?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/7994571732611038512/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7994571732611038512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7994571732611038512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='हुसैन हमारा है'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S41fm0Y5NyI/AAAAAAAAAH8/gGfHnqBoX0Q/s72-c/hussain_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-5318667891786238983</id><published>2010-01-26T23:51:00.001+05:30</published><updated>2010-01-26T23:51:44.813+05:30</updated><title type='text'>रेस्त्रां वैदरग्रीन</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S18ysANgQDI/AAAAAAAAAHs/6WwJuQz9skM/s1600-h/restaurant%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img title="restaurant" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin: 0px 10px 5px 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="166" alt="restaurant" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S18ytXvzc4I/AAAAAAAAAHw/RahUfi8jxj0/restaurant_thumb%5B6%5D.jpg?imgmax=800" width="246" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आज लखमी जल्दी ही सोकर उठ गया था, २६ जनवरी थी। एक ऐसा दिन जब पूरा देश गणतंत्र बनने की खुशी मना रहा था। राजपथ पर घुड़सवार, जल-थल-नभ सैनिकों के दस्ते, और टैंकखोर डिवीज़ने राजनैतिक नेतृत्व को सलामी देते हुए निकल रहे थे। आज दिल्ली चहक रही था, लोग सर्दी के कोहरे का आनंद लेते हुए अपनी रजाइयों में दुबक कर टेलीवीज़न पर परेड का रुटीन दोहरा रहे थे। पर लखमी, वो क्यों इतने खुशनुमा दिन, जल्दी उठ गया था, वो क्यों नहीं ज्यादा देर तक सो रहा था, क्या उसका मन नहीं था परेड देखने का? दरअसल लखमी बुलेवार्ड अवेन्यु के पास बने वैदरग्रीन रेस्त्रां का एक वेटर था, उम्र रही होगी यही कोई १६-१७ साल। होंठो पर मूंछो के रोंए, पतला सा चेहरा, औसत सा कद लगभग इतना कि वो आपकी नजरों में खटकता तो यकीनन नहीं!     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आज २६ जनवरी थी, सबसे ज्यादा कमाई का दिन, लखमी को यहां काम करते हुए अभी कोइ्र्र बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए थे, पर उसने मालिक को बोलते सुना था कि आज बहुत ज्यादा काम रहने वाला है और कमाई भी बहुत ज्यादा अच्छी होगी। लखमी की मां, बाप, भाई,बहन कोई भी नहीं था। बस उसने फुटपाथ के नजदीक बने स्लैब को ही घर के रूप में पहचाना था, और मां का प्यार उसे उन महिलाओं से मिल जाता जो दान-पुण्य कमाने के बहाने इन बेघर छोकरों को जब-तब कुछ दे जातीं। बेघर लड़कों की टोलियों में घूमते हुए उसने बहुत से हुनर सीखे, जब वो छोटा था तो बूटपॉलिश का काम किया करता था, फिर धीरे-धीरे उसने एक बेक्ररी के अंदर खुद को जमा लिया और कई सालों तक वहां भिन्न प्रकार की चीज़ें बनानी सीखीं, उसने कुछेक साल एक मेमसाब के घर में काम भी करा फिर एकदिन मेमसाब फुर्र से अपने बेटे के पास विदेश चली गईं और लखमी जी सड़कों पर। कुछ ही दिन हुए उसके एक बचपन के दोस्त ने उसको इस वेदरग्रीन रेस्त्रां में वेटर की नौकरी दिलवा दी। लखमी भी इस नौकरी से खुश ही था, दिनभर काम करने के बाद रात का भोजन फ्री और वहीं एक कोने में फर्श पर सिमट कर सो जाना। छोटे लोगों के छोटे-छोटे अरमान और छोटी सी जिंदगी, न बहुत ऊंचा उडऩे के लिए आसमान और न उस ऊंचाई तक पंहुच पाने के लिए पंख।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आज रेस्त्रां में बहुत ज्यादा भीड़ है, लखमी को आज पल भर की भी फुर्सत नहीं है, उसके संगी साथियों का भी यही हाल है। बीच में कुछ मिनट पानी पीने के बाद सुस्ताने के लिए एयरकंडीशनर के पास खड़ा हो गया था कि मालिक ने लताड़ दिया। सूरज कब अपनी दुलकी चाल से पश्चिम के अंतिम छोर पर पंहुच कर सुर्ख लाल हो गया पता ही नहीं चला! धीरे-धीरे सर्द रात आसमान की चादर में से निकल कर दिल्ली के ऊपर छा गई। रेस्त्रां में 'रश' और भी ज्यादा बढ़ गया। रसोईघर और रेस्त्रां के बीच बना दरवाजा इस तरह से तेज-तेज फडफ़ड़ा रहा था मानो कोई अदृश्य हाथों से उसे हिला रहा हो। मालिक के सिर के ऊपर बनी देवप्रतिमाओं की नजरें वेटरों को ताक रहीं थी या ग्राहकों और तिजोरी में भरते जा रहे पैसे को यह बताना जरा मुश्किल था। सारा रेस्त्रां खचाखच भरा हुआ था, नए आते जा रहे ग्राहक बैरे से खुद को नंबर में फिक्स करवा कर, खाली सीट ढूंढने में व्यस्त थे। आज लखमी यह सोच कर बैठा था कि कमाई भी खूब होगी, लेकिन सारा पैसा तो मालिक की तिजोरी में जा रहा था, और बहुत बार ग्राहक उसके टिप के पैसे भी मारकर निकल जा रहे थे। खैर जैसे तैसे रात के बारह बजने के साथ ही ग्राहक भी रेस्त्रां से विदा हुए। मालिक आज हुई कमाई का हिसाब लिखने में बिज़ी था। लखमी भी ललचाई नजरों के साथ काउंटर के इर्दगिर्द मंडरा रहा था। मालिक ने पैसे का हिसाब करने के बाद नौकरों को शाबासी दी और तिजोरी की चाभी जेब में डालकर घर चला गया। रात गहरा रही थी, पर रेस्त्रां के नौकर जगे हुए थे। सब खुश थे आज अच्छी कमाई हुई थी, ऊपर लगी देवप्रतिमा भी धन को तिजोरी में सुरक्षित देख मुसकुराती सी लग रही थी। रात गहरा रही थी लेकिन फिर भी लखमी बाकी के बैरों के साथ ग्राहकों द्वारा छोड़ दी गई झूठन को साफ करने में बिज़ी था, क्योंकि आज २६ जनवरी थी।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-5318667891786238983?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/5318667891786238983/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/01/blog-post_26.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5318667891786238983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5318667891786238983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/01/blog-post_26.html' title='रेस्त्रां वैदरग्रीन'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S18ytXvzc4I/AAAAAAAAAHw/RahUfi8jxj0/s72-c/restaurant_thumb%5B6%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-5431901401812551437</id><published>2010-01-14T23:21:00.001+05:30</published><updated>2010-01-14T23:21:48.001+05:30</updated><title type='text'>बेरंग महोत्सव</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S09Zro68DRI/AAAAAAAAAHg/HXIwroI3zRM/s1600-h/sr%5B13%5D.jpg"&gt;&lt;img title="sr" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin: 0px 10px 5px 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="147" alt="sr" src="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S09ZsuSwGJI/AAAAAAAAAHk/_EgsCtMn9c0/sr_thumb%5B7%5D.jpg?imgmax=800" width="269" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;#160; थिएटर देखने का मन बहुत दिनो से कर रहा था, कारण भी था, जब से सुरेश शर्मा जी ने इंटरव्यू बाइट लेते हुए अपनी महानता की झिड़की दी थी तब से इस माध्यम से मोह-भंग सा होता हुआ प्रतीत हुआ था। भोपाल के थिएटर कलाकार होणाजी भाई ने अभी कुछ ही दिन पहले सूचना दी कि वे रंग महोत्सव में भाग लेने के लिए दिल्ली आ रहे हैं, तब जाकर ही थिएटर की ओर फिर से ध्यान गया। और बस जा पंहुचे बहवालपुर हाउस में स्थित एनएसडी कार्यालय।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; जैसे ही टिकट काउंटर के नजदीक पंहुचे तो देखते क्या हैं, एक लंबी सी तटस्थ क्यू। सोवियत रूस के अंतिम दिनों में राशन के लिए इस तरह की क्यू लगा करती थीं। यहां फर्क सिर्फ इतना है कि कला-दर्शन की अपनी क्षुधा शांत करने के लिए लोग कतार में लगे हुए थे किसी भी कीमत पर मनपसंद नाटक का एक टिकट पाने की ललक में। लेकिन अफसोस सुबह से शाम तक क्यू में लगे रहने के बाद भी नंबर नहीं आया, आशुतोष ने तिकड़म भिड़ाई और दो सज्जनों को पटा कर उनके जरिए चार टिकटों का इंतजाम करवा लिया। मनपसंद नाटक तो नहीं मिले पर जो मिले वो ही सही। आखिर नाटक करने वाले भी इंसान हैं कितने शो करेंगे एक ही नाटक के, कोई फिल्म तो है नहीं। बहुत से लोगों को मायूस भी लौटना पड़ा।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आज युवा पीढ़ी को दोष दिया जा रहा है कि वो थिएटर से कटती जा रही है, लेकिन इतने बड़े रंगमहोत्सव की इतनी लचर कार्यप्रणाली को देखकर तो यही लगा कि थिएटर जनता से कटता जा रहा है, और वाकई अब इसका मकसद रूस, चीन और अमेरिका घूम आना भर रह गया है। गांव-देहात के लोग अभी भी किसी सखाराम बाइंडर से परिचित नहीं और वो अभी भी अपनी उसी पुरानी रामचरित्रमानस के साथ जी रहे हैं, वहां कोई नहीं है उन्हे रोशनी दिखाने वाला।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-5431901401812551437?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/5431901401812551437/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5431901401812551437'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5431901401812551437'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='बेरंग महोत्सव'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/S09ZsuSwGJI/AAAAAAAAAHk/_EgsCtMn9c0/s72-c/sr_thumb%5B7%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-7227269548472511077</id><published>2009-12-10T23:29:00.001+05:30</published><updated>2009-12-10T23:29:26.739+05:30</updated><title type='text'>मेरी शिक्षा-तेरी शिक्षा</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SyE2-e85jiI/AAAAAAAAAHA/p6FmF8q39y8/s1600-h/education%5B7%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 5px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="education" border="0" alt="education" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SyE2_clF93I/AAAAAAAAAHE/qtwck64m0E4/education_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800" width="413" height="232" /&gt;&lt;/a&gt; फिर से एग्ज़ाम शुरु होने वाले हैं, रोज-रोज की इस बला से अब उक्ताहट भी होने लगी है। कभी-कभी लगता है कि एग्ज़ाम बंद हो जाने चाहिएं, लेकिन फिर सोचता हूं कि बौद्धिक स्तर को जांचने का इससे बेहतर विकल्प और क्या हो सकता है। शायद यही कारण है कि शिक्षाविद एग्जाम्स को आउट-कास्ट करने से बचते रहे हैं, लेकिन क्या वाकई?     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इम्तिहान या एग्ज़ाम ऐसे दानव का नाम है जो शुरु से बच्चों को डराता आया है। कारण शायद विषय पर कमजोर पकड़ भी या फिर कम समय में बहुत ज्यादा ठूंसने की मजबूरी, या फिर फेल हो जाने का डर। एग्जाम सिरदर्द ज्यादा बनते हैं, बच्चों के लिए भी और शिक्षकों के लिए भी। कोर्स खत्म करवाने से लेकर, उत्तर जांचने सरीखे बहुत से काम होते हैं जो परेशानी का सबब बनते हैं। इतनी सारी परेशानियां होते हुए भी एग्जाम सबसे ज्यादा उम्दा तरीका समझा जाता है। इसके बहुत से कारण हो सकते हैं, सबसे प्रमुख तो यह कि हमारे देश में कोई एकीकृत शिक्षा प्रणाली नहीं है, डीपीएस जैसे स्कूल होने के बावजूद भी बच्चे गांवों और कस्बों के इंटर कॉलेजों में जाया करते हैं! वाकई कितनी अजीब बात है, मैरी अंतोनेत जिंदा होती तो शायद यही कहती। अब होता यह है कि अगर कोई प्रोग्रसिव सा शिक्षाविद कोई प्रोग्रेसिव सी शिक्षा नीति बना भी दे तो होता क्या है कि कान्वेंट में पढ़े बच्चे तो उसे आसानी से टॉप कर जाएंगे लेकिन देहात के बच्चे को यही समझने में समय लग जाएगा कि डिबेट-डिस्कशन का मतलब कया होता है। और अगर मतलब समझ भी लिया तो गजब के कांफिडेंस और गिटपिट अंग्रेजी के आगे आखिर कितनी देर तक वो ठहर पाएगा। लेकिन विडंबना यह भी है कि एकिकृत शिक्षा नीति न होने के कारण सीबीएसई तो अपने पाठ्यक्रम को लचीला स्वरूप देने में कामयाब हो जाता है जबकि राज्य शासित शिक्षा बोर्ड वही अस्सी वर्ष पुराना स्वरूप बनाए हुए हैं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; एग्ज़ाम होने का सबसे ज्यादा फायदा भी शिक्षकों को होता है, एग्ज़ाम के पूरे सीज़न तो पढऩे-पढ़ाने से भी पूरी तरह से छुट्टी रहती है, अगर दूर के किसी केन्द्र पर ड्यूटी लगी तो टीए-डीए अलग से मिलता है। एग्ज़ाम सीज़न के बाद कॉपी जांचने का जब समय आता है तो और भी मजे, जितनी ज्यादा कॉपी जांची उतने ज्यादा पैसे मिले उसपर खाना पीना अलग अलाउंस अलग। कई सरकारी और प्राईवेट स्कूलों का हाल तो इतना बुरा है कि शिक्षक क्लास में स्लेबस पूरा ही नहीं करवाते और उसे इतना बोझिल बना देते हैं कि बच्चों को कई विषयों से नफरत ही हो जाती है। बाद में यही शिक्षक उसी विषय का प्राईवेट ट्यूशन देते हैं, कमाई का एक और तरीका। किसी राज्य की सरकार ने कुछ वर्ष पहले सरकारी शिक्षकों के ट्यूशन पढ़ाने के कार्य को अवैध घोषित कर दिया था। लेकिन यह नाकाफी ही साबित हुआ क्योंकि इस सब के बावजूद भी शिक्षकों ने कक्षाओं के माहौल को बोक्षिल बनाए रखा।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इस देश में प्राईवेट एड्यूकेशन के नाम पर बहुत ही विकट समस्या को पाल पोस कर बड़ा किया जा रहा है। इसके पीछे दलील काम करती है कि जो खरीद सकता है उसे क्यों न अच्छी शिक्षा मुहैया करवाई जाए। लेकिन बाकियों का क्या करें भाई! दूसरी परेशानी है कि अधिकतर शिक्षक सिर्फ इसलिए ही शिक्षक हैं क्योंकि वो किसी और जॉब के लिए पर्फेक्ट नहीं थे। इस समय बेहतर शिक्षा का केन्द्र शहरों में है। चलिए क्यूबा का उदाहरण लेता हैं, १९५९ में क्यूबा की मुक्ति के बाद शहरों के स्कूलों में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षकों का ट्रांसफर गावों में कर दिया गया था। इस सब का नतीजा है कि आज क्यूबा की साक्षरता दर ९५ फीसदी है। वहां उच्च स्तर तक की शिक्षा मुफ्त है, मतलब जितना जी चाहे मुफ्त में पढ़ो।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; शिक्षा से शील का आगमन भी होना चाहिए लेकिन पब कल्चर को अपनाने वाला हमारा पढ़ा लिखा यूथ इस बात को लेकर तो सचेत है कि कहीं उसके किसी अधिकार का हनन तो नही हो रहा, लेकिन दूर-दराज के लोगों के बारे में सोचते वक्त या फिर सड़कों पर घूम रहे अनपढ़ भिखारियों को देखकर उसकी चेतना का हास होने लगता है, और वो इन सब मुद्दों पर वही रटी-रटाई पोथियां दोहराने लगता है जो उससे पहले की पीढिय़ां अब तक दोहराती आई हैं।&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इसलिए फिलहाल तो इतनी सारी रुकावटों के कारण एग्जाम्स से मुक्ति पाना आसान नहीं लग रहा है। &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-7227269548472511077?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/7227269548472511077/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/12/blog-post_10.html#comment-form' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7227269548472511077'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7227269548472511077'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/12/blog-post_10.html' title='मेरी शिक्षा-तेरी शिक्षा'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SyE2_clF93I/AAAAAAAAAHE/qtwck64m0E4/s72-c/education_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4021898478029763658</id><published>2009-12-08T23:11:00.001+05:30</published><updated>2009-12-08T23:20:17.009+05:30</updated><title type='text'>रिसर्चर हो जाएं सावधान</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sx6Ps-k6fSI/AAAAAAAAAGw/M6LDr_iStKM/s1600-h/research%5B4%5D.gif"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="research" border="0" alt="research" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sx6PtjVH0-I/AAAAAAAAAG8/YK1OFg55gYI/research_thumb%5B2%5D.gif?imgmax=800" width="254" height="254" /&gt;&lt;/a&gt; रिसर्च का अपने आप में ही विशिष्ठ महत्व है, सबसे खास तो यह कि इसमें एक रिसर्चर का अपना खुद का नजरिया और उसकी असीम मेहनत छिपी होती है। दूसरा यह कि हर रिसर्च रिपोर्ट अपने आप में खास होती है, और अब तक के अनछुए विषयों का गहनता के साथ विस्तार करती है। आजकल तो बीए जैसे कोर्स में भी लघु-शोधपत्र जमा करवाने होते हैं, एमफिल और पीएचडी की तो बात ही अलग है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; रिसर्च की जो परिभाषा है उसके अनुसार, पहले से खोजी जा चुकी चीज़ों को नकारते हुए, उनकी त्रृटियों को सुधारते हुए कुछ नया तलाशा जाना, रिसर्च कहलाता है। वैसे इसे ज्ञात से अज्ञात की यात्रा भी करार दिया जा सकता है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जो शोध किया जा रहा है वो वास्तिवक हो और चुराया न गया हो। इसलिए रिसर्च(शोध) गाइड का महत्व और भी बढ़ जाता है। एक शिक्षक की तरह से गाइड अपने शोधार्थी की हर गलती को पहचानकर उसे दूर करता है, और साथ ही यह भी सुनिश्चित्त करता है कि रिसर्च अपनी लीक से न भटक जाए। बीए, एमए जैसे कोर्स में शिक्षक ही गाइड की भूमिका अदा कर देते हैं, लेकिन एम0फिल0, पीएचडी में अलग से कोई सीनियर प्रोफेसर गाइड की भूमिका अदा करता है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वैसे इन दिनो हर ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। पैसे और माया के बल पर लोग हर चीज़ खरीद सकते हैं। ऐसे में शिक्षा का क्षेत्र भी पैसे के इस खेल से अछूता नहीं रहा है। हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक डा0 कुंवरपाल सिंह के शब्दों में “…….शोध कार्य में शोध-निर्देशक और शोधार्थी के बीच रिश्ते गुरु-शिष्य के नहीं बल्कि दुकानदार और ग्राहक के होते हैं और दोनो ही इस दूसरी भूमिका में खुश हैं लेकिन वास्तव में यह उच्च शिक्षा के साथ मज़ाक ही है।” और इस सब का दुष्परिणाम यह हुआ है कि इस देश में उच्च शिक्षा प्राप्त ही एक बेहतर नौकरी के लिए करी जाती है! इस व्यापार का खामियाजा उन शोधार्थियों को उठाना पड़ता है जो ईमानदारी के साथ अपना काम करते हैं। सबसे पहले तो उनकी रिसर्च को शक के साथ देखा जाता है, दूसरे नेहरू प्लेस और बेर सराय जैसी जगहों पर जहां रिसर्च रिपार्ट बाइंड होने दी जाती है, कॉपी होकर तीन-तीन सौ रुपए में बिक जाती है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वैसे रिपोर्ट की कीमत उसकी क्वालिटी पर भी निर्भर करती है। बीए, एमए के छोटे शोधपत्रों का मूल्य तीन सौ रुपए फिक्स है, जबकि पीएचडी की रिपोर्ट के तीन हजार रुपए तक वसूले जाते हैं। हां इसमें छपाई और बाइंडिंग का मूल्य शामिल नहीं है। इतने पैसे में रिपोर्ट सिर्फ आपके ई-मेल तक पंहुचाई जाती है।&amp;#160; नेहरू प्लेस और बेर सराय जैसी जगहों पर जब कोई शोधार्थी अपनी रिपोर्ट छपवाने के लिए जाता है तो उसकी सॉफ्ट कॉपी कंप्यूटर पर स्टोर कर ली जाती है, बाद में कुछ फॉरमैटिंग वगैरह करने के बाद इसे बेचने के लिए तैयार कर लिया जाता है। कभी-कभी तो बाइंडिंग के लिए दी गई हार्ड कॉपी को भी फोटोस्टेट कर लिया जाता है, आपने अगर पेज के नीचे अपना नाम भी डाल दिया हो तो उसे भी फोटोस्टेट के समय मिटा दिया जाता है। लेकिन यह फोटोकॉपी वाली प्रक्रिया बहुत ही महत्वपूर्ण शोधपत्रों के लिए अपनाई जाती है, और इनकी कीमत भी बहुत ज्यादा होती है। यह चोर इतनी चालाकी से अपनी इस खूबी को एडवर्टाइज़ कर रहे हैं कि लोग दांतो तले अंगुली दबा लें।&amp;#160; वे दावा करते हैं कि उनके पास प्रशिक्षित लोगों की टीम है जो रिसर्च रिपोर्ट तैयार करती है, लेकिन असलियत क्या है यह ग्राहक भी समझता है और दुकानदार भी।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वैसे इन सभी तिकड़मों से बचने के भी कुछ कारगर तरीके हैं।     &lt;br /&gt;-सबसे पहले तो यह कोशिश करें कि प्रिन्ट या तो घर पर ही निकाले या फिर किसी विश्वसनीय जगह से।     &lt;br /&gt;- अपने रिसर्च गाइड की आज्ञा से पेज के बीचों बीच अपने नाम का वाटरमार्क भी डाल सकते हैं, जिससे रिसर्च फोटोकॉपी न हो सके।     &lt;br /&gt;-हो सके तो रिसर्च लिखते वक्त कुछ चीजें कोड में उसके बीच में डाल दें। जैसे आपका नाम, पेज में अलग अलग शब्दों में कुछ अक्षर निकालने पर आपका नाम बन जाना चाहिए, उदाहरण के लिए: &lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;P&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;raise the &lt;strong&gt;&lt;u&gt;A&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;uthentic Attempts of Research to &lt;strong&gt;&lt;u&gt;L&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;eft the fie&lt;strong&gt;&lt;u&gt;l&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;d with finest &lt;strong&gt;&lt;u&gt;A&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;nd &lt;strong&gt;&lt;u&gt;V&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;ivid&amp;#160; examples of human&amp;#160; wisdom.&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बोल्ड में दिखाए गए अक्षरों से मेरा नाम बनता है, थोड़ी समझदारी के साथ टैक्स्ट में कहीं कहीं ऐसे कोड छोड़े जा सकते हैं! &lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;-बाइंड करवाने के लिए भी कोई जान-पहचान की दुकान चुनी जा सकती है।    &lt;br /&gt;-रिसर्च सबमिट होने के बाद कोशिश यह करें कि वो जल्द से जल्द ऐप्रूव हो जाए।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वैसे विडंबना यह भी है कि चोर आज इतने हाइटेक होते जा रहे हैं, पीडीएफ जैसे फोर्मेट भी सुरक्षित नहीं रहे, कोई अनाड़ी भी गूगल की मदद से पीडीएफ की सुरक्षा तोड़ सकता है। रिसर्च को सब्मिट करते समय जो आप सीडी देते हैं, वो भी चोरी हो सकती है। अक्सर प्रोफेसर पेज के बीच वाटरमार्क डालने की भी इजाजत नहीं देते। इसलिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि इन सफेदपोश चोरों का खुलासा किया जाए, और इस मुहिम में प्रोफेसरों को भी साथ लेने की कोशिश की जाए। &lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;---------------------------------    &lt;br /&gt;डा0 रवि कुमार धर को समर्पित जिनके स्नेहशील अध्यापन की वजह से रिसर्च के प्रति मेरे मन में अनुराग उत्पन्न हुआ। &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4021898478029763658?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4021898478029763658/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/12/blog-post_08.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4021898478029763658'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4021898478029763658'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/12/blog-post_08.html' title='रिसर्चर हो जाएं सावधान'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sx6PtjVH0-I/AAAAAAAAAG8/YK1OFg55gYI/s72-c/research_thumb%5B2%5D.gif?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-2368467163320567060</id><published>2009-12-05T11:16:00.001+05:30</published><updated>2009-12-05T11:16:44.262+05:30</updated><title type='text'>कोई चिरनिद्रा में लीन, सैकड़ो अनाम ताबूतों पर</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SxnzwBqkQ4I/AAAAAAAAAGc/tiB77z_5-qo/s1600-h/031220091059%20copy%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="031220091059 copy" border="0" alt="031220091059 copy" align="left" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SxnzwpoREcI/AAAAAAAAAGg/10Gh92A5Lio/031220091059%20copy_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="240" height="231" /&gt;&lt;/a&gt; कल कॉलेज के काम से लोधी रोड गए हुए थे, वापस लौटते में सामने सफदरजंग का मकबरा पड़ा। अक्सर होता था कि इसे सड़क के सामने से निहारते ही गुजर जाया करता था, लेकिन कल आशुतोष भी साथ था तो सोचा चलो लगे हाथ इसे भी देखते हुए चलते हैं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आकर््योलॉजिकल विभाग ने इसके भ्रमण के लिए पांच रुपए का मामूली सा शुल्क लगाया हुआ है, यहां इतिहास के विद्यार्थियों और हम जैसे घुमक्कड़ों के अलावा सबसे ज्यादा मौजूदगी रहती है युवा जोड़ों की, जो मकबरे के शांत माहौल में कुछ सुकून के पल तलाश रहे होते हैं। मुगलों के तिकड़मी और शक्तिशाली वजीर सफदरजंग के लिए इस मकबरे का निर्माण किया गया था। यह वही सफदरजंग था जो अपनी तिकड़मों के बल पर अवध का नवाब बन बैठा था और बाद में कमजोर मुगल शासक मुहम्मद शाह ने इसे अपना वजीर भी नियुक्त कर दिया। १७५४ में बनकर तैयार हुए इस मकबरे को मुगल वास्तुशिल्प का अद्भुत उदाहरण कहा जा सकता है। चारों तरफ से बागों से घिरे इस मकबरे में फव्वारे भी लगे हुए होंगे जो किसी जमाने में कितनी चांदनी रातों के सौंदर्य में अपनी छठा बिखेरते होंगे। दिल्ली सरकार ने यह फैसला लिया है कि आने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए इस मकबरे को भी सजाया-संवारा जाएगा। पूरी परिसर के बीचों-बीच स्थित है मकबरे की इमारत। इसकी विशालता आँर बेजोड़ता बरबस मन मोह लेती है। सफदरजंग की असली कब्र वो नहीं है जिसे हम अक्सर देख कर लौट लेते हैं, असली कब्र इमारत के नीचे मौजूद तहखाने में है।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आक्र्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, इन इमारतों का रखरखाव कर तो रहा है लेकिन फिर भी बहुत ही लापरवाही के साथ इस काम को अंजाम दिया जा रहा है। इमारत के हर हिस्से से, उसकी बारिकी से परिचित करवाने वाले आलेख-पट्ट हर जगह नदारद ही मिले। अंदर मौजूद गार्ड क्रिकेट कमेंट्री सुनने में ज्यादा मशगूल था, और जिस इमारत की वो रखवाली कर रहा था उसके इतिहास का बहुत आधा-अधूरा सा बोध उसे था। कम से कम ऐसी जगहों पर तैनात लोगों को ट्रेनिंग अवश्य दी जानी चाहिए, जिससे नए आने वाले लोगों को इतिहास के इस टुकड़े से वे कुछ हद तक तो परिचित करवा पाएं।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; दिल्ली में बहुत सी ऐतिहासिक इमारतें इधर-उधर गली-मुहल्लों, रेलवे ट्रेकों, और सड़कों के किनारे यूं ही बिखरे पड़े हैं, इनके इतिहास से भी आसपास के लोग अनजान हैं। इनके इतिहास को खंगाल कर और उसे वर्तमान के आवरण से सजा कर आने वाले किसी लेख में आपके सामने यहीं पर प्रस्तुत कर दूंगा।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-2368467163320567060?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/2368467163320567060/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2368467163320567060'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2368467163320567060'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='कोई चिरनिद्रा में लीन, सैकड़ो अनाम ताबूतों पर'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SxnzwpoREcI/AAAAAAAAAGg/10Gh92A5Lio/s72-c/031220091059%20copy_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-9091563387348788110</id><published>2009-11-28T12:07:00.001+05:30</published><updated>2009-11-28T12:07:03.595+05:30</updated><title type='text'>राखी: कब आएगी बारात</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SxDFCzA4spI/AAAAAAAAAGU/OvQQl3hh3lA/s1600-h/Buniyaad%5B8%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 5px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="Buniyaad" border="0" alt="Buniyaad" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SxDFDroJ_iI/AAAAAAAAAGY/V9U_LSkcr5Y/Buniyaad_thumb%5B6%5D.jpg?imgmax=800" width="202" height="244" /&gt;&lt;/a&gt; मुझे शुरुआत से ही पारिवारिक टेलीवीजन कार्यक्रमों में कोई रुचि नहीं थी। हम लोग वगैरह फिर भी बहुत हद तक अच्छे सोप्स कहे जा सकते थे, कारण उनकी यथार्थवादी पृष्टभूमी कही जा सकती है। लेकिन जमाना बदला, और जमाने के साथ बदली तस्वीर। टेलीवीजन बूम के साथ ग्लोबल मार्केट दर्शकों के कमरों तक पंहुच गया। दूरदर्शन का दर्शन बहुत अदूर्दशी साबित हुआ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आज आलम यह है कि अपने आपसी कॉम्पीटीशन की आड़ में टेलीवीज़न चैनल हर तरह का हथकण्डा अपना रहे हैं। चैनल्स को इस बात का तो अहसास हो ही गया था कि लोग अब बिग बौस सरीखे कार्यक्रमों से बोर होने लगे हैं । इस सब के बीच क्रिण्टिव डायरेक्टर्स ने नीवं रखी कुछ नए सीरियल्स की। राखी जी को इस सब के बीच भारत की प्राचीन स्वयंवर प्रथा का अनुभव भी हो गया, उन्होने छोटे बच्चे पालने भी सीख लिए, साथ ही टीनएजर्स के एजीटेशन का भी उन्हे अनुभव हुआ, और अब तो वृद्धों की सेवा कैसे की जाए वो और इलेश इसकी भी प्रैक्टिस कर रहे हैें। जब मार्केट के दिग्गज खिलाडिय़ों ने देखा कि इमेजिन जैसा नया चैनल उन सब को पछाडऩे के बिल्कुल नजदीक है तो वे सब भी कॉम्पिटेटिव मूड में आ गए। नतीजा था स्टार का प्रोग्राम, पर्फेक्ट ब्राइड,&amp;#160; वहीं दूसरी तरफ जीटीवी और कलर्स अपने सोप फिक्शन्स से ही खुश थे।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; एक सबसे नकारात्मक पक्ष जो मुझे इन कार्यक्रमों का लगता है वो यह कि एक तरह से समाज को पीछे ले जाने के कार्य में यह भागीदार हैं। क्रिएटिव डायरेक्टर बेशक इसे क्रिएटिव फ्रीडम कहें, या फिर यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लें कि दर्शकों की मांग ही ऐसे सीरियल्स की है। लेकिन फिर तब भी उन्हे इस तथ्य को तो मंजूर करना ही होगा कि इन सब के कारण हमारे लोगों की सोच कहीं ज्यादा पुरानपंथी होती जा रही है। आप किसी बेहतर चीज़ के निर्देशन में भी तो इस क्रिएटिविटी का इस्तेमाल कर सकते हैं। आप कुछ ऐसा तो बना ही सकते हैं जिसे दर्शक पसंद भी करें, जिससे आपके बाजार का भी विस्तार हो और जो जमाने की सोच में भी कुछ नयापन लाने का काम करे।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; दूसरी सबसे बड़ी समस्या जो इन कार्यक्रमों और चैनल्स के साथ जान पड़ती है वो यह कि इन्होने मीडिया को भी अपना हमसाया बनाया हुआ है। इनके किसी भी नए कार्यक्रम का लॉंच हो, मीडिया उसे इस शिद्दत के साथ कवर करता है मानो कोई राष्ट्र्रीय खबर हो। मनोरंजन और खबर में एक अंतर रखा जाना चाहिए जिससे लोग दिगभ्रमित होने से बच जाएं। हम भी मानतें हैं कि खबरिया चैनलों की भी अपनी ही मजबूरियां है, उन्हे अपना २४ घंटे का स्लॉट जो भरना है।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-9091563387348788110?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/9091563387348788110/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/11/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/9091563387348788110'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/9091563387348788110'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='राखी: कब आएगी बारात'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SxDFDroJ_iI/AAAAAAAAAGY/V9U_LSkcr5Y/s72-c/Buniyaad_thumb%5B6%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-2513390970716770473</id><published>2009-10-24T21:46:00.001+05:30</published><updated>2009-10-24T21:46:14.592+05:30</updated><title type='text'>गलियों में बसी मेरी दिल्ली</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SuMoSSbIerI/AAAAAAAAAF4/Iau1iBys0SM/s1600-h/purani_dilli%5B13%5D.jpg"&gt;&lt;img title="purani_dilli" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin: 0px 10px 5px 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="189" alt="purani_dilli" src="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SuMoTPDzOGI/AAAAAAAAAF8/DyuSxeRVdVk/purani_dilli_thumb%5B11%5D.jpg?imgmax=800" width="284" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; जैसे रात के घने सन्नाटे के बाद प्रभात के आदित्य की पहली किरणें धरती का आलिंगन करती हैं, कुछ उसी तरह का अहसास मुझे इतने दिनों के बाद कलम उठाते हुए हो रहा है। बहुत से किस्से हैं बांटने के लिए, आप सोच रहे होंगे कि दिल्ली की गलियों का मेरे किस्सों से क्या संबंध? लेकिन पुरानी दिल्ली की गलियां कहीं न कहीं मुझे सम्मोहित करती रही हैं, कारण शायद यह भी कि यह मुझे मेरे शहर खुर्जा की याद तो दिलाती ही हैं लेकिन न जाने क्यों हर बार किसी न किसी तरह से मुझे एक किस्सा भी दे जाती हैं।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आप यह जानने को उत्सुक होंगे कि आखिर वो कौन सी वजह रही जो मुझे इतने दिन कलम उठाने से दूर रखे रही? वजह कुछ बड़ी थी, इस सेमेस्टर में हमें ईवेन्ट प्लान करने होते हैं। मैं कॉरपोरेट ईवेंटस में विश्वास नहीं रखता, इसलिए सोचा कि क्यों न कुछ कलात्मक ईवेंट प्लान करूं! नतीजा सामने था, फोटोग्राफी एक्जीवीशन। शुरुआत में सोचा था कि खुद का पैसा लगाकर इसे कामयाब बनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन फिर वीडियोकॉन, बीएचईएल, और ऑलटरनेटिव पैट्रोलियम टेक्रोलॉजिस से हमे मदद मिल गई। मदद भी इतनी मिली कि इस ईवेन्ट को हम पूरे दिल्ली के लेवल पर आयोजित करने में कामयाब हो पाए। हमने इस एक्जीवीशन का नाम रखा, आइरिस ०९।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; पुरानी दिल्ली की गलियां में, चाहे आप बल्लीमरान का जिक्र करें, या फिर मालीवाड़ा की,&amp;#160; आज वहां रिहायश रह ही नहीं गई है। अब ये गलियां तरह-तरह के बाजारों की पनाहगाह बन गई हैं। खैर कुद भी सही मुझे इन गलियों में से गुजरते हुए इतिहास की सुगबुगाहट महसूस होती है। मुझे सुनाई देता है, किसी बुजुर्ग का हुक्का गुडग़ुड़ाना, मस्जिद से आती अजान की मीठी सी आवाज अब भी सुनाई दे जाती है, यह बात कुछ और है कि पकौड़े वाले अब कागज की प्लेटों में पकौड़े सर्व करते हैं, और टिक्की वालों की दुकान पर पॉवभाजी भी अब मिलने लगी है। परांठे वाली गली तो इतनी मशहूर हो चुकी है कि वहां मिलने वाले परांठों के दाम दुगने-तिगुने हो चुके हैं। मेरे दोस्त, ग्रेटर नोएडा वासी आशुतोष का दम इन गलियों में घुस कर घुटने लगता है। बलजीत को भूख लगती है तो वो हमें मंहगे परांठे खिलाने को भी तैयार हो जाती है, और परमिंदर का तो चेहरा देखने लायक होता है जब उसके सामने मलाईदार लस्सी रख दी जाती है। किसी अच्छ खासे मैकडानल्ड का मुकाबला कर सकती हैं, यह पुरानी दिल्ली की गलियां। मेरा इन गलियों से पहला परिचय तब हुआ जब मैं १८५७ के महान गदर पर एक डॉक्यूमैंट्री फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में यहां भटकता फिर रहा था। फिर तो दिल्ली के इस हिस्से के साथ कुछ अजीब सा रिश्ता कायम हो गया। सबसे ज्यादा दुख उस समय हुआ जब मैं पहली बार पुस्तके खरीदने दरियागंज के पटरी मार्केट पंहुचा और पता चला कुछ दिन पहले ही दिल्ली पुलिस उस जगह को उजाड़ चुकी है। इस बार भी, आइरिस के सिलसिले में इस जगह के बहुत से चक्कर लग रहे हैं। किसी न किसी चीज की जब तब जरूरत पड़ ही जाती है।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इस ईवेन्ट में हम पूरे दिल्ली भर के उन सभी लोगों की कृतियों को समाहित करने जा रहे हैं, जो फोटोग्राफी को एक कला और संवाद के माध्यम के तौर पर देखते हैं। कोई बहुत ज्यादा बंदिशें भी हमने इसमें नहंी रखी हैं और न ही कोई थीम हम इसमें दे रहे हैं। बस एक ही मकसद लेकर चले हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को हम इस मंच पर एकजुट कर सकें।&amp;#160; अभी तो इसी जुगत में लगे हैं कि&amp;#160; फोटोग्राफी के क्षेत्र की किसी नामी शख्सियत को हम इस ईवेन्ट का मुख्य अतिथि बनने पर राजी कर पाएं। और भी बहुत सी समस्याएं मुंहबाए खड़ी हैं, हमें सही समय पर सब कुछ बना कर तैयार कर देना है, पूरी सजावट कलात्मक हो इसका भी हमें ध्यान रखना है। साथ ही हमें यह भी सुनिश्चित्त करना है कि जिन लोगों को हम साथ लेकर चले हैं, उनके बीच भी समरसता कायम रख पाएं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; बहुत से बुरे अनुभवों से भी हमें इस दौरान दो-चार होना पड़ा। सबसे ज्यादा विरोध हमें उस वर्ग के अपने साथियों की तरफ से झेलना पड़ा जो ईवेंट मैनेजमेंट को एक कॉरपोरेट अफेअर समझते हैं। लेकिन इस दौरान आशुतोष ने बहुत साथ दिया। समस्या यह भी थी कि हम इस सब में सही लोगों को साथ ले पाएं जो इस ईवेंट की कामयाबी सुनिश्चित्त करवा पाएं। पैसे को लेकर भी कुछ समस्या शुरुआत में हमने महसूस की। अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पंहुचा पाना भी एक चुनौतीपूर्ण काम था।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; चलिए चलते-चलते थोड़ा सा विक्षोभ मैट्रो रेल प्रशासन पर भी उतार ही देते हैं। हुआ यूं कि हम एक इंस्टीट्यूट को अपने ईवेंट का आमंत्रण देने द्वारका जा रहे थे। कश्मीरी गेट से हमने द्वारका का टिकट खरीदा था, लेकिन हमे इस बात का इल्म नहीं था कि द्वारका और द्वारका सेक्टर नौ के टिकअ के मूल्य में कुछ अंतर है। सेक्टर नौ पर पंहुच कर हमने खुद को स्टेशन से बाहर निकलने में असमर्थ पाया। टिकट काउंटर पर बैठे सज्जन को बहुत तीव्र इच्छा हो रही थी कि कैसे भी करके वो हमारा ५२ रुपए का चालान काट ही दें। वो हमारी मजबूरी समझने को ही तैयार नहीं थे। हर बार की तरह हमारी जेबें भी तंगहाली का रोना रो रहीं थीें, खैर किसी तरह अपने सहयात्रियों के सहयोग से हम उन सज्जन पुरुष को विश्वास दिलवाने में कामयाब हुए कि हम वाकई ही मजबूरी में हैं। उसी टिकट से रिर्टन जर्नी करके वापस द्वारका लौटे और किसी तरह से इस समस्या से बाहर निकल। मैं आपको रिर्टन जर्नी करने की सलाह नहीं दूंगा क्योंकि पकड़े जाने पर उसका चालान २०० रुपए है। कुछ दिन पहले तक यह बावन रुपए का चालन महज ११ रुपए का होता था, लेकिन मैट्रो प्रशासन भी इसे आमवर्ग की सवारी बने रहना नहीं देना चाहता!&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-2513390970716770473?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/2513390970716770473/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2513390970716770473'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2513390970716770473'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='गलियों में बसी मेरी दिल्ली'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SuMoTPDzOGI/AAAAAAAAAF8/DyuSxeRVdVk/s72-c/purani_dilli_thumb%5B11%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-8916583268797418986</id><published>2009-08-18T22:38:00.001+05:30</published><updated>2009-08-18T22:38:43.105+05:30</updated><title type='text'>हाय रे ऑटो</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SorgD5S-joI/AAAAAAAAAFw/tSUrqgjIFLk/s1600-h/auto%5B7%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="auto" border="0" alt="auto" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SorgGEwx14I/AAAAAAAAAF0/RTVu1BORCi4/auto_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800" width="327" height="233" /&gt;&lt;/a&gt; उम्मीद है कि आज रात ऑटो चालकों की दिल्ली में दो दिनो से जारी हड़ताल भी खत्म हो जाएगी। साथ ही हम यह भी उम्मीद करते हैं कि ट्रैफिक पुलिस के जिस भ्रष्ट रवैये को लेकर यह हड़ताल हुई थी, उस पर भी कुछ नकेल कसी जाएगी। लेकिन इस हड़ताल के और भी कई पहलू ऐसे थे, जिन पर विचार कर लेना जरूरी है।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ट्रैफिक पुलिस का रौब-दाब आपको जबतब दिल्ली की सड़कों पर दिख ही जाएगा। ठीक भी है, बहुत से अनुशासन-हीन चालकों पर लगाम लगनी ही चाहिए। लेकिन परेशानी तब होती है जब ट्रैकिफक पुलिस अपनी वर्दी का नाजायज इस्तेमाल करती है। अपनी पॉकेट गर्म करने के लिए वो बेमतलब चालान काटती है। अब ऐसे में अगर कोई ऑटो वाला इस सब में फंस जाए तो एक बार में ही उसकी पूरे महीने की कमाई चली जाती है। इस सारी भ्रष्ट-तंत्र के खिलाफ ही यह आज की और कल की हड़ताल थी।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वैसे हड़तालों से परेशानी तो होती है, खास तौर से तब ,जब बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने वाले संस्थान मसलन स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन या जल/विद्युत वितरण से संबंधित संस्थाएं जब हड़ताल पर चले जाते हैं। हड़तालें जरूरी भी हैं, जब अत्याचार ही कानून की शक्ल में सामने आए तो संघर्ष करना जरूरी हो जाता है। लेकिन संघर्ष अगर एक अनुशासित और संगठित तरीके से किया जाए तभी उसका कोई सकारात्मक नतीजा निकल कर आता है। इस हड़ताल के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता। पहले तो ज्यादातर ऑटो चालकों को यह तथाकथित ऑटो यूनियनें अपने&amp;#160; साथ नहीं ले पाईं। दूसरे जब ऐसा करने में वो असफल रहीं तो उन्होने कुछ गैंग बनाकर, हड़ताल के बावजूद भी चल रहे ऑटो को तोडऩा फोडऩा शुरु कर दिया। चालकों की पिटाई की गई, यहां तक कि सवारियों को भी नहीं बख्शा गया।&amp;#160; इसका नुकसान यह हुआ कि एक तो पहले से ही ऑटो चालक इस हड़ताल से कट रहे थे, बाद में वे इसके खिलाफ भी हो गए। एक संगठित यूनियन कभी भी ऐसे काम नहीं करती है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मुझे याद आते हैं वो पुराने दिन, जब हड़तालें हुआ करती थीं। मजदूरों, कर्मचारियों, नौजवानो या छात्रों के कतारबद्ध समूहों से सड़कें पट जाती थीं। हवाओं में इंकलाबी नारों का गर्जन रहता था, और तनी हुई मु_ियों का जोश तो देखते ही बनता था। उन हड़तालों का एक संगठित तरीका होता था, क्योंकि उनकी लीडरशिप बहुत ही ज्यादा संघर्षशील लोगों में से आती थी, उन दिनों गुण्डाराज नहीं चला करता था। बाद में भ्रष्ट सरकारों ने अपने निजी फायदों के लिए गुण्डों को प्रोमोशन देना शुरु किया, और संगठित यूनियनों को धीरे-धीरे इन्ही गुण्डों के दम पर कुचला जाने लगा। इसका एक उम्दा उदाहरण बाल ठाकरे है, जिसने उस दौर में गुण्डागर्दी करके अपना बिजनेस चलाया, उसे सरकार का भी पूरा-पूरा संरक्षण प्राप्त हुआ। इसका कारण भी था, ऑर्गनाईज्ड यूनियनस को कुचल कर मालिकान अपने पक्ष को मजबूत करना चाहते थे, और सरकारों ने इसमें उनक भरपूर साथ भी दिया। नतीजा आज हम सब के सामने है, महाराष्ट्र का मजदूर वर्ग सबसे कमजोर स्थिति में है, वो शोषण के पाट तले कराह रहा है। वहीं महाराष्ट्र को द्वेष की एक ऐसी जहरीली भट्टी में ठाकरे ब्रिगेड ने बदल दिया है, जिससे उबर पाना उसके लिए नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर होगा।    &lt;br /&gt;हड़ताल, यूनियन इत्यादी कुछ ऐसी चीजें है जिनको अपनाया ही इसलिए गया था क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में अपनी बात कह पाने का और उसे मनवा पाने का सबसे सकारात्मक तरीका यहीं थीं। इन्हे कितने ही अकाट्य तर्क देकर खत्म करने की कोशिशें बेशक की जाएं, लेकिन इनके प्रभावी होने की बात से हू इंकार नहीं कर सकते हैं। हमें अपनी गलती माननी होगी, कि हमने यूनियनों के स्वरूप को बिगाड़ कर उसकी कमान गुण्डों के हाथ में दे दी। और आज हड़ताल के दौरान जब सड़क पर सरेआम गुण्डे हमें पीटते हैं तभी हमें इसी बात का एहसास होता है।     &lt;br /&gt;अब हमें ही तय करना है कि हमारे लोकतंत्र की दिशा क्या होनी है, क्या इसे कुछ गुण्डों, वाईस चांसलरों, फैक्टरी मालिकों या मैनेजरों की मनमानी का सबब बनना चाहिए, या फिर समूचे जन-जन की व्यापक राय को इसे प्रकट करना है, इसका फैसला हमे ही करना होगा!&amp;#160;&amp;#160; &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-8916583268797418986?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/8916583268797418986/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/8916583268797418986'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/8916583268797418986'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html' title='हाय रे ऑटो'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SorgGEwx14I/AAAAAAAAAF0/RTVu1BORCi4/s72-c/auto_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-5678626018901367899</id><published>2009-08-16T15:21:00.001+05:30</published><updated>2009-08-16T15:21:03.745+05:30</updated><title type='text'>बिटान</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SofWgrejZ2I/AAAAAAAAAFo/FdJJ7T6Pyu4/s1600-h/bitaan%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img title="bitaan" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="238" alt="bitaan" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SofWhR1X-UI/AAAAAAAAAFs/SrBLLcZ6y_Y/bitaan_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800" width="282" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; जनवरी की अलसायी सी सर्द सुबह छोटा पिल्ला बिटान अपने घर में आराम कर रहा था, बगल में उसकी दो नन्ही बहने और एक छोटा भाई भी उससे चिपके पड़े थे। इस तरह चिपके रहने से शायद उन्हे गर्मी मिल रही थी। बिटान की मां जूली भी बाहर फीकी सी धूप में खुद को सेक लगा रही थी।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; बिटान मंदिर के अहाते में दो हफ्ते पहले ही पैदा हुआ था। मंदिर में रोजाना खेलने आने वाले बच्चे उसे देख इतने खुश हुए कि उन्होने घास-फूस और शेड का इंतजाम कर उसके रहने के लिए एक कुत्ताघर ही बना दिया। मंदिर में चढऩे वाले चढ़ावे से उसकी मां के लिए भोजन का इंतजाम हो जाता और बिटान तथा उसके भाई बहनो के लिए भरपेट दूध का भी। फुर्सत के समय मंदिर में आकर बैठने वाली महिलाओं ने कुछ ही दिनो में पुराने स्वेटरों वगैरह का इंतजाम भी नवजात पिल्लों के लिए कर दिया।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इस तरह हमारे नन्हे बिटान के दिन बड़े मजे में कट रहे थे। रात में जब ठंड बढ़ जाती तो सारे पिल्ले उनकी मां के पेट के नीचे दुबक के सो जाते। एक दोपहर&amp;#160; पिछली गली में रहने वाला सोनू मंदिर में आया, उसने कुत्ताघर की रखवाली करने वाले एक लड़के को पहले ही सोडा पिलाने का वादा कर खुद से मिला लिया था। उन्होने ऐसा समय चुना जब जूली बच्चों के पास नहीं होती थी। दोनो ने जल्दी से जाकर बिटान को उठाया और स्वेटर में लपेट कर वहां से ले गए।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; सोनू हमेशा से ही एक पिल्ला पालना चाहता था। नोसोव और बांड को पढ़-पढ़कर यह शौक उसके अंदर पनप गया था। घर में सभी को उसने लड़-झगड़कर एक पिल्ला पालने के लिए मना लिया था। अब समस्या थी कि पिल्ला आखिर मिलेगा कहां से, बिल्ली के बलूमड़ों की तरह वो घरों के भीतर तो मिलने से रहा, और किसी, पैट शॉप, पर हजार-दो हजार खर्चना उसके बस से बाहर है। ऐसे में उसने एक सोडा पिलाने का वादा कर मंदिर में काम करने वाले पीलू को इस काम के लिए पटा लिया था। बिटान को जब वो घर लाया तब बिटान गहरी नींद में सोया हुआ था, जैसे ही वो जागा, सोनू की मां ने उसके लिए दूध कटोरी में डाल दिया। भूखा बिटान सारा दूध पलभर में ही चट कर गया। सोनू ने इसके बाद बिटान को नहला दिया और सुखाने के लिए छत पर धूप में ले गया। पूरा दिन वो बिटान के साथ खेलता रहा।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इसी बीच जब जूली वापस लौट कर आई तो अपने पिल्ले को वहां न पाकर बहुत परेशान हुई। वो सारे में घूमकर देख आई पर बिटान का कहीं कोई पता न चला। मन मसोसकर बेचारी अपने बाकी के बच्चों के पास बैठ गई। उसे अपने बच्चे की बहुत याद आ रही थी, उस दिन उसने खाना भी नहीं खाया। उधर पेड़ों के पीछे धीरे-धीरे सूरज भी डूबने लगा था। सांझ के गहराने के साथ ही ही सोनू भी बिटान को लेकर नीचे आ गया और रजाई में छिपकर बैठ गया। बिटान को भी यहां अच्छा लग रहा था क्योंकि यहां उसे अपने घर से भी ज्यादा गर्मी मिल रही थी। रात को खाने का समय होते ही बिटान को दूध में रोटी चूर कर दे दी गई, बिटान उसे बड़े मजे से खा गया । सोने का समय होते ही बिटान को छोटे से लकड़ी के कुत्ताघर में पहुंचा दिया गया। इस कुत्ताघर को बड़ी मेहनत से सोनू ने ही तैयार किया था। घर में पुराने पड़े प्लाईवुड को काटकर और उसमें फूस बिछाकर, बड़ी ही सुंदर चित्रकारी से उसे सजा दिया गया था। छोटा पिल्ला खा-पीकर मजे से इसमें सो भी गया। सोनू भी अपने घरवालों के साथ अंदर के कमरे में जाकर सो गया।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आधी रात के वक्त पिल्ले के रोने की आवाज से सोनू की आंख खुल गई। जैसे ही वो बाहर पंहुचा तो क्या देखता है कि बिटान बरामदे में खड़ा रो रहा है। जब सोनू ने उसे पुचकारा और उसके सिर पर हाथ फेरा तो वो चुप हो गया और थोड़ी ही देर में सो भी गया। सोनू वापस सोने के लिए चला गया। आधे घंटे बाद बिटान ने दोबारा रोना शुरु कर दिया, फिर तो यह सिलसिला रात भर चलता रहा। उस रात घर में कोई भी ठीक से सो नहीं पाया। सुबह होते-होते सोनू की समझ में आ गया था कि किसी भी बच्चे को उसकी मां से अलग कर देना ठीक नहीं है। वो बिटान को वापस उसकी मां के पास छोड़ आया। बिटान अपनी नन्ही सी दुम हिलाता हुआ अपनी मां के पास पहुंचा और अपनी मां से अपनी थूथन रगडऩे लगा। उसकी मां के चेहरे पर थोड़ी देर पहले तक जो उदासी छायी हुई थी, वो बिटान के लौट आने से गायब हो गई। इस तरह इस कहानी का भी एक सुखद अंत हुआ।     &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ffffff"&gt;-पल्लव&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="wlWriterEditableSmartContent" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:0beb3927-7c81-4bc3-9e20-f1aca02568b0" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; float: none; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px"&gt;Technorati Tags: &lt;a href="http://technorati.com/tags/puppy" rel="tag"&gt;puppy&lt;/a&gt;,&lt;a href="http://technorati.com/tags/bitaan" rel="tag"&gt;bitaan&lt;/a&gt;,&lt;a href="http://technorati.com/tags/pallav" rel="tag"&gt;pallav&lt;/a&gt;,&lt;a href="http://technorati.com/tags/journalist" rel="tag"&gt;journalist&lt;/a&gt;,&lt;a href="http://technorati.com/tags/journalism" rel="tag"&gt;journalism&lt;/a&gt;,&lt;a href="http://technorati.com/tags/vikshobh" rel="tag"&gt;vikshobh&lt;/a&gt;,&lt;a href="http://technorati.com/tags/story" rel="tag"&gt;story&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-5678626018901367899?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/5678626018901367899/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/08/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5678626018901367899'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5678626018901367899'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='बिटान'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SofWhR1X-UI/AAAAAAAAAFs/SrBLLcZ6y_Y/s72-c/bitaan_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-295439492575662074</id><published>2009-07-30T17:46:00.001+05:30</published><updated>2009-07-30T17:55:23.234+05:30</updated><title type='text'>धुंध के साए में बारिश</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SnGPEmzV0DI/AAAAAAAAAFg/nlT6Lg09ZCE/s1600-h/dhundh_baarish_story%20copy%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="dhundh_baarish_story copy" border="0" alt="dhundh_baarish_story copy" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SnGPF70LxqI/AAAAAAAAAFk/B4-P_6HHnK8/dhundh_baarish_story%20copy_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800" width="319" height="195" /&gt;&lt;/a&gt; आसमान में घने बादल छाए हुए थे, रह रहकर बूंदे भी पड़ रहीं थीं, ऐसा लग रहा था कि तेज बारिश होने वाली है। साउथ कैंपस के अहाते में पड़ी बेंचों पर बैठे कुछ दोस्त आपस में बतिया रहे थे। कॉफी के सिपों के बीच बातचीत का दौर चल ही रहा था कि तभी अतुल वहां आ धमका, और उन सब के बीच जा बैठा। अतुल के आते ही सब के चेहरे फक्क पड़ गए। और जैसे कि उम्मीद थी अतुल ने आकर देश-विदेश की राजनीति को मुद्धा बनाकर डिंपल की टांग खींचनी शुरु की। इस सब से उक्ता डिंपल सब से विदा लेकर वहां से चली गई।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अतुल कुछ बरस पहले ही दिल्ली आया था और पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था। इन दिनों सिर्फ एक कोर्स कर के पत्रकार बना जा सकता है, उसके लिए गहन अनुभव होने की जरूरत नहीं है। अतुल के अंदर भी&amp;#160; एक नामी पत्रकार बनने की तीव्र आकांक्षा थी। वो पत्रकारिता के दिग्गजों का अनुसरण करने का प्रयास करता रहता। ऐसे में बहुत सी चीजों को लेकर उसकी एक अजीब सी समझ बन गई थी। खुद ग्रामीण परिवेश से होने के बावजूद इतने बड़े स्तर पर फैली गरीबी उसे विचलित नहीं कर पाती थी। न ही इस बारे में वो बहुत ज्यादा चिंता करता था। उसे बस अपनी कामयाबी की चिंता ही हरदम सताती थी। बीते कुछ महीनो से अतुल अपने कैरियर को लेकर बहुत ही ज्यादा संजीदा हो गया था। बहुत से कंजरवेटिव पत्रकारों की तरह उसे भी गोधरा की हिंसा में फूल खिलते दिखाई देने लगे थे। वहीं डिंपल जनवादी छात्र-राजनीति से जुड़ी हुई थी। उसका अधिकांश वक्त इन्ही कंजरवेटिव हमलों को विफल करने में बीतता था। ऐसे में अतुल के हमलों का सीधा निशाना उसे ही बनना पड़ा। आए दिन अतुल उसकी जनवादी राजनीति को मुद्धा बनाकर उसे कोंचता रहता। वो जाने कहां से ढूंढ-ढूंढ कर मुद्धे लाता और डिंपल को उन सब के बीच घसीटने की कोशिश करता। रोज-रोज की इन बहसों से पत्रकार महोदय अपना सोशल बेस खोने लगे। लोग उसे सुनने के बजाय इगनोर करने लगे।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ डिंपल के जाते ही अतुल जी वहां मौजूद आदित्य और मोहन के साथ ही बहस करने लगे। उसकी बातों से झुंझला कर जब आदित्य ने उसे झिड़क दिया, तो अतुल जरा नरम पड़ गया।&amp;#160;&amp;#160; &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; देखो आदित्य भइया, मैं तो बस इतना ही कह रहा था कि हमारी पढऩे लिखने की उम्र है, उसमेें राजनीति जैसी चीजों में उलझने की क्या जरूरत, इसलिए मैं डिंपल को बस समझाना भर चाह रहा था। अतुल भुरभुराया।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अरे ओ, तू है कौन जो समझाने चला है। और फिर जब अन-बायस्ड या निष्पक्ष होने के नाम पर तू जो अनाप-शनाप लिखकर छपवाता फिरता है उसका क्या। इस बार मोहन ने मोर्चा संभाला।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; देखो मैं तो जो भी लिखता हूं, वो सब खबर होती है, अब उसका विश्लेषण करने में कुछ तो पत्रकार का नजरिया झलकता ही है न। वैसे सबसे ज्यादा हद तो आप साहित्यकारों ने कर रखी है, कहानी के नाम पर मनमानी करते हो, जो जी में आता है विचारों की अभिव्यक्ति के नाम पर लिख डालते हो, तुम लोगों पर तो बैन लगा देना चाहिए। अतुल ने जवाब दिया।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; बस करो अतुल, पैसा कमाने की होड़ में तुम जमीनी हकीकतों से इस तरह से कट जाओगे, इस तरह से तोते की तरह के रटे-रटे रटाए डायलॉग बोलने लगोगे, यह हम कभी भी सोच नहीं सकते थे। अब मोहन भी तैश में आने लगा था।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इसी बीच बारिश भी तेज होने लगी थी, अतुल के खिसकते ही मोहन और आदित्य भी अवसरवादिता पर चिंता जताते हुए अपनी अपनी क्लासों की तरफ बढ़ गए।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-295439492575662074?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/295439492575662074/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/295439492575662074'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/295439492575662074'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html' title='धुंध के साए में बारिश'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SnGPF70LxqI/AAAAAAAAAFk/B4-P_6HHnK8/s72-c/dhundh_baarish_story%20copy_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-5108409078443833300</id><published>2009-07-29T11:57:00.001+05:30</published><updated>2009-07-29T11:58:29.514+05:30</updated><title type='text'>बारिश</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sm_rwr1AGsI/AAAAAAAAAFY/lbrFhigJ5h0/s1600-h/bus-headphone%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="bus-headphone" border="0" alt="bus-headphone" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sm_rx6XxEII/AAAAAAAAAFc/VtGM3RAMXrQ/bus-headphone_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800" width="286" height="220" /&gt;&lt;/a&gt; बारिश के&amp;#160; उस दिन, कीचड़-पानी भरे फ्लाईओवरों के नीचे से निकलते हुए किसी तरह मैं और साथी महावीर बस पकडऩे में कामयाब हो गए। बारिश भरी सड़कों को चीरते हुए बस अपने गंतव्य की ओर सरकती जा रही थी, और मुझे इस बात पर खुशी हो रही थी कि कम से कम मुझे उन पानी भरी सड़कों को पैदल चल कर पार नहीं करना पड़ रहा था। मैं बाहर फैले प्रकृति के असीम नजारों को देखने में व्यस्त था कि तभी महावीर ने मुझे सामने वाली सीट पर जाकर बैठने को कहा, जहां वो लड़की बैठी हुई थी। जैसे ही मैं वहां पंहुचा, वो उठकर मेरी सीट पर आ गई, और मुझे उस सीट पर पहले से ही बैठे महानुभाव के साथ बैठना पड़ गया। बीच-बीच में अपनी उपस्थति दर्ज करवाने के लिए वे व्यर्थ की बकवास करने से भी नहीं चूकते थे। मैं काफी देर तक कंफ्यूसन में पड़ा रहा कि आखिर महावीर नें उस लड़की को मेरी सीट पर क्यों शिफ्ट करवा दिया? और जब बस से उतरते वक्त महावीर ने उस लड़की को समझाया कि, उसे लोगों की बदसलूकी का जवाब देना आना चाहिए, तब जाकर सारी बात समझ में आई।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वाकई ऐसे महानुभावों को देखकर विक्षोभ की अनुभूति होती है, जो भीड़ भरी बसों में महिलाओं के सफर करने को एक मौका मानते हों, और हर दम इस मौके को भुनाने की फिराक में रहते हों। और यह बात सिर्फ उस अधेड़ उम्र के महापुरुष पर ही लागू नहीं होती, बल्कि यह तो हमारे समाज की एक प्रवृत्ति बन चुकी है, और इसे बदले जाने&amp;#160; की जरूरत है। साथी महावीर ने उस वक्त बस में जो हिम्मत दिखाई उसका मैं कायल हो गया, यह सब खुद को हीरो साबित करने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि समाज के प्रति एक गहरी चिंता महावीर के इस कदम के पीछे थी। हमारे पुरुषों को महावीर के जैसी सोच अपनानी होगी, जिससे उस लड़की की तरह बहुतों के चेहरे पर मुस्कान खिल सके।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; बीते कुछ दिनों से अत्याधिक व्यस्तता के चलते मैं अपने ब्लॉग पर कुछ भी नया नहीं लिख पाया हूं। इसके लिए आप सब से माफी चाहता हूं। कोशिश करूंगा कि कुछ महीनो से लिखने में जो निरंतरता आई थी वो आगे भी बनी रहे।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-5108409078443833300?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/5108409078443833300/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5108409078443833300'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5108409078443833300'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html' title='बारिश'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sm_rx6XxEII/AAAAAAAAAFc/VtGM3RAMXrQ/s72-c/bus-headphone_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4344914038939992820</id><published>2009-07-16T00:11:00.001+05:30</published><updated>2009-07-16T00:11:34.643+05:30</updated><title type='text'>आधी आबादी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sl4ivgIANRI/AAAAAAAAAFQ/9ImqOc84SzM/s1600-h/01-India%5B17%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="01-India" border="0" alt="01-India" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sl4iz_NWvZI/AAAAAAAAAFU/YFJjDIHNMIA/01-India_thumb%5B13%5D.jpg?imgmax=800" width="271" height="194" /&gt;&lt;/a&gt; दुनिया की आधी आबादी! क्यों क्या हुआ, पड़ गए न सोच में, जी हां हम मानवजाति के आधे हिस्से यानी कि महिलाओं के बारे में ही बात कर रहे हैं। पार्टियों के दफ्तरों से लेकर संसद की सभाओं तक, मंचों से लेकर अखबारों के कलम-नवीसों तक और अब तो गली के हर नुक्कड़ वाले घर में भी, सिर्फ महिला सशक्तिकरण की ही चर्चाएं हो रहीं हैं। अब ऐसे में मैने भी सोचा चलो हम भी कुछ खामख्याली कर ही लें, शायद कोई भूला-भटका मुसाफिर मेरे लिखे को भी पढ़ ही ले। फिर भई डेमोक्रेसी है, मुझे भी तो बोलने का, अपनी बात सब के आगे कहने का पूरा हक है, तो यह मौका हाथ से जाने क्यों दूं।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आप लोग सोच रहे होंगे कि पिछले कई दिनों से न तो इस मुद्धे पर संसद में बहस हो रही है, न अखबार इस पर कोई बहुत ज्यादा लिख रहे हैं, तो फिर इसे फालतू में अपनी कलम घिसने की क्या पड़ी है। लेकिन आपसे झूठ नहीं बोलूंगा, मैं ऐसा पत्रकार नहीं हूं जो हर वक्त हवा के साथ उडऩे की ही सोचता है, मुझे तो बहाव के विपरीत तैरने में ज्यादा मजा आता है। और यह मुद्धा कुछ ऐसा है जिसने मुझे बीते काफी समय से झकझोर कर रखा हुआ है।&amp;#160; हम महिलाओं को ३३ फीसदी आरक्षण देने की बात करते हैं, यह एक ऐसा सुझाव है जिसको जल्द से जल्द अमल में लाया जाना बेहद जरूरी है। कारण साफ है, अगर हमारे समाज में आप दलितों को बेहद दबा-कुचला मानते हैं, तो उनमें भी दलित महिलाओं की दुर्दशा क्या होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। महिलाएं हमारे समाज की सबसे ज्यादा सताई गयी प्राणी हैं। आज शूद्रों पर बेशक बहुत सी जगह अत्याचार होने बंद हो गए हों, लेकिन उनकी महिलाएं अभी भी रूढिय़ों के बंधन तले कराह रही हैं। और यह हाल सिर्फ गरीबों का नहीं है, बड़े-बड़े घरों में, ऊंचे-ऊंचे दफ्तरों में आज भी महिलाओं को एक तुच्छ बाजारू सामान समझा जाता है। मै जब भी यार-दोस्तों की मंडली में निकलता हूं तो महिलाओं के बारे में उनके बोलवचन सुनकर मुझे अपने मानव होने पर अत्यंत शर्म आती है। क्या इस धरती पर जीवन का सृजन करने वाली स्त्री के ऐहसानों के बदले उसका यही दर्जा हमारे समाज ने रख छोड़ा है। तमाम तरह के अश्लील सामान को आज इस देश में डेमोक्रेसी के नाम पर परोसा जा रहा है, दलीलें दी जा रही हैं कि एडल्ट कंटेंट है, जिसपर रोक लगाने का हक सरकारों को नहीं है। समलैंगिकता को गाली देने वाले तमाम दल और बाबा लोग, इस तरह की चरित्रहीनता पर मुंह तक नहीं खोलते, क्योंकि ओशो जैसे परम-तपस्वी इसी के जैसी चीजें परम-आनंद के रूप में लोगों को परोस रहे हैं। उनके आश्रम रूपी क्लब रोज नए-नए ग्राहकों की भीड़ से भरते जा रहे हैं। इस सब की आलोचना करने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है, और वो यह कि इसमें स्त्री को एक बाजारू सामान की तरह परोसा जा रहा है। सदियों से चाहे वेश्याओं का प्रश्र हो या आज की आधुनिक मल्टीमीडिया सामग्री का हमने महिलाओं को एक ही तरह से देखना चाहा है। हमने कभी भी उसके उस रूप को महसूस करने की कोशिश नहीं की जो निरंतर समाज में अच्छे कामों का सूत्रपात कर रहा है। हमने&amp;#160; घरेलू स्तर पर दिए जा रहे उसके महत्वपूर्ण योगदान को हमेशा नजरअंदाज किया। जिस तरह से हमारा समाज तमाम क्रांतियों और बगावतों को कुचलना जानता है, उसी तरह से घरेलू और सामाजिक स्तर पर किया जा रहा महिलाओं का शोषण उनकी इसी खामोश बगावत को कुचलने का काम करता है। चाहे हिंदू फासीवाद हो या फिर और भी किसी भी तरह का धार्मिक कट्टरवाद, हर मजहब में स्त्री को पढऩे लिखने के अधिकार से वंचित रखा गया। इस्लामिक कठमुल्लों के फतवे तो हम जानते ही हैं, अगर इस देश में भी राममोहन रॉय जैसे सुधारक न हुए होते, तो राष्ट्रवाद और हिंदूवाद का दंभ भरने वाले&amp;#160; दल महिलाओं को हर सूरत में शिक्षा के अधिकार समेत न जाने कितने बुनियादी अधिकारों से वंचित रख देने वाले थे।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; जब दलितों को आरक्षण मिल गया तो उनके नाम पर तमाम सुख-सुविधा में पले बढ़े, नाम-मात्र के दलितों के बच्चे तमाम यूनिवस्र्टियों और नौकरियों में लाभ पाने लगे। जबकि लालटेन की रोशनी में अपना जीवन झोंक रहा देहाती दलित का बच्चा इस काबिल भी नहीं था कि शहर तक जाकर किसी यूनीवस्र्टी में खुद को एनरॉल करवाने का आवेदन भी दे पाए। महिलाओं में भी कई तबके बटे हुए हैं। ऊंचे-ऊंचे ख्वाबों में रहने वाली नवयुवतियां भी हैं, तो इन्द्रा नुई और हिलेरी क्लिंटन जैसी महिलाएं भी, जो अगर चाहें तो फिलिस्तीन, और यूगोस्लाविया जैसे मुल्कों को नेस्तनाबूत करवा दें। वहीं बिलकिस बानो, गुडिय़ा जैसी अनगिनत महिलाएं ऐसी भी हैं, जो आज भी सामाजिक बर्बरता का शिकार बन रहीं हैं। वास्तव में अगर आरक्षण का विधेयक पास कर दिया जाता है, तो कोशिश यह की जानी चाहिए कि&amp;#160; उसका अधिक से अधिक फायदा इन दबी कुचली महिलाओं को मिले।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; हम सामाजिक बदलाव की बात करते हैं, लेकिन समाज तब तक नहीं बदल सकता जब तक उसे बदलने का एक जज़्बा हमारे लोगों के भीतर न हो, नेताओं में जज़्बा होना भी जरूरी है, लेकिन नेता भी लोगों के बीच से आता है, लोगों की सोच बदलेगी तो नेता तो खुद-ब-खुद बदल जाएंगे। और लोगों की सड़ी-गली सोच को बदले बगैर समाज में कोई भी बदलाव रातों-रात ला देना मुमकिन नहीं। असल में हम भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और हर तरह के अन्याय के साथ जीने की आदत पड़ गई है, अब कचरे में जीने में भी हमें आनंद आने लगा है। हम इतने ज्यादा भ्रष्ट हो चुके हैं कि कोई ईमानदार और बदलाव का इच्छुक आदमी भी हमें भ्रष्ट नजर आता है।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इधर खबर मिली है कि जानीमानी महिला अधिकार कार्यकर्ता कालिंदी देशपांडे जी का निधन हो गया है। वे बीते कुछ बरसों से कैंसर से पीडि़त थीं। उनका यूं असमय ही चला जाना इस देश के जनवादी महिला आंदोलन के लिए एक गहरा धक्का है। विक्षोभ बीमारी के दिनों में भी उनके द्वारा अपने कार्य को लेकर दिखाए गए जज्बे को सलाम करता है।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4344914038939992820?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4344914038939992820/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4344914038939992820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4344914038939992820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html' title='आधी आबादी'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sl4iz_NWvZI/AAAAAAAAAFU/YFJjDIHNMIA/s72-c/01-India_thumb%5B13%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-7312011466803528193</id><published>2009-07-02T14:20:00.001+05:30</published><updated>2009-07-02T14:20:54.722+05:30</updated><title type='text'>राजू जोकर</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Skx04E80PMI/AAAAAAAAAFI/8sjW8TQUbbk/s1600-h/joker%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="joker" border="0" alt="joker" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Skx06xMETNI/AAAAAAAAAFM/nQAB0b5eiqw/joker_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="264" height="239" /&gt;&lt;/a&gt; क्या किसी ने सोचा है कि जो जोकर पूरी दुनिया को हंसाता है, उसके खुद के दिल में ही कितना गम भरा पड़ा है, या फिर क्या हमने उस कवि के बारे में सोचा है, जिसकी कविताएं एक नई दुनिया का सपना देखती हैं, उसकी यथार्थ की जिंदगी कैसे रही होगी। नहीं हम ऐसा नहीं सोच सकते क्योंकि हमारी सोच तो बस उसके उसी स्वरूप तक सिमट कर रह जाती है, जैसा वो हमारे सामने नज़र आता है।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; हां-हां आप ठीक समझे, राजकपूर की, मेरा नाम जोकर देख कर ही इस टिप्पणी को लिखने के लिए इंस्पायर हुआ हूं। वाकई क्या बेहतरीन फिल्म थी, राजू जोकर पूरी दुनिया को ताउम्र हंसाता तो रहता है, वहीं उसकी खुद की जिंदगी न जाने कितनी ज्वालाओं में सुलगती रहती है। ऐसा नहीं है कि यह कहानी सिर्फ राजू जोकर की ही हो, हमारे अपने जीवन में भी इस तरह के हजारों राजू मिल जाएंगे। जिनमें से हो सकता है कोई कवि हो, तो कोई थियेटर का कलाकार, कोई रैंप वॉक करने वाली मॉडल, तो कोई ऐसा मामूली सा इंसान जिसका काम इतना साधारण रहा हो कि उसे यहां लिख पाना संभव न हो सके।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अक्सर हम अपनी गफ़्लत में इतने बिज़ी रहते हैं कि हमें फुर्सत ही नहीं होती कि हम दूसरे को समझ पाने की कोशिश भी करें। और तो और जो प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ रोज-रोज जीने मरने की कसमें खाता है, उसे भी खुद कोई दिलचस्पी नहीं होती कि अपनी प्रियतमा को नज़दीक से जाने, उसे समझे। वैसे जानने की कोशिश भी क्यों करे, उसे हर दिन न जाने कितनी प्रियतमाओं से यह बात कहनी होती होगी, और हरेक के बारे में जानने लगा तो फिर चल गया उसका काम। हममें से बहुत से लोग आए दिन विक्रम सेठ, पाउलो कोहेलो या फिर चेतन भगत की रचना को सीने से लगाए घूमते रहते हैं(सच कहूं तो मैने अभी इन बेचारों को पढ़ा भी नहीं है), लेकिन हमें जरा भी परवाह उस लेखक की नहीं होती जो इन्हे लिखता है। बहुत हुआ तो उसके बारे में कोई रोचक तथ्य जान लेते है, मसलन चेतन भगत का आईआईटी से होना। लेकिन हम यह नहीं जानते कि लेखक किन परिस्थितियों में अपना उपन्यास रच रहा है। वैसे आजकल के लेखक इतने ज्यादा काल्पनिक हो गए हैं कि खुद के यथार्थ को ही वे भूल चुके होते हैं।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; बस-बस ज्यादा बोर नहीं करूंगा, खत्म ही कर रहा हूं। अगर हम इतनी सी कोशिश भर करें कि जो कोई भी हमारे संपर्क में आता है, हम कम से कम उसे ठीक से जाननें की एक कोशिश भर करें तो न जाने कितने राजू जोकरों के जीवन में भी रंगो का आगमन हो पाएगा। &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-7312011466803528193?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/7312011466803528193/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7312011466803528193'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7312011466803528193'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='राजू जोकर'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Skx06xMETNI/AAAAAAAAAFM/nQAB0b5eiqw/s72-c/joker_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-8085407110693234670</id><published>2009-06-27T19:47:00.001+05:30</published><updated>2009-06-27T20:33:57.364+05:30</updated><title type='text'>बाजार में स्वागत है</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SkYp7Q1iNZI/AAAAAAAAAFA/s5vP2kRQIYk/s1600-h/baazar%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="baazar" border="0" alt="baazar" align="left" src="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SkYp8enYqOI/AAAAAAAAAFE/P3mVnLEtaho/baazar_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800" width="324" height="189" /&gt;&lt;/a&gt; जी हां, यह बाजार है। एक ऐसा बाजार जहां जेब में अगर पैसा है तो रोटी से लेकर डिग्री तक और मोहब्बत से लेकर नाम, शोहरत और मान-सम्मान तक खरीद लीजिए। अगर पास में पैसा है तो अपने कचरे को भी एडवरटाइज़ कर किसी को भिड़ा दीजिए, जी हां यह बाजार है, और यहां आपका स्वागत है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;वैसे दिनकर ने ठीक ही कहा है, कि पैसे के दम पर तुम बाजार से नाक भी खरीद सकते हो। जी हां, दुकानदार कहते हैं कि वे सामान इसलिए बेच रहे हैं, क्योंकि लोग उसे खरीद रहे हैं। और लोग उसे इसलिए खरीद रहे हैं क्योंकि योग्यता की जगह उनके पास पैसे बरस रहे हैं। आज कोई युवक किसी युवती का प्यार इसलिए खरीद पाता है क्योंकि वो उसे मारूती में घुमा पाने की हैसियत रखता है। बहुत से लायक युवक नौकरी के लिए मारे-मारे फिरते हैं, लेकिन नौकरी उसे ही मिलती है जो इसे खरीद पाता है। अभी सुनने में आ रहा है कि गुलशन कुमार की बेटी तुलसी कुमार अपना नया एल्बम, लव हो जाए, लेकर आ रही हैं। वही प्यार पर लिखे गये घिसेपिटे गाने, लेकिन हम इसे भी खरीदेंगे, और यही बाजार का कमाल है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;यह जो बाजार है न, वो एक ताश के पत्तो की दीवार की तरह है, एक पत्ता गिरा नहीं कि पूरी की पूरी दीवार धाराशाही हो जाती है। लेकिन हर एक पत्ता एक-दूसरे को नैतिक समर्थन देकर अपना दामन बचाने की फिराक में रहता है। इन ताश के इक्कों के पास बहुत बड़ी-बड़ी फौजें हैं, जेलें हैं, कैसीनों और ऐशो-आराम के साधन हैं। दुनिया भर के बाजारों से बटोरा गया सारा पैसा इन्ही ताश के इक्कों के पास है। और उनके बाजारों की रक्षा करती हैं, उनकी फौजें, उनकी पुलिस। जो उनके खिलाफ लिखने वालों की कलमें तोड़ देती हैं, उनके खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेलों में ठूंस देती हैं, सूली पर चढ़ा देती हैं।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;बहुत पहले फैज ने एक नज़्म लिखी थी, आज बाज़ार में...। वाकई यह जमाना एक खुली सोच के सांस लेने के लायक नहीं है। यह नहीं लेने देना चाहता नए विचारों को जन्म, यह नहीं लेने देना चाहता नई उमंगों को उड़ान। यह बस उतार देना चाहता है हर सोच, हर मकसद को बाजार में, यह ढाल देना चाहता है हर सोच को अपने सांचे में।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;नहीं-नहीं, मैं नहीं रहना चाहता इस बाजार में, मैं विद्रोह करना चाहता हूं, मैं लिखते लिखते अपनी कलम घिस देना चाहता हूं, लेकिन क्या मेरी छोटी सी कलम मुकाबला कर पाएगी उनके बड़े-बड़े प्रेसों का, जो हर रोज अपने सामान से भर देते हैं, दुनिया के बाजारों को।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-8085407110693234670?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/8085407110693234670/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_27.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/8085407110693234670'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/8085407110693234670'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_27.html' title='बाजार में स्वागत है'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SkYp8enYqOI/AAAAAAAAAFE/P3mVnLEtaho/s72-c/baazar_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-3674742030295701207</id><published>2009-06-25T23:52:00.001+05:30</published><updated>2009-06-25T23:52:14.738+05:30</updated><title type='text'>हिंदुस्तानी तालिबान</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SkPAUcPGSjI/AAAAAAAAAE4/lb3DGsTcgZQ/s1600-h/delhi_women_bus%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="delhi_women_bus" border="0" alt="delhi_women_bus" align="left" src="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SkPAVb0y1tI/AAAAAAAAAE8/p4Au2Y57E7Q/delhi_women_bus_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800" width="291" height="194" /&gt;&lt;/a&gt; मैं और आनंद जी इन दिनों दफ्तर से जरा झुटपुटा होते ही निकल लेते हैं। क्या करें आनंद जी की शिफ्ट जल्दी ही ओवर हो जाती है, तो मेरे साथ ही निकल चलते हैं। नुक्कड़ के दो-चार रेहड़ी वाले दुकानदारों से उन्होने दोस्ती कर रखी है। &lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;उस दिन भी हम ऐसे ही एक रेहड़ी वाले के पास जाकर खड़े हो गए। बातचीत का सिलसिला चल निकला। बस में चढ़ने का टाइम हो रहा था, तो बातों का रुख भी बसों की ओर ही मुड़ गया। बस के हर पहलू, डीटीसी के डिसइंवेस्टमेंट, भीड-भड़क्का, ब्लूलाइन वालों की दादागिरी, हर पहलू पर बातें हुईं। वैसे रेहड़ी वाले भाईसाहब बहुत ही विद्वान जान पड़ रहे थे। अचानक से उन्होने हम दोनो का ध्यान बसों में महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की ओर खींचने का प्रयत्न करा। मुझे उन प्रोग्रेसिव माईंडेड भाईसाहब की सोहबत में बडे़ हर्ष की अनुभूति हो रही थी। हो भी क्यों न, आखिर महिलाओं के प्रति पुरुषों की ऐसी उजली सोच बहुत कम ही देखने को मिल पाती है। लेकिन न मालूम अचानक से भाईसाहब को क्या हुआ, उन्होने ब्राहमणवाद के परम श्लोकों सा वज्रपात करते हुए कहा कि, महिलाओं के साथ जो कुछ भी होता है उसके लिए वे खुद ही तो जिम्मेदार हैं, किसने कहा है कि नौकरी करो, बसों में, सड़कों पर चलो?&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;मन में और भी सवाल उठ रहे थे, मसलन जॉब को छोड़कर महिलाएं सामाजिक प्रताड़ना से बचने के लिए, क्या कर सकती हैं? भाईसाहब ने बगैर देरी करे, इस पर भी कुछ प्रकाश डाला, ``महिलाओं का कार्य बस घर की चारदीवारी को संभालना भर होना चाहिए!´´ आनंद जी ने भी यह सब सुनकर चुप्पी साध ली, आखिर क्या बोलें बेचारे, ऐसे कलुषित विचारों को सुनकर। वाह रे मेरे हिंदुस्तानी तालिबान, हाय रे तेरे सड़े-गले विचार...&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-3674742030295701207?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/3674742030295701207/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_25.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3674742030295701207'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3674742030295701207'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_25.html' title='हिंदुस्तानी तालिबान'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SkPAVb0y1tI/AAAAAAAAAE8/p4Au2Y57E7Q/s72-c/delhi_women_bus_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4084938324904202475</id><published>2009-06-19T20:56:00.001+05:30</published><updated>2009-06-20T00:15:01.481+05:30</updated><title type='text'>बच्चे बेचारे</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjuuN5G84PI/AAAAAAAAAEw/oB2mlbhaQ3g/s1600-h/poor_children%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img title="poor_children" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="260" alt="poor_children" src="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjuuO_Y0EtI/AAAAAAAAAE0/X4ujiREUjO0/poor_children_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="212" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; बहुत बार ऐसा होता है, कि जब हम बहुत बड़े हो जाते हैं तो बच्चों से हमें चिढ़ होने लगती है। हम बच्चों से इतना चिढऩे लगते हैं कि डांट, फटकार और लताड़ शुरु हो जाती है। लेकिन न जाने क्यों इस सब में हम यह भूल जाते हैं कि किसी न किसी युग के बच्चे हम भी हैं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; हां बच्चे जब चीखते पुकारते हैं तो सबसे ज्यादा चिढ़ मुझे ही होती है, लेकिन सच बताऊं, जब बच्चे दुलार करते हैं न तो, जीवन का सबसे खूबसूरत पल वो लगता है। मासूम सी खिलखिलाहट चेहरे पर लिए , आकर बस आपसे&amp;#160; लिपट जाते हैं, कभी आपकी नाक को रगड़ते हैं, तो कभी बस गले में झूलना चाहते हैं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; जब लिखने बैठा तो सोचा था, कि अपनी बात को लीक से भटकने नहीं दूंगा, लेकिन क्या करूं भई पत्रकार हूं, चारों ओर दिमाग के घोडे दौड़ते रहते हैं। चलिए उन बच्चों का तो ठीक है, जो महलों में पले हैं, उन्हे तो सिर्फ इसलिए डांट पड़ती है कि वे अपने समाज के सलीके सीख लें। लेकिन उन बच्चों का क्या जिन्होने कभी फुटपाथ और झोंपड़े की आगे की दुनिया का सोचा ही नहीं। जिन्होने तो शायद बचपन नामक चीज़ को ठीक से पहचाना ही नहीं होता। बस वे तो सोचने की उम्र तक आते आते, पेट की खातिर बसों, रेलों, फैक्टरियों और सिग्नलों पर धक्के खाते हैं। अब बच्चे हैं तो डांट तो उन्हे भी पड़ेगी न...लेकिन मालूम है क्यों, क्योंकि उन्हे संघर्ष करवाने की आदत डलवाना जरूरी है। उन्हे डांट पड़ती है जिससे वे अधिक से अधिक काम कर पाएं, चाहें बसों में टिकट काटें, या ट्रेफिक सिग्नल पर भीख मांगे। चाहे फैक्टरी में अपना खून जलाएं, या होटल में वेटर बनें, उन्हे डांट पड़ती है, जिससे वे इस लावे सी जिंदगी को जीना सीख जाएं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; हमारी सोसाइटी के कल्चर्ड बच्चे, अगर कभी अन-कल्चर्ड होने की कोशिश करें, तो हमारे लिए शर्म के पात्र बन जाते हैं। कोई मिसेज शर्मा किसी मिसेज वर्मा से अपने सोनू की तारीफ के जब पुल बांधती हैं, तो बस मिसेज वर्मा के बच्चों की तो आफत ही आ जाती है। वर्मा मैडम उन्हे हर बात के लिए दूसरे के बच्चों जैसा बनने को जो कहती हैं। लेकिन इस कल्चर-सेंस सिखाने के चक्कर में हम अक्सर बच्चे के स्वाभाविक गुणों को मार देते हैं। हम उसे वैसा बनाना चाहते हैं, जैसे हम खुद हैं, या जैसा हमारे मां-बाप ने हमे बनाया है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; दो समाजों के दो बच्चे, दोनो की तकलीफों में यूं तो ज़मीन आसमान का अंतर है, लेकिन बहुत हद तक दोनो काम एक सा ही करती हैं, बच्चे के बचपन और उसके गुणों को कुचलने का।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4084938324904202475?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4084938324904202475/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_19.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4084938324904202475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4084938324904202475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_19.html' title='बच्चे बेचारे'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjuuO_Y0EtI/AAAAAAAAAE0/X4ujiREUjO0/s72-c/poor_children_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-7228806401236023350</id><published>2009-06-17T23:33:00.001+05:30</published><updated>2009-06-17T23:42:07.369+05:30</updated><title type='text'>उजली सुबह के नाम पर मिले धोखे</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sjkv2K0fXLI/AAAAAAAAAEo/LGDy4raMErM/s1600-h/27032009323%20copy%5B7%5D.jpg"&gt;&lt;img title="27032009323 copy" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="258" alt="27032009323 copy" src="http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sjkv23LJ_0I/AAAAAAAAAEs/x8KuGz2hISo/27032009323%20copy_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800" width="185" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आज सुबह के अमर उजाला में ही वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर जी का यह लेख छपा था जिसमें उन्होने रूस में स्टालिन के दौर के कुछ काले पन्नो पर प्रकाश डाला है। अपने देश में भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वैसे यह टिप्पणी लिखने का ख्याल तब आया जब पश्चिम बंगाल के लालगढ़ पर माओवादी कब्ज़े की खबर टीवी पर चल रही थी। नक्सलवाद का उदय एक उज्जवल भविष्य के सपने के साथ हुआ था, एक ऐसा भविष्य जहां कोई दुख, कोई हिंसा न होगी। बल्कि वहां तो बस फूलों की सुगंध से आबोहवा महकती होगी। धीरे-धीरे तमाम दबे कुचले मज़लूम लोग, आदिवासी नक्सलवाद के प्रभाव में आये और इसके साथ जुड़ते चले गए। आलम यह है कि आज देश के १५ प्रान्त इसके प्रभाव में हैं। लेकिन बड़े दुख के साथ लिखना पड़ रहा है, कि जो मूवमेंट इतने उज्जवल विचार के साथ जन्मा था, वो आज उसी आशंका को चरिथार्थ कर रहा है जो उसके जन्म के वक्त जताई गयी थी, नक्सलवाद पथ से भटक चुका है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; चलिए मान सकते हैं, कि नक्सलवादियों की भी अपनी जरूरतें हैं हथियार हासिल करने के लिए, उन्हे पैसों की जरूरत होती है। लेकिन पैसे के लिए अपनी विचारधारा को गिरवी रख तृणमूल जैसे दलों के साथ संलिप्त हो जाना उन्हे कहां तक शोभा देता है।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; विक्षोभ लालगढ़ में तीन मार्क्सवादी कार्यकर्ताओं की शहादत पर शोक व्यक्त करता हैं, और उम्मीद करता है कि जल्द ही देश उन समस्याओं को जड़ से मिटाने पर विचार करेगा जिनसे नक्सलवाद का उदय होता है, ताकि जल्द से जल्द एक उजली सुबह का यथार्थ में आगाज़ हो सके।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-7228806401236023350?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/7228806401236023350/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_17.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7228806401236023350'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/7228806401236023350'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_17.html' title='उजली सुबह के नाम पर मिले धोखे'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh6.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/Sjkv23LJ_0I/AAAAAAAAAEs/x8KuGz2hISo/s72-c/27032009323%20copy_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4476097775497475607</id><published>2009-06-16T13:50:00.001+05:30</published><updated>2009-06-16T13:58:42.659+05:30</updated><title type='text'>ओढ़ें कि बिछाएं</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjdVr4OdbiI/AAAAAAAAAEg/C6xo_vx3apQ/s1600-h/ambani_paisa%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img title="ambani_paisa" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="171" alt="ambani_paisa" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjdVtQBwadI/AAAAAAAAAEk/8teXBAIMc4k/ambani_paisa_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800" width="240" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; मुकेश अंबानी के इन दिनो बड़े चर्चे सुनने को मिल रहे हैं। अरे आपको नहीं पता? मुकेश नया घर खरीद रहे हैं... और घर भी कोई ऐसा वैसा नहीं है, पूरे ४००० करोड़ रुपए की ६० मंजिला बिल्डिंग हैं।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मुंबई की आल्टामाउण्ट रोड पर ४,५३२ वर्ग मीटर में फैले मुकेश के प्लॉट पर अंटालिया नाम की इस ६० मंजिला इमारत का निर्माण होगा। वैसे इमारत की हर मंजिल सामान्य के मुकाबले दोगुनी होगी जिससे इसमे कुल २७ मंजिलें ही बन पाएंगी। इमारत की छत पर होंगे तीन हैलीपैड, जहां से मुकेश जब जी चाहे दुनिया के किसी भी कोने में जा सकेंगे। इसके अलावा इसमें छह मंजिली पार्किंग की सुविधा भी होगी, जिसमें १६८ कारें पार्क की जा सकेंगी। यह सारी की सारी इंपोर्टेड कारें भी उनकी ही हैं। इस घर की चार मंजिलों पर सिर्फ बाग बगीचे ही देखने को मिलेंगे। ऐसा भी हो सकता है कि उनके घर में से कोई कभी भी बीमार पड़ जाए, इसलिए उनके घर में एक दो मंजिला अस्पताल भी होगा। अब घर बना रहे हैं, तो उसमें मनोरंजन का इंतज़ाम भी तो होना ही चाहिए न, मुकेश के घर में एक ५० दर्शकों की कैपेसिटी वाला सिनेमाघर भी होगा। इसके अलावा इस बहुमंजिला इमारत में एक गैराज, गेस्टहाउस, और एयरकंट्रोल विंग भी होगा, जहां से हैलीकॉप्टरों को उड़ान के निर्देश मिलेंगे। इस घर में अंबानी को मिलाकर कुल छह लोग रहेंगे, जिसमें उनकी मां कोकिलाबेन, उनकी पत्नी और तीन बच्चे शामिल हैं। इन छह लोगों की खातिरदारी करेंगे ६०० नौकर-चाकर, यानी कि हरेक के हिस्से १०० नौकर।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; कल की ही बात है, मुझसे कोई पूछ रहा था कि अंबानी के पास इतना पैसा आता कहां से है, सीधा सा जवाब है, देश का सारा पैसा इकट्ठा कर एक आदमी को दे दो, वो अमीर तो हो ही जाएगा। मुकेश की कंपनी रिलायंस ने भारत सरकार से कांट्रेक्ट कर आंध्र प्रदेश के गंगा गोदावरी बेसिन से नैचुरल गैस निकालकर विदेशों में ऊंची कीमत पर बेचना शुरू किया। तो पैसा तो आयेगा ही न पास में। जनता का माल, अंबानी का फायदा। अब पैसा है पास में, उसे चाहे ओढ़ लो चाहे बिछा लो, कभी ऐसा भी हो सकता है कि मन में दया भाव उमड़ आये, तो दो चार टुक्कड़ लोगों को डाल कर नाम भी कमा लो।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4476097775497475607?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4476097775497475607/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4476097775497475607'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4476097775497475607'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html' title='ओढ़ें कि बिछाएं'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjdVtQBwadI/AAAAAAAAAEk/8teXBAIMc4k/s72-c/ambani_paisa_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4542608048714208890</id><published>2009-06-15T22:08:00.001+05:30</published><updated>2009-06-15T22:08:10.430+05:30</updated><title type='text'>उफ यह बस का सफर</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjZ467HLNOI/AAAAAAAAAEY/2DNnD6bHRWU/s1600-h/blueline_vikram_nandwani%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img title="blueline_vikram_nandwani" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 10px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="186" alt="blueline_vikram_nandwani" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjZ4750P7-I/AAAAAAAAAEc/n27zwI5huyY/blueline_vikram_nandwani_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800" width="259" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; वैसे कुछ ऐसी ही कहानी मुंबई वाले अपनी लोकल ट्रेनो के बारे में भी कहते होंगे। दिल्ली में बस का सफर करना एक दिलेरी का काम है। अब तो बीमा कंपनियां भी दिल्ली की बसों में सफर करने वालों का बीमा बंद करने का मन बना रही हैं।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;अगर आप फिर भी बस में सफर करने के लिए ललचा रहे हैं, तो करिए भई किसने रोका है, लेकिन अपने रिस्क पर। बस में सफर करने पर क्या मालूम चोर इस टैक्नीक से चोरी करें कि मोबाइल वगैरह तो छोटी चीज़, आपके बदन से कपड़े तक उतार लिए जाएं और आपको पता न लगे। हो सकता है ड्राइवर, अब स्टॉप आने पर बस ही न रोकें, और आप बस में सफर के साथ-साथ लॉग जम्प के भी चैंपियन हो जाएं। या ऐसा भी संभव है कि बस के दरवाजों पर लटक कर चढऩे वाली भीड़ जगह न मिलने पर अब बस की छत पर ही सफर करना शुरु कर दे। हो सकता है कि किलर-लाईन सवारी भरने की होड़ में कुछ एक आध दर्जन लोगों को और कुचल दे।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;पुलिस वाले इन दिनों पूरी मुस्तैदी से बस वालों का हुकुम बजा रहें हैं। बस वाले चाहे बस को कितना ही भर लें, उनका कोई चालान नहीं कट सकता, लेकिन भूल से भी कोई टैक्सी वाला, सवारी को अदब के साथ सीट पर बैठा कर ले गया, वो सलाखों के अंदर पहुंचा दिया जाता है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;यह कोई नितांत कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि यह तो दूरदर्शिता है। जिस रफ्तार से डीटीसी का विनिवेश कर, ब्लूलाईन के लिए सारे द्वार खोल दिए गए, अब उससे और न जाने कितने समय तक हमे जूझना पड़े यह तो बस नेता ही बेहतर जानें। बसों में सफर करना एक जरूरत कम मजबूरी ज्यादा बन चुकी है, तब तक तो, जब तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का कोई और बेहतर विकल्प मौजूद नहीं होता।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4542608048714208890?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4542608048714208890/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4542608048714208890'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4542608048714208890'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html' title='उफ यह बस का सफर'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjZ4750P7-I/AAAAAAAAAEc/n27zwI5huyY/s72-c/blueline_vikram_nandwani_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-246292410473163834</id><published>2009-06-11T00:42:00.001+05:30</published><updated>2009-06-11T00:42:57.890+05:30</updated><title type='text'>यह जनता का माध्यम है</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjAFs86R5TI/AAAAAAAAAEQ/bMZaJKq9H9o/s1600-h/prof_om_guptaji%5B7%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 10px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="prof_om_guptaji" border="0" alt="prof_om_guptaji" align="left" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjAFuDPEqFI/AAAAAAAAAEU/yFiI80-FEms/prof_om_guptaji_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800" width="262" height="185" /&gt;&lt;/a&gt; पिछले दिनो वरिष्ठ पत्रकार ओम गुप्ता जी का एक लेख पढ़ने का मौका मिला। लेख हबीब तनवीर और तीजनबाई जैसे लोककलाकारों के इर्दगिर्द घूमता था। आप सोच रहे होंगे कि फिर से रिव्यू लिखने बैठ गया। जी हां रिव्यू तो है यह, पर रिव्यू से ज्यादा विक्षोभ आपको इस जगह पढ़ने को मिलेगा।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;गुप्ता जी ने इस लेख में तनवीर और तीजनबाई को लोककलाकार न मानते हुए, विदेशों में जाकर प्रदर्शन करने वाला गवैया-नौटंकी वाला ज्यादा माना है। गुप्ता जी आगे बयान करते हैं ``तनवीर जैसे लोगों ने देश की कला का बाजार विदेशों में जाकर जमाया है´´(बहुत मुमकिन है कि यह शब्दश न रहा हो पर इसका सार यही निकलता है, गुप्ता जी का वह लेख इस समय पास में न होने के कारण उन्हे क्वोट नहीं कर पा रहा हूं)। कुल मिलाकर इस लेख में हबीब साहब के इस देश की कला को दिये गये योगदान को सिरे से नकारा गया है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;जहां तक सवाल है विदेशों में जाकर प्रदर्शन करने का तो जहां तक मेरी जानकारी साथ देती है, हबीब साहब ने कभी भी कला को पूंजीवाद का पक्षधर नहीं बनने दिया, नया थियेटर भी छत्तीसगढ़ की लोककला को उभारने का ही कार्य करता था, वो नया थियेटर किसी पत्रकार की तरह अपनी कलम को पूंजी का गुलाम नहीं बना आया था। नये थियेटर के पात्र, पैसा देकर शहर से बुलवाये गये चॉकलेटी लड़के-लड़कियां नहीं थे, बल्कि वे तो आम जीवन से उठाये गये गरीब मेहनतकश और आदिवासी थे। जिन देशों में हबीब साहब ने अपनी कला का प्रदर्शन किया, उन देशों की जडे़ं कभी न कभी समाजवाद से जुड़ी रहीं हैं। समाजवाद में थियेटर को जनता का माध्यम माना गया है, एक ऐसा माध्यम जहां दैनदिन के संघर्षों की कहानी को यह बयान करता हो।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;हबीब साहब के नाटकों को बर्बाद करने में गुंडों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी, और अगर आज जब देश के पत्रकार ही अपनी आंखो पर पर्दा डालकर बैठ रहे हैं, तो एक विक्षोभ, एक घृणा मेरे दिल में फिर से सैलाब बनकर उबल पड़ती है, और मुझे कलम उठाने पर मजबूर कर देती है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;.....................................................................................&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;em&gt;मैने पत्रकारिता की शुरुआत ओम गुप्ता जी के स्नेहशील मार्गदर्शन में करी है, लेकिन उनके उस लेख को पढ़कर मुझे ऐसी अनुभूती हुई जिसे यकीनन सुखकर तो नहीं कहा जा सकता। ऐसे में मैने अपने विचारों को या विक्षोभ को प्रकट कर देना उचित समझा।&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-246292410473163834?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/246292410473163834/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_11.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/246292410473163834'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/246292410473163834'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post_11.html' title='यह जनता का माध्यम है'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SjAFuDPEqFI/AAAAAAAAAEU/yFiI80-FEms/s72-c/prof_om_guptaji_thumb%5B5%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4711190928778678934</id><published>2009-06-01T08:35:00.002+05:30</published><updated>2009-06-01T09:39:23.264+05:30</updated><title type='text'>हमें नहीं चाहिये यह आंधी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SiNFaBbYxrI/AAAAAAAAADw/0pDThq2UYCg/s1600-h/husain_left%20copy%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img style="BORDER-BOTTOM: 0px; BORDER-LEFT: 0px; MARGIN: 0px 10px 0px 0px; DISPLAY: inline; BORDER-TOP: 0px; BORDER-RIGHT: 0px" title="husain_left copy" border="0" alt="husain_left copy" align="left" src="http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SiNFb7GELaI/AAAAAAAAAD4/z_zFVtZ3GOo/husain_left%20copy_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800" width="210" height="274" /&gt;&lt;/a&gt; आज कनॉट प्लेस में घूमते हुये, दीवार की टाईल्स पर कुछ कलाकृतियां बनी हुयी दिख गयीं, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सरकारी विकास की तेज आंधी के थपेड़े झेल रहीं यह कलाकृतियां हिंदुस्तान के प्रसिद्ध कलाकार ``मकबूल फिदा हुसैन´´ के द्वारा बनाई गयी हैं। पचास के दशक के उत्तरार्द्ध में इनका निर्माण हुआ था।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;और लोगों की तरह शायद मैं भी कलाकृतियों और हुसैन के रिश्ते वाले तथ्य से अनभिज्ञ रह जाता, लेकिन कल शाम ही मशहूर फोटोग्राफर `राम रहमान´, हुसैन की कला के ऊपर एक व्याख्यान दे रहे थे, जिसमे उन्होने दिल्ली समेत हिंदुस्तान के तमाम नगरों, अहमदाबाद, बैंगलोर इत्यादि में समायी हुसैन की कला की विशाल विरासत का जिक्र किया था। उसी व्याख्यान के एक हिस्से में कनॉट प्लेस के ``ए ब्लॉक´´ में स्थित ``धूमीमल आर्ट गैलरी´´ के बगल में मौजूद इन कलाकृतियों, की तस्वीर का दिखाया जाना भी शामिल था। वैसे इसके अलावा ``रफी मार्ग पर स्थित ``अनुसंधान भवन´´ पर बनी कलाकृति को भी हुसैन ने ही बनाया है।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;आज दिल बहुत दुखी होता है, जब हम देखते हैं, कि धर्म के नाम की राजनीति करने वालों की  सेनाएं, हुसैन को इस देश से भगा देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती हैं। राजनीति और धर्म का &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SiNFdcdMxzI/AAAAAAAAAEA/qGUBh7NoGWg/s1600-h/husain_right_portrait%5B9%5D.jpg"&gt;&lt;img style="BORDER-BOTTOM: 0px; BORDER-LEFT: 0px; MARGIN: 5px 5px 0px; DISPLAY: inline; BORDER-TOP: 0px; BORDER-RIGHT: 0px" title="husain_right_portrait" border="0" alt="husain_right_portrait" align="right" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SiNFfZGI0GI/AAAAAAAAAEI/aZX0Z0tX_4g/husain_right_portrait_thumb%5B7%5D.jpg?imgmax=800" width="97" height="494" /&gt;&lt;/a&gt;गंदा खेल खेलने वाले यह कुछ तानाशाह, हिंदुस्तानी लोगों की आस्था के प्रतीक राम के नाम को भी खुद के साथ जोड़ने से &lt;span&gt;परहेज नहीं&lt;/span&gt; करते, क्योंकि उनका असल मकसद तो धर्म के आधार पर लोगों का ध्रुवीकरण करके, अपना राजनैतिक प्रोफाइल चमकाना भर होता है। दिल्ली ही क्या जहां कहीं भी हुसैन की कोई प्रदर्शनी चल रही होती है, तो इसे नेस्तनाबूत करने के लिये यह भारत मां के कपूत पंहुच जाते हैं। कोई साल भर पहले भी जब `सहमत´ वीपी हाऊस के लॉन में हुसैन की एक प्रदर्शनी का आयोजन कर रहा था, तब भी इन हिटलर की औलादों ने उसे तबाह कर दिया, और हमें खुद को पत्रकार कहते हुये शर्म आती है कि मीडिया का लाव-लश्कर भी इन्हे कवर करता हुआ, इनका प्रचार करते हुये साथ चल रहा था। इन लोगों ने बेशक उस प्रदर्शनी को तबाह कर दिया हो, लेकिन उसके सामने ही अनुसंधान भवन पर बनी हुयी विशाल कलाकृति इन्हे मुंह चिढ़ाती हुयी नज़र आ रही थी।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;एक तरफ जहां जनता इस पीत आंधी के थपेड़े झेल रही है, इसे धीरे-धीरे ही सही लेकिन समझ तो रही ही है, वहीं दूसरी तरफ एक और आंधी को यह देश झेल रहा है, और वो है ``नव उदारवादी´´ बाजार की आंधी। कनॉट प्लेस में एक दीवार पर बनी हुयी हुसैन की यह कलाकृति, जिसने भारत की आजादी के साठ सालों को देखा है, उन पुराने दिनो से एक रिश्ता जोड़ने वाली यह राश्ट्रीय धरोहर अब बस हफ्ते-दो-हफ्ते की ही मेहमान है क्योंकि उदारवादी आंधी अब इसे इतिहास की गुमनामियों में पंहुचा कर ही दम लेगी। इस उदारवाद को विकास और कॉमनवेल्थ के नाम से जोड़ दिया जाता है, लेकिन जनता में बढ़ रही गैरबराबरी और असंतोष को यह विकास का ढिंढोरा किसी भी हालत में कम नहीं कर पाता है, लेकिन हुसैन जैसे चित्रकारों की कला और चित्र इस असंतोष को कहीं न कहीं जरूर व्यकत कर देते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हुसैन एक माहिर कलाकार ही नहीं हैं, बल्कि यह वयोवृद्ध चित्रकार तो इस देश की एक जीती जागती धरोहर है, और उस पर हो रहे किसी भी तरह के हमलों को इस देश की संस्कृति पर हमला माना जाना चाहिये, हमें एकजुट होकर इस तरह कीं आंधियों के थपेड़ों को विफल करना ही होगा, इससे पहले कि यह एक चक्रवात बन इस देश को अपने आगोश में समा ले।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4711190928778678934?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4711190928778678934/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4711190928778678934'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4711190928778678934'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='हमें नहीं चाहिये यह आंधी'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh3.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/SiNFb7GELaI/AAAAAAAAAD4/z_zFVtZ3GOo/s72-c/husain_left%20copy_thumb%5B4%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-3896133168161145356</id><published>2009-05-24T09:32:00.001+05:30</published><updated>2009-05-24T09:32:37.857+05:30</updated><title type='text'>कहानियों का गड़बड़-झाला</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/ShjG1vElznI/AAAAAAAAADY/ro7ueei2jvo/s1600-h/lovers_vikshobh_kahaniyan%20copy%5B12%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 10px 5px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="lovers_vikshobh_kahaniyan copy" border="0" alt="lovers_vikshobh_kahaniyan copy" align="left" src="http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/ShjG3M_cypI/AAAAAAAAADc/Bs2JyBQFKck/lovers_vikshobh_kahaniyan%20copy_thumb%5B10%5D.jpg?imgmax=800" width="319" height="229" /&gt;&lt;/a&gt; मेरे साथ तो अक्सर ऐसा होता है, आपका पता नहीं। जब भी लेख से अलग हट कोई कहानी वगैरह लिखने बैठता हूं, तो कुछ पंक्तियां लिखने के बाद ही बोरियत सी महसूस होने लगती है, नतीजा कहानी भी बोर हो जाती है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;मैं ऐसी कहानियों में विश्वास रखता हूं, जो कल्पना के संसार मे न रची जाती हों, बल्कि उनका सृजन तो आम जीवन के बीच में होता हो। मतलब कहानियां यथार्थ से जुड़ी हुयी हों। जैसे गोर्की, प्रेमचंद, और अभय मौर्य की परंपरा रही है। लेकिन ऐसी कहानियां लिखने के लिये तो आपको यथार्थ को समझना पड़ता है, उसमें सिर्फ जीना ही नहीं होता, बल्कि उसका पूरी गहनता से अवलोकन करना होता है। तब कहीं जाकर आप अपनी कहानी के लायक कुछ सामग्री निकाल पाते हैं। यथार्थ को लिखने के लिये यथार्थ से घबराना नहीं होता बल्कि उसके सच को कलमब़द्ध करना होता है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;गोर्की ने `मेरा बचपन´, `मेरे विश्वविद्यालय´, और `जीवन की राहों पर´, नाम से एक आत्मकथात्मक त्रयी लिखी है, जिसमें `अल्यूशा´ नाम के नन्हे से बालक के गोर्की बनने के बीच के संघर्षों की दास्तां है। दूसरी ओर मौर्य का जो उपन्यास मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया, वो था ``मुक्तिपथ´´, हालांकि यह आत्मकथात्मक तो नहीं है, लेकिन इसे पढ़ते हुये कोई भी बता सकता है, कि यह यथार्थ से, बहुत हद तक प्रेरित है। उपन्यास में विजय नाम का&amp;#160; एक देहाती युवक उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये दिल्ली आता है, और उच्च मध्यमवर्ग के हाथों सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होता है। वो महसूस करता है, कि गांव में यही सब तो उच्च जातियों के सामंत अब तक निम्न जातियों के लोगों पर करते आये है। उपन्यास दो भारतों का भी चित्रण करता है, एक भारत वो है, जिसकी सभ्यता, संस्कृति और विकास के ढोल विदेशों में पीटे जा रहे हैं, दूसरा भारत वो है, जो भूख, बेरोजगारी और सामाजिक अन्याय के कारण बिलख रहा है। उपन्यास निश्चल प्रेम को भी दिखाता है, साथ ही यह भी कि इस तरह का माहौल विजय को विचलित नहीं करता, बल्कि इस सब को बदलने के लिये वो वामपंथी छात्र राजनीति से जुड़ जाता है। यूं तो उपन्यास 70-80 के दशक के दिल्ली की कहानी कहता है, लेकिन फिर भी यथार्थ से जुड़ा हुआ महसूस होता है, क्योंकि उपन्यास में जिन समस्याओं का जिक्र किया गया है, वो अब भी ज्यों की त्यों कायम हैं, बल्कि अब तो उन्हाने और भी ज्यादा विकराल रूप धारण कर लिया है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;एक अच्छी कहानी लिखने के लिये कल्पना का साथ होना भी बहुत जरूरी है, कोरी कल्पना नहीं, बल्कि यथार्थवादी कल्पना। अब आप सोच रहे होंगे कि कल्पना में भी यथार्थ, जी हां, क्योंकि अगर कल्पना में यथार्थ का चिंतन नहीं होगा तो, आपकी कहानी लीक से भटक भी सकती है। जब तक आम जीवन से जुड़ी रही तब तक तो सब ठीक, ज्यों ही वो आपकी कल्पना के संसार में पहुंची, तो जमीन पर दौड़ रहे इंसान के आपने पंख निकाल दिये उसको अलौकिक दिव्य शक्तियों से आपने लैस कर दिया!!! इसलिये यथार्थवादी चिंतन की आवश्यकता है।&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;बकबक बहुत हो गयी, अच्छी कहानियों में बकबक नहीं होती, एक गहरी समझ होती है, और कहानीकार तो उस किस्सागो की तरह होता है, जिसका काम सिर्फ, किस्से को अपने श्रोता को, हमारे केस में पाठक को सुनाना भर होता है। कहानियां तो जीवन रचता है, हमारा काम तो बस उन्हे शब्दों का सुंदर सा जामा उढ़ाकर पाठक तक पहुंचाना भर होता है।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-3896133168161145356?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/3896133168161145356/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_24.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3896133168161145356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3896133168161145356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_24.html' title='कहानियों का गड़बड़-झाला'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_fwAHj2qiddo/ShjG3M_cypI/AAAAAAAAADc/Bs2JyBQFKck/s72-c/lovers_vikshobh_kahaniyan%20copy_thumb%5B10%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-3278944943015671236</id><published>2009-05-17T12:13:00.010+05:30</published><updated>2009-05-17T14:54:05.847+05:30</updated><title type='text'>बचपन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sg-zh7gt33I/AAAAAAAAACo/3SHQRf3fN_k/s1600-h/bachpan.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 333px; FLOAT: left; HEIGHT: 249px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5336681478949298034" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sg-zh7gt33I/AAAAAAAAACo/3SHQRf3fN_k/s320/bachpan.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;कितना मधुर समय होता है यह, हालांकि जब हम बच्चे होते हैं, तो लगता है कि बस कैसे करके बड़े हो जायें तो न जाने कौन सा किला हम जीत जायेंगे। लेकिन जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं, तो जीवन के यथार्थ सामने आने लग जाते हैं, और हर दिन जारी जीवन संघर्ष लू भरी आंधियों के समान लगता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जब मैं छोटा था, तो बहुत सा समय चित्रकारी, कहानियां पढ़ने और बागबगीचे में अक्सर पौधे लगाते हुये बीतता। पौधों के गमलों के लिये मिट्टी खोद कर लाना, और किस्म किस्म के पौधों को गमलों मे सजाना, मुझे बहुत भाता था। घर की लाईब्रेरी से चेखव, गोर्की या लु-शुन को पढ़ते हुए उपन्यासों के यथार्थ में डूब जाना, या अक्सर किसी चाचा चौधरी या साबू के किस्से को पढ़ते हुये, उसे रेखाचित्रों के माघ्यम से उकेरने का अनगढ़ प्रयास, इस सारे उल्लास से सराबोर था मेरा बचपन। जहां भी जाता कैमरा सदा एक आंख पर चिपका रहता, शायद बचपन में मेरे आसपास की हर सुनहरी याद को हमेशा के लिये खुद में कैद कर लेना चाहता हो। लेखन का जो मामूली प्रयास आप इस ब्लॉग पर देख रहे हैं, उसमे भी मेरे बचपन और आसपास के परिवेश का बहुत बड़ा योगदान है। हां पर मैथ की हर परीक्षा से पार पाना हिमालय पर्वत की चोटियां चढने के समान लगता, न जाने क्यों हमारा शिक्षा तंत्र बच्चे के गुणों को उभारने का काम न करके, उसे आदेशों की पूर्ति करने वाला रंगरूट ज्यादा बनाना चाहता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वैसे बड़े होने के अपने कई फायदे हैं, आपका ज्ञान बढ़ता है, लोग आपकी बात को ज्यादा घ्यान के साथ सुनते हैं, लेकिन कई मूलभूत नुकसान यह हैं कि आपका चैन गायब हो जाता है, और ``काम्पिटेटिव´´ बने रहने के लिये आप गजब की दौड़भाग करते हो। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आज जब अपने चारों ओर के माहौल में इतनी घुटन, इतनी रफ्तार पाता हूं, तो उसी बचपन में लौटने को दिल करता है, जहां ऊंचे ऊंचे पौपुलरों के साये में भविष्य के कवि का विकास हो रहा होता है, लेकिन बहुत चाहते हुये भी जब ऐसा करने में असमर्थ होता हूं, तो भविष्य में ``वसीली सुखोमिलिंस्की´´ की तरह खुशियों का स्कूल खोलने का सपना, मन में बसा लेता हूं, एक ऐसा वातावरण जहां भविष्य के निर्माताओं का निर्माण एक तनावरहित और खुशनुमा माहौल में होता हो।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-3278944943015671236?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/3278944943015671236/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_17.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3278944943015671236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3278944943015671236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_17.html' title='बचपन'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sg-zh7gt33I/AAAAAAAAACo/3SHQRf3fN_k/s72-c/bachpan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-5071344732289475736</id><published>2009-05-13T11:22:00.002+05:30</published><updated>2009-05-13T11:38:56.886+05:30</updated><title type='text'>रंगमंच की चेतना: हबीब तनवीर</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sgpg-qZFBfI/AAAAAAAAACg/aIu1nTFLnpo/s1600-h/habib_tanveer.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 245px; height: 334px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sgpg-qZFBfI/AAAAAAAAACg/aIu1nTFLnpo/s320/habib_tanveer.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5335183338221405682" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;प्रख्यात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रंगकर्मी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तनवीर&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;इन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गंभीर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीमार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भोपाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अस्पताल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर्ती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गौरतलब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; 10 &lt;span&gt;मई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीव्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अस्थमा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अटैक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अस्पताल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भरती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करवाया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हालांकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सेहत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मामूली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुधार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हालत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गंभीर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;  हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तनवीर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शख्सियत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जिन्होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रंगमंच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;इसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वतर्मान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वरूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विकसित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; 85 &lt;span&gt;वर्ष&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आयु&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भांति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रंग&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सृजन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जोश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; 1959 &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यूरोप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थियेटर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अध्यन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वदेश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लौटकर&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;भोपाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; ``&lt;span&gt;नया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थियेटर&lt;/span&gt;´´ &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नींव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रखी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कार्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्नी&lt;/span&gt; ´´&lt;span&gt;मोनिका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt;´´ &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भरपूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहयोग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्राप्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ग्रामीण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भारत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सशक्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आवाज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुलंद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सामाजिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुराई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गहरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुठाराघात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सफदर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाश्मी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतिभाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तराशने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेमिसाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;योगदान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थियेटर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जड़ें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हालांकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भोपाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जुड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहीं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गूंज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भाग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बावजूद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भागों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रदर्शन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अक्सर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दौरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यूं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतांत्रिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यवस्था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जहां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चीज़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वतंत्रता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभिव्यक्ति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वतंत्रता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यहां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दावा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किंतु&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अत्यंत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खेद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रख्यात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाट्यकर्मी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परेशान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;एस&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;एस&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;बीजेपी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुंडो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कसर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाधित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टुच्चे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरीके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रयोग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असामाजिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तत्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चूकते।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोंगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पंडित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिंदू&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धर्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खिलाफ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बताया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जबकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्ण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यवस्था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रहार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भारत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूढ़ियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जकड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;     &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतिभा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सीमित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कविता&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पटकथा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलावा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;उन्होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिल्मों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बखूबी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभिनय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, ``&lt;span&gt;ब्लैक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एंड&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्हाईट&lt;/span&gt;´´ &lt;span&gt;फिल्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्वारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निभाये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बूढ़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दादाजी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किरदार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जिसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कारण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिल्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संवेदना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अमिट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छाप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आमिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिल्म&lt;/span&gt; ``&lt;span&gt;मंगल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पांडे&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राईजिंग&lt;/span&gt;´´ &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहादुर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शाह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जफ़र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किरदार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लघु&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूमिका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निभायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;     &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;याद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बरस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संक्षिप्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुलाकात&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जिसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संक्षिप्तता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज्यादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसलिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्टेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यकीनन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;बल्कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमसफर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;     &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्मीद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हबीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जल्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठीक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जायेंगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रंगमंच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेहतरीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभिनय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होंगे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-5071344732289475736?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/5071344732289475736/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_13.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5071344732289475736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/5071344732289475736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_13.html' title='रंगमंच की चेतना: हबीब तनवीर'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sgpg-qZFBfI/AAAAAAAAACg/aIu1nTFLnpo/s72-c/habib_tanveer.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-6297304199166692934</id><published>2009-05-09T13:13:00.004+05:30</published><updated>2009-05-09T14:24:49.900+05:30</updated><title type='text'>गांधी-गांधी का अंतर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5333742051527051938" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 340px; CURSOR: hand; HEIGHT: 193px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SgVCIvDVSqI/AAAAAAAAACY/oxmyyQFs28I/s320/varun_gandhi.jpg" border="0" /&gt;एक गांधी वो था, जो लंगोटी पहने लाठी लिये, गांव गांव घूमता फिरता था, जिसके लिये हरिजन, मुसलमान या हिन्दू अलग अलग धर्मों के अनुयायी नही थे बल्कि वो तो उन्हे एक ही रूप को जानता था, वो तो उन्हे इंसान के रूप में ही मानता था। और आज एक और गांधी आया है, जिसका लक्ष्य राष्ट्र को जोड़ना नही, बल्कि वो तो सस्ती राजनीति खेलने के लिये, हिन्दू - मुसलमानो को अलग कर देना चाहता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इंदिरा गांधी मेनका को बर्दाश्त नही कर पायीं थीं, उन्हे देश की सत्ता पर अपनी पारिवारिक दावेदारी के लिये, मेनका के रूप में एक खतरा महसूस होता था। उन्होने मेनका को खुद से अलग कर दिया। और मेनका ने भी आर.एस.एस. के संरक्षण में जाने से पहले, आगे-पीछे का कुछ भी नही सोचा। उन्होने नही सोचा, जिस जिस देश में धार्मिक मदांधता राजनीति पर हावी हुयी है, वहां से मानवता का पूरी तरह से सफाया हो गया। मेनका और उनके सगंठन `पीपल फॉर एनिमल्स´ के लिये शायद मानवता सिर्फ जानवरों तक ही सीमित रह गयी है, उन्हे नही दिखाई देते गुजरात के दंगे, वो भूल चुकी हैं कंधमाल को, शायद उनकी आंखो का पानी सूख चुका है। मेनका ने अपने बेटे वरुण को एक ऐसे परिवेश में पाला, जहां चारों तरफ गांघी बापू के आदर्श नहीं, जहां चारों तरफ प्रेम और सौहार्द नही था, बल्कि वहां तो थे वो साम्प्रादायिक नारे जिनके केन्द्र में एक, ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना था जिसमें भरा हो धार्मिक कट्टरवाद। ऐसा कट्टरवाद जरूरी है, आर।एस.एस के लिये अपनी सियासी स्थिति और मजबूत बनाने के लिये। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वरुण गांधी आज जो है, जो जहर आज उसके दिल में भरा हुआ है, उसके लिये जिम्मेदार है, उसकी मां मेनका, और उससे भी ज्यादा `` राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ´´ की नीतियां, जिनके बलबूते संघ ने अपने शिशु मंदिरों से न जाने कितने शिशुओं को अब तक जहरीले नागों में बदला है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमें पता है कि हमारे देश में राजनैतिक चेतना का अभाव है, अभाव न होता तो क्या हम उन दलों को समर्थन देते जो इतनी ज्यादा नफरत के बल पर सियासत करने के लिये जिम्मेदार हैं। हमें आर.एस.एस. जैसी शक्तियों के खात्में के लिये, एकजुट हो जनता के बीच जाना होगा, उन्हे समझाना होगा कि, जिस तालिबान के किस्से हम अब तक सुनते आये थे, आर.एस.एस. के रूप में वो भस्मासुर तालिबान अब हमारे ही बीच पनप रहा है, और यह हमारे देश को उन इस्लामिक कट्टरपंथी राष्ट्रों सी स्थिति में ला खड़ा कर देना चाहता है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-6297304199166692934?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/6297304199166692934/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_09.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/6297304199166692934'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/6297304199166692934'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_09.html' title='गांधी-गांधी का अंतर'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SgVCIvDVSqI/AAAAAAAAACY/oxmyyQFs28I/s72-c/varun_gandhi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-4044835688191464444</id><published>2009-05-03T18:29:00.007+05:30</published><updated>2009-05-03T18:44:03.831+05:30</updated><title type='text'>गुलाल: तालिबान के राज़ का</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sf2WBQ38oFI/AAAAAAAAACQ/UP0Vrf2jqL0/s1600-h/gulal.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5331582482330198098" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 239px; CURSOR: hand; HEIGHT: 335px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sf2WBQ38oFI/AAAAAAAAACQ/UP0Vrf2jqL0/s320/gulal.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span class=""&gt;फिल्मों&lt;/span&gt; का शौक तो बहुत है, लेकिन समय बहुत ही कम दे पाता हूं अपने इस शौक को, शायद यही कारण है कि जो समीक्षा मुझे 13 मार्च को ही लिख देनी चाहिये थी, उसे आज लिख रहा हूं। क्यों क्या हुआ अब तक नहीं समझ पाये कि हम ``गुलाल´´ की बात कर रहे हैं। अनुराग कश्यप फिर से हाज़िर हैं, अपनी एक अलग सी फिल्म के साथ। फिल्म की पटकथा अलगाववादी राजनीति के इर्द-गिर्द चक्कर काटते हुये, समाज के यथार्थ से जुड़े और भी कई ऐसे मुद्धों को उठा जाती है, जो हमें इन पर एक नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर देते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिल्म राजस्थान के एक कस्बे में हॉस्टल की तलाश कर रहे कानून के एक विद्यार्थी दिलीप को दिखाती है, जिसकी उसके कालेज के कुछ गुंडे रैगिंग लेने के बाद एक कमरे में बंद कर देते हैं, जहा ``अनुजा´´ नामक उनकी एक शिक्षिका भी उनकी अभद्रता का शिकार बनने के बाद पहले से ही बंद होती है। बाद में अनुजा भी अपना हास्टल छोड़ दिलीप के साथ ही रहने लगती है, जो अपने दोस्त रणंजय की कोठी पर रह रहा होता है। फिल्म की कहानी उन रजवाड़ों को दिखाती है, जिन्होने लोकतंत्र को स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन उनके सामंती विचार उन्हे वापस अपना राज कायम करने के लिये उकसाते हैं, और इसके लिये वे एक अंडरग्राउंड मूवमेंट लांच कर देते हैं। उस मूवमेंट का मकसद इस राज को कायम करने के लिये एक सशस्त्र संघर्ष को अंजाम देने का था। जनसमर्थन जुटाने के लिये वे लोग छात्र-राजनीति से खुद को जोड़ लेते हैं। पूर्व ``हिस हाईनेस´´ इसे मदद देता है, और अपने बेटे रणंजय को कालेज के जनरल सेक्रेटरी की पोस्ट पर खड़ा कर देता है, उसके विरोध में उसका नाजायज बेटा, अपनी बहन किरण को चुनाव में खड़ा करवा देता है, और उसके सगे बेटे को कत्ल करवा देता है। बेटे की मौत के गम में राजा भी मर जाता है। अब मूवमेंट का सेनापति ``दुक्कन बना´´(केके. मेनन) रणंजय के दोस्त दिलीप को चुनाव मे उसकी जगह उतार देता है। दिलीप चुनाव जीत भी जाता है। किरण और उसका भाई मिलकर साजिश करते हैं, और किरण दिलीप को अपने प्रेमजाल में फांस कर, उसे जनरल सेक्रेटरी की पोस्ट से इस्तीफा दिलवा देती है, और खुद जनरल सेक्रेटरी बन बैठती है, और दिलीप को ठुकरा कर ``दुक्कन बना´´ को फांस लेती है। दिलीप बेचारा इस धोखे को समझ नही पाता, और उन लोगों से भी दूर हो जाता है जो उसे पसंद करते होते हैं, उसके व्यवहार से दुखी हो अनुजा उसे छोड़ जाती है। अंत में दिलीप किरण को दोबारा हासिल करने के चक्कर में दुक्कन को मार डालता है, जब वो किरण के पास जाता है, तो वो बंदूक के जोर पर उससे सच जानने में कामयाब हो जाता है, लेकिन उसके भाई के हाथों मारा जाता है। फिल्म खत्म होती है, राजा के सौतेले बेटे के, मूवमेंट के प्रधान सेनापति बनने के साथ। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिल्म दिखाती है कि किस तरह से सरकार की नाक के नीचे इस तरह के मूवमेंट चलते रहते हैं, और किसी का भनक तक नहीं लगती। फिल्म यह भी दिखाती है, कि भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर चलने वाले इस तरह के आंदोलन, भारत को हिटलरी जर्मनी और तालिबानी अफगानिस्तान की श्रेणी में रख सकते हैं। कदम कदम पर फिल्म में इसकी पुष्टि भी होती है, मसलन एक जगह दुक्कन का यह कहना कि वो एक आदमी को उसी तरीके से फांसी चढ़ा देगा जैसे ``तालिबान ने अफगान राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को चढ़ाया था´´, दूसरे उदाहरण में उस घटना को लिया जा सकता है, जब ``दुक्कन´´ कहीं जा रहा होता है, और उसका भाई ``पृथ्वी´´( पीयूष मिश्रा) हिटलर के अंदाज में उसे ``नाजी सैल्यूट´´ देता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिल्म में पीयूष मिश्रा का रोल काफी सकारात्मक इस मायने में कहा जा सकता है, कि जॉन लेनन टाईप यह गवैया, अपने गीतों के जरिये अपने छोटे भाई पर अपना विरोध दर्ज करवाता रहता है, हालांकी फिल्म के गीतों के बोल भी पीयूष मिश्रा ने ही लिखे हैं। हर गीत कहीं न कहीं प्रतिरोध का गीत कहा जा सकता है, मसलन यह गीत :&lt;br /&gt;``जैसे दूर देश के टॉवर में घुस जाये रे ऐरोप्लेन´´&lt;br /&gt;इस गीत में राणा दुक्कन की तुलना तालिबान और इराक में जबर्दस्ती जा बैठे अंकल सैम, अमेरिका से करता है। लेकिन कई चीज़ें फिल्म में ऐसी है जिनका जवाब मिलना जरूरी है। जवाब इस बात का कि अगर ऐसा कोई अलगाववादी आंदोलन पूरी सैन्यबल के साथ उठ खड़ा होता है, तो उसकी रोकथाम के क्या मुमकिन उपाय हो सकतें हैं, क्या हिंदुस्तान में उठ रही उस तरह की तालिबानी शक्तियों को बढ़ने से पहले ही नहीं रोका जा सकता। दूसरे हमारे समाज में ऐसी कितनी ही महिलायें हैं जो अनुजा की तरह शारीरिक शोषण का शिकार होने के बाद भी, किसी ठोस व्यवस्था के अभाव में उसका मुकाबला नहीं कर पातीं, और अंदर ही घुट कर रह जाती हैं। यह दोनो ही सवाल इस फिल्म मे बड़ी गंभीरता से उठाये गये हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;गुलाल एक ऐसी फिल्म है, जिसका वर्णन किसी समीक्षा में कर पाना कठिन है, इसलिये मेरी सलाह तो भई यही है कि पहले फिल्म देख लें, फिर यह समीक्षा पढ़ें, तभी कहानी का फेर कुछ समझ में आ पायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-4044835688191464444?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/4044835688191464444/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_03.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4044835688191464444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/4044835688191464444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/05/blog-post_03.html' title='गुलाल: तालिबान के राज़ का'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/Sf2WBQ38oFI/AAAAAAAAACQ/UP0Vrf2jqL0/s72-c/gulal.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-2219927781539954913</id><published>2009-04-26T12:12:00.010+05:30</published><updated>2009-04-26T12:36:51.023+05:30</updated><title type='text'>सपनो का भारत</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SfQEWq8XitI/AAAAAAAAACA/3b_iAMXFsqA/s1600-h/india_dreams.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328889046617262802" style="FLOAT: left; MARGIN: 5px 5px; WIDTH: 347px; CURSOR: hand; HEIGHT: 219px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SfQEWq8XitI/AAAAAAAAACA/3b_iAMXFsqA/s320/india_dreams.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;“हम भारत के नागरिक इसे, स्वंयभू , समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, एवं जनतांत्रिक राष्ट्र के रूप में गठित करते हैं…”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/div&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह वो अमर शब्द हैं, जो भारत की मुक्ति की घोषणा करने वाले उसके संविधान पर खुदे हुये हैं। यह शब्द ही वो प्रेरणा थे जिनसे हमें, एक ऐसे भारत का निर्माण करना था जो खुद अपने ही कदमों पर खडा़ हो पाये, एक ऐसा भारत जिसे हर छोटी बड़ी जरूरत के लिये किसी विदेशी शक्ति का मुंह न देखना पड़े। एक ऐसा भारत जो किसी अमीर, किसी उद्योगपति का ही भारत न हो, बल्कि यहां का हर तबका बराबरी का हक पा सके। इन शब्दों की प्रेरणा से ही हमें लड़ना था एक ऐसे भारत के लिये जो किसी धर्मविशेष का न होकर रह जाये, बल्कि यहां का हर धर्म सबूत हो यहां की विविधता, और सौहाद्र का। हमे करना था एक ऐसे भारत का निर्माण जो जनतांत्रिक हो, जहां जनता के बीच से ही उसके चुने हुये प्रतिनिधि, देश का शासन प्रशासन चला पायें। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;क्या हमारा संविधान, उसके अंदर लिखे हुये शब्द महज एक सपना भर थे ? हां सपना तो थे ही ये, सपना, जिसके लिये भगत सिंह फांसी चढ़ गया, सपना जिसके लिये पृथ्वी सिंह आज़ाद जैसे क्रांतिकारी जी जान से लड़ते रहे, सपना जिसके लिये गांधी बाबा देश के भीतर जनआंदोलनो से एक नया जोश डालते रहे, सपना जिसे नये भारत के निर्माताओं को, हमें पूरा करना था। लेकिन आज हम देखते कि यह सपना पूरा होना ता दूर, हम तो पैसे की अंधी दौड़ में उन सिद्धांतो से भी दूर होते चले गये जिनके केंद्र में एक आदर्श भारत के निर्माण का स्वप्न सजा हुआ था। आज तो हम अपने पैरों पर खड़े हाने के लिये भी दूसरों का मुंह ताकते हैं। हम परमाणु ऊर्जा के विकल्पों की अपने देश में ही तलाश नहीं करते, बल्कि उसके लिये पश्चिम का मुंह ताकते हैं, हमारे यहां पर्याप्त मात्रा में थोरियम मौजूद है, हमारे पास ऊर्जा के स्रोत के रूप में नदियां मौजूद हैं, लेकिन तब भी हम व्यर्थ की दलीलें देते हैं, हम देश की चिंता नहीं करते, बल्कि हमे कांग्रेस या बीजेपी जैसे दलों के साथ अपनी वफादारी की ज्यादा चिंता होती है। जंहा तक ऐसे समाज के निर्माण की बात है, जो बराबरी पर आधारित हो, तो हम उससे भी बहुत दूर जाते जा रहे हैं। आज देश की जनसंख्या बढ़ने के साथ साथ, यहां उसी अनुपात में, उच्च क्वालिटी वाले सरकारी विश्वविद्यालय खोले जाने की जरूरत है, लेकिन हम क्या कर रहे है, हम मंहगे प्राईवेट शिक्षण संस्थानो को देश में ला रहे हैं, जिससे समाज के वंचित तबके शिक्षा पा ही नही सकते, और समाज में गैरबराबरी बढ़ती है। जहां तक आरक्षण का सवाल है, तो उससे भी सही ढंग से लागू नहीं किया जा रहा, उसे जात के नाम पर दिया जा रहा है, जिससे जाति से दलित पर हैसियत से अमीर उसका लाभ पा जा रहे हैं, इस आरक्षण को इस ढंग से लागू किया जाना चाहिये कि सही मायने में वंचित इसका लाभ उठा पायें। जहां तक धर्मनिरपेक्षता की बात है, तो वो भी सिर्फ कहने भर की ही रह गयी है, देश के अलग अलग भागों में भड़क रहे सांप्रदायिक दंगे, जिन्हे राजनैतिक दलों और, सरकारों का समर्थन भी प्राप्त होता है, वो एक सौहाद्रपूर्ण भारत के हमारे ख्वाब को भी चूर-चूर कर देते हैं। जहां तक एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का सवाल है, तो हर तरह के पैसे के भूखे लोग, गुंडे और भ्रष्ट नेताओं की फौज से हमारी संसद भरी हुयी है, पैसे के दम पर यह नेता पूरी व्यवस्था को अपने इशारों पर नचाने में कामयाब हो जाते हैं, और अपनी राजनैतिक दलों के साथ वफादारी के नाम पर हम ही इन्हे जिता कर संसद तक पहुंचाते हैं, संसद में बहुत कम ही नेता ऐसे हैं जो वाकई लोगों के लिये कुछ काम करना चाहते हैं, मीडिया और पत्रकारों की फौज तो ऐसी, जिसे जब जी चाहे तब खरीद लो, ``ऑल आर कॉरपोरेट पीपल´´। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अब सवाल यह उठता है कि इस सपनो के भारत के रास्ते में जो इतनी सारी बाधायें मौजूद हैं, उनसे कैसे पार पाया जाये। और इसका हल यह निकलता है कि चाहे विद्यार्थी हों या नौकरीपेशा लोग, चाहे लेखक हों या पत्रकार, हर किसी को सबसे पहले इस देश के प्रति, इस समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, उन्हे हर माध्यम से संवैधानिक आदर्शों की रक्षा के लिये, और सपनो के भारत के निर्माण के लिये संघर्ष करना होगा। साथ ही पैसे के मोह को थोड़ा सा छोड़ना भी होगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-2219927781539954913?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/2219927781539954913/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html#comment-form' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2219927781539954913'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2219927781539954913'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html' title='सपनो का भारत'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SfQEWq8XitI/AAAAAAAAACA/3b_iAMXFsqA/s72-c/india_dreams.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-357418085898182564</id><published>2009-04-15T23:12:00.007+05:30</published><updated>2009-04-18T06:52:18.077+05:30</updated><title type='text'>प्‍यार</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeYdActoPaI/AAAAAAAAAB4/DiCidQAnZmY/s1600-h/Love_heart.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 0px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 310px; height: 325px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeYdActoPaI/AAAAAAAAAB4/DiCidQAnZmY/s320/Love_heart.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5324975502956969378" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बचपन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हालांकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ावों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मायने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदलते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बचपन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गोद&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लाड़&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दुलार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बढ़कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;संगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;याराने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहाड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज़िन्दगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टीले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यूं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युवावस्था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कदम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रखते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तलाश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जिसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहकर&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जिससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बातें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुकून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खालीपन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नीरवता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुलगती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़े&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;बूढ़ों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुंह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ाव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस्से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रेम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उच्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अवस्था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;उसका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वरूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परस्पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गहरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुढ़ापा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बचपन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्मृतियां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्पष्&lt;/span&gt;‍&lt;span&gt;ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;याराने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चर्चा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करेंगे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;फिलहाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वरूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बांटना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूं&lt;/span&gt; , &lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मै&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वक्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महसूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;हिंदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिनेमा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युवाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पसंदीदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टॉपिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिद्धत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कवर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विषय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहानी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अनुपम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लीजिये&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सौंधी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हवा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झोंका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आयेगा&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कब।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यादें&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;उन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मधुर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पलों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यादें&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;सुबह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आसमान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चित्रकारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिद्धत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इंसान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इंसान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आसानी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेता&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समस्याएं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पैदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुलट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जातीं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;इंसान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इंसान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रेम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अक्सर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्मलता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आयाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहते&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;बल्कि&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रेम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अजीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अजीब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चीजों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जोड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सांचे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढालने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोशिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सांचे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढालकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घृणित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समाज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;दोस्तों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;साथियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अक्सर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोलते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; ``&lt;span&gt;उम्मीद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिन्दा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;´´, &lt;span&gt;सोचता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;आखिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्मीद&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेहतर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आस&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सजीव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घटता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाया&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सजीव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जीवित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; ``&lt;span&gt;वो&lt;/span&gt;´´ &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नजदीकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सजीव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हकीकत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थमा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विस्तृत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षितिजों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगमन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धड़क&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धड़कन&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्पंदन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महसूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; ``&lt;span&gt;उम्मीद&lt;/span&gt;´´ &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिन्दा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-357418085898182564?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/357418085898182564/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/blog-post_15.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/357418085898182564'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/357418085898182564'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/blog-post_15.html' title='प्‍यार'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeYdActoPaI/AAAAAAAAAB4/DiCidQAnZmY/s72-c/Love_heart.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-2378900185453097592</id><published>2009-04-07T09:43:00.007+05:30</published><updated>2009-04-07T10:32:47.018+05:30</updated><title type='text'>दि रिर्टन(वोज़व्राशेनिये)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SdrbpgMKIzI/AAAAAAAAAAc/Rcu9T_LmHhM/s1600-h/The+Return+(Vozvrashcheniye).avi_001958720.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5321807415753712434" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 333px; CURSOR: hand; HEIGHT: 186px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SdrbpgMKIzI/AAAAAAAAAAc/Rcu9T_LmHhM/s320/The+Return+(Vozvrashcheniye).avi_001958720.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span class=""&gt;फिल्म&lt;/span&gt; बनाना एक कला है, और यह कला रूस को अपने सोवियत युग से बतौर विरासत प्राप्त हुयी है। आज भी रूसी निर्देशक ऐसी फिल्में बना रहे हैं, जो भावनात्मक रूप से जनता के बीच अपनी पैठ बनाने में सक्षम हैं। अभी पिछले दिनो ऐसी ही एक फिल्म दि रिर्टन देखने का मौका मिला, फिल्म ऐसे दो बच्चों की कहानी है, जिन्हे उनका पिता 12 सालों के बाद मिलता है, और कुछ दिनो तक उनके जीवन पर छा जाता है, लेकिन कहानी का सबसे भावनात्मक हिस्सा तो उसका अंत ही है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;     फिल्म&lt;/span&gt; की शुरुआत होती है, समुंदर में, एक ऊंची मचान से छलांग लगा रहे कुछ लड़कों से। जिसमें से वान्या ऊंचाइयों से घबराता होता है, जबकि उसका भाई आन्द्रेई निडर होता है। इसी बात को लेकर अगले दिन स्कूल में सब वान्या का मजाक उड़ाते हैं, और जब वान्या और आन्द्रेई लड़ते-झगड़ते अपने घर पंहुचते हैं, तो उन्हे 12 साल बाद घर लौट कर आये अपने पिता के आगमन का पता चलता है। आन्द्रेई तो शुरू से ही अपने पिता से हिल जाता है, जबकि वान्या अपने पिता से हमेशा आशंकित रहता है। अब पिता अपने दोनो बच्चों को एक दूर के टापू पर कुछ दिनो की सैर पर लेकर जाता है, रास्ते में वान्या और उसके पिता के सबंध और भी कटु हो जाते हैं, वान्या को हर पल न जाने ऐसा क्यों महसूस होता रहता है कि उसका पिता उनके अच्छे खासे जीवन को तबाह करने के लिये ही वापस आया है, पिता के द्वारा बरते जा रहे कठोर अनुशासन से स्थिति और भी ज्यादा कष्टदायक हो जाती है। जिस दिन इन लोगों को टापू से लौटना होता है, उस दिन वान्या और आंद्रे पिता की इजाजत लेकर समुंदर मे मछली मारने चले जाते हैं, पिता उनका तीन बजे तक लौट कर आने के लिये बोलता है, लेकिन उन्हे लौटते-लौटते सात बज जाते हैं। उनका पिता समुद्र तट पर बैठा उनकी राह देख रहा होता है, और उन्हे देखकर उसके गुस्से की कोई सीमा नही रहती, वो आंद्रे को पीटना शुरू कर देता है, लेकिन छोटा वान्या अपने पिता का छुरा निकाल पिता को भयभीत करने की कोशिश करता है, और अंत में भागकर मचान पर जा चढ़ता है, और ऊपर से दरवाजा बंद कर, मचान से कूद कर जान देने ही वाला होता है, वान्या को बचाने के चक्कर में उसका पिता सौ फीट ऊंची मचान से गिर कर मर जाता है। दोनो बच्चे किसी प्रकार से पिता के मृत शरीर को नाव पर लादने में सफल हो जाते हैं, और जब वे लोग नाव(मोटरबोट) से समुद्र पार कर रहे होते हैं, तो उनकी नाव में किसी समुद्री चट्टान से टकराकर छेद हो जाता है, लेकिन किसी तरह से वे लोग किनारे तक पंहुचने में सक्षम हो जाते हैं। दोनों बच्चे सारा सामान नाव से निकालकर जैसे ही किनार खड़ी गाड़ी में लाद कर वापिस लौटते हैं, तो क्या देखते हैं कि पिता का शरीर जो नाव में ही रह गया था, नाव के साथ किनारे से दूर जा चुका होता है, और डूब रहा होता है, इसी क्षण वान्या के दिल में पिता के लिये सोया हुआ प्यार जाग उठता है, और फिल्म भी यहीं पर, आंद्रे के द्वारा ली गयी तस्वीरों की झलकियों के साथ समाप्त होती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;         फिल्म&lt;/span&gt; को बनाते वक्त एक एक चीज़ को बड़ी बारिकी से उभारा गया है, मसलन जिन जिन जगहों पर इसे फिल्माया गया है, वो किसी बड़ शहर या किसी आलीशान सेट का हिस्सा नहीं, बल्कि वो तो एक छोटा सा देहाती कस्बा ज्यादा प्रतीत होता है, साथ ही फिल्म एक बिल्कुल साधारण से परिवार की कहानी कहती है, जो आपका, मेरा या हममे से किसी का भी हो सकता है। यह छोटी छोटी सी चीज़ें ही फिल्म को आमजन से जोड़ पाती हैं। जब फिल्म समाप्त होने को होती है, तो जिस तरीके से, निर्देशक आन्द्रेई ज़्यागिंत्सेव, शवेत-श्याम चित्रों की झलकियां दिखाते हैं, वो दर्शकों के मन में संवेदना की एक छाप छोड़ देता है, अंतिम चित्र दोनो बच्चों की मां के शोकाकुल चेहरे को दिखाता है, यही सब अगर अभिनय के माध्यम से दिखाया गया होता, तो शायद उसका उतना प्रभाव न होता, जितना इस तरीके का हुआ है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;        आज&lt;/span&gt; के इस दौर में जब हम अपने आसपास के सिनेमा पर नज़र डालते हैं, तो पाते हैं, फिल्मे न जाने कौन कौन सी दुनियाओं की सैर तो हमें करवा रही हैं, लैला मजनू से लेकर सिंह इज़ किंग के लकी- सोनिया तक की जोड़ियां भी हमने देख लीं, लेकिन अब देखना यह है कि आगे हमारा सिनेमा हमे हमारे ही जीवन की कहानियों से, उसकी हकीकतों से कितना जोड़ पाता है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-2378900185453097592?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/2378900185453097592/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2378900185453097592'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/2378900185453097592'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='दि रिर्टन(वोज़व्राशेनिये)'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SdrbpgMKIzI/AAAAAAAAAAc/Rcu9T_LmHhM/s72-c/The+Return+(Vozvrashcheniye).avi_001958720.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1167590115044270640.post-3320984997800362305</id><published>2009-04-06T21:47:00.000+05:30</published><updated>2009-04-06T22:02:45.581+05:30</updated><title type='text'>दिल्ली 6</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SdosJBaxQzI/AAAAAAAAAAM/epbdOvXEIk0/s1600-h/Dilli6.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5321614443202822962" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 319px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SdosJBaxQzI/AAAAAAAAAAM/epbdOvXEIk0/s320/Dilli6.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आज अर्से के बाद एक उम्दा तस्वीर देखने को मिली। वाकई राकेश ओमप्रकाश मेहरा की यह फिल्म  वही घिसेपिटे ट्रैक मोहब्बत को लेकर, साम्प्रदायिक सौहाद्र, आपसी मेलजोल, जैसे प्रेम के कई स्वरूपों का एक अदभुत स्केच खींचती है। फिल्म के गीतों के साथ भी पूरी उन्मुक्तता बरती गयी है, इसके बोल लिखे हैं प्रसून जोशी ने, और संगीत दिया है ऐ.आर. रहमान ने।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;फिल्म&lt;/span&gt; की कहानी दादी और पोते के इर्द-गिर्द घूमती है। दादी अपने पोते के साथ अमेरिका से, चांदनी चौक के अपने पुश्तैनी मकान में लौट आती है, और इसके बाद से कहानी में रंग आना शुरु होता है। फिल्म की शुरूआत में हमें दिखाई देता है कि किस तरह से चांदनी चौक के लोग, अपने अपने अल्ला-राम होने के बावजूद किस प्रकार आपस में प्रेम से रह रहे होते हैं। पूरी फिल्म में यदा-कदा रामलीला के मंचनो का भी बखूबी इस्तेमाल किया गया है। सारे माहौल के बिगड़ने की तबसे शुरुआत हो जाती है, जब रामलीला जैसे सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी सियासी शतरंज की बिसात बन जाते हैं। फिल्म दो युवा दिलों रोशन और बिट्टू के बीच प्रेम को भी बड़ी सुंदरता से चित्रित करती है। अछूतों के प्रति बैरभाव, पुलिस का व्यर्थ का दिखावा/अत्याचार जैसे मुद्दों को भी यह फिल्म बड़ी आसानी से दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर पायी। कुछ बरस पहले, जहां तक मुझे याद पड़ता है, दिल्ली में एक काले बंदर की अफवाह बहुत उड़ी थीं, और खबरिया चैनलों ने इसे अपने मन मुताबिक भुनाया भी बहुत था, इस फिल्म ने भी बंदर वाले इस प्रसंग का भी बहुत जबर्दस्त इस्तेमाल हुआ है, जो हमें हंसाता भी है, और अंत में जाते जाते मानव के अंदर छुपे काले बंदर के काले सच को भी समाज के सामने रख जाता है।वैसे अगर कुल मिलाकर देखा जाये तो, बहुत से लोग इस फिल्म को देखकर यह तो नही कहने वाले कि फिल्म उनके पैसे वसूल नहीं करवा पायी, जी नहीं जनाब यह फिल्म सिर्फ पैसा वसूल ही नही थी, बल्कि यह तो बहुत से ऐसे सवाल हमारे सामने छोड़ गयी, जिन पर अभी हमें सोचना है, और जल्द से जल्द उन समस्याओ का, उन सवालों का हल भी तलाशना है, जिससे कि फिर कोई गोधरा या अयोध्या न हो।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1167590115044270640-3320984997800362305?l=vikshobh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vikshobh.blogspot.com/feeds/3320984997800362305/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/6.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3320984997800362305'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1167590115044270640/posts/default/3320984997800362305'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vikshobh.blogspot.com/2009/04/6.html' title='दिल्ली 6'/><author><name>Pallav</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06891671664869928359</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SeN5G8YmANI/AAAAAAAAABI/1GGQYDZ070Y/S220/pallav.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fwAHj2qiddo/SdosJBaxQzI/AAAAAAAAAAM/epbdOvXEIk0/s72-c/Dilli6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
