विक्षोभ

Saturday, July 9, 2011

जीवन की धूप

एक बार एक बालसुलभ मन, अपनी पुश्तैनी हवेली के पुस्तकालय में पुरानी किताबों को टटोल रहा था, मिखाइल शोलोखोव की एक किताब उसके हाथ लगी, किताब का तो याद नहीं पर उसमें लिखी एक पंक्ति उसके मानस पटल पर सदा के लिए अंकित हो गई, ‘‘मानव की मुक्ति के लिए संघर्श करने वालों को बचपन से ही पुस्तकों के प्रति गहरा अनुराग होता है।‘‘
समय आखिर समय होता है, सूरज और चांद की लुखाछिपी के बीच बचपन का दौर निकल गया, बालसुलभ मन पर किशोरमय चंचलता और जिद छा गई। किताबों की लत ऐसी कि बडे से बडे जुआरी और खिलाडी मात खा गए। कस्बाई इलाकों की डेमोग्राफी कुछ ऐसी रही है कि वहां पाठक वगैरह के मोटे.मोटे थ्रिलर उपन्यास तो कुछ टके खर्चके आसानी से हर नुक्कड पर मिल जाते हैं पर विश्वसाहित्य की अनमोल धरोहरें और ऐसी किताबें जिनपर इंटैलैक्चुअल ठप्पा लगा होता है, कस्बाई देहाती इलाकों में नहीं उपलब्ध होतीं।
किशोर मन को अक्सर सुनने को मिलता था कि आजादी के बाद कुछ कम्युनिस्ट नौजवानों ने इस कस्बे में जनजागरण की जडों को मजबूत करने के लिए ‘‘जनवादी लाईब्रेरी‘‘ बनाई थी, लेकिन ज्यों ज्यों कम्युनिस्ट आंदोलन में दरार पडी लाईब्रेरी भी दरक के न जाने कितने हिस्सों में विघटित हो गई। खैर जिस दौर की हम बात कर रहे हैं, तब सोवियत संघ को टूटे कुछ ही बरस हुए थे और येल्स्तिन को चिंता सता रही थी कि कैसे भी करके कम्युनिस्म के बुखार से रूस को मुक्ति दिला दे, बस जहाज पर जहाज भरकर लाखों की संख्या में बाकी रह गई किताबों को तीसरी दुनिया के देशों में भेजा जा रहा था। लेकिन अफसोस भारत में आया यह किताबों का मानसून भी बस महानगरों में ही बरस कर चला गया और गांव.देहात कस्बाई इलाके भयंकर सूखे की मार झेलते रहे।
खैर भूखा कैसे भी करके अपने भोजन का सुराग लगा ही लेता है किशोर मस्तिष्क ने भी डाक विभाग का पूरा इस्तेमाल करने की ठान ली, दिल्ली, लखनउ , कलकत्ता में बैठे छोटे बडे सभी प्रकाशकों से उसने डाक के जरिए किताबें मंगानी शुरू कर दी थीं। इस तरह से एक ऐसे माहौल में भी जहां आसानी से मानव मस्तिश्क का हास हो सकता है या वह बिल्कुल निकृश्टम प्राणियों में बदल सकता है, किताबों ने इस किशोर मस्तिश्क का परिचय जैक लंदन के अलास्का, ट्वेन की मिसिसिपी, तोलस्तोय के राजनैतिक कैदियों, और शोलोखोव के कज्जाकों से कराया। किताबों ने उसे सोचना सिखाया, कल्पनाओं के घोडे दौडाना सिखाया। हर बार उसे किताबें पंहुचाने आने वाला बूढा डाकिया भी हमेशा किताबों के बंडलों को लेकर उत्साहित रहा करता था और उसे उत्सुकतार रहती थी कि इसके अंदर जाने कौन सी रोचक किताबें हो।
समय बीता, कब कस्बा, वहां के लोग, नुक्कड, बूढा डाकिया पीछे छूट गए पता ही नहीं चला। चेहरे की तरूणाई गायब हो गई और उसका आकार युव ने ले लिया, चिट्ठी तार बेतार सब बीते जमाने की बातें लगने लगीं इनकी जगह ईमेल और एसएमएस ने ले ली। वीपीपी भी ऐसे ही बीते जमाने की चीज बन गया, महानगरों में सारी बढिया किताबें दुकानों पर जो उपलब्ध होती हैं। दुकानों की भी अपनी एक सीमा होती है, वह बाजार द्वारा संचालित होती हैं, जो बाजार का भाव होगा वही दुकान पर माल होगा, यानी सीधे शब्दों में कहा जाए तो जैसा ट्रेंड ग्राहकों को पसंद आ गया दुकानें भी वैसी ही किताबें अपनी रैकों में सजाती हैं, कुछ हट कर करने के लिए व्यापार में कोई जगह नहीं होती।
जीवन की धूप अब कुछ पुरानी सी हो गई थी, जो युव का बसंत था वह जीवन की जेठ में तपने लगा था। चेहरा काम.घर, रोजमर्रा के कलेशों, बीवी की नोक झोंक, बच्चों के बोझ तले दब कर दम तोड रहा था। जवानी की सारी प्रगतिशीलता हवा हो रही थी। किताबों पर से तो धूल की चादर झाडे मानो सदियां बीत गई थीं। खैर जीवन की जलती जेठ के बीच सोचा क्यों न सब कुछ पीछे छोड सन्यास लेकर कहीं दूर चला जाए। चल निकला मुसाफिर लैपटापवा उठाए, जंगल की सैर पर। पहाडों का जंगल, शायद वैली आफ फ्लावर के आसपास कहीं, दूर दूर तक वीरान पसरा हुआ प्रकृति अपने अलंकरण की सारी सीमाओं को पार करती हुई, बस जेठ की दोपहरी में तपे मन को ऐसी शीतलता में क्या चाहिए एक कुटिया के सिवाय। तो वह भी खाली पडी एक कुटिया में टिक गया। जीवन में कहने को इतना कुछ था, और इंटरनेट जैसे संसाधन का सहारा भी, कल का क्लर्क आज का लेखक हो गया, ऐसा लेखक जो जनता के बीच जाकर शोहरत बटोरने में नहीं बल्कि जनता से कट कर एकांत में रहकर खुद की बात कहने में यकीन रखता था।

नोटः माफी चाहूंगा पाठक मित्रों, लिखने कुछ और बैठा था लिख कुछ और गया वह भी शायद अधूरा। मुझे लगता है कि मेरी उंगलियों में भी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस का विकास होने लगा है। इस रचना के लिए जो भी विचार आपके मन में आएं , मैं हमेशा ही जानने के लिए उत्सुक रहूंगा।

चित्र साभार- निकोलाई नोसोव की ''फूलनगर के बौने'' पुस्तिका का मुखपृष्ठ

 
| © 2009-2011 VIKSHOBH | The Content of this site can only be challenged in the legal boundaries of New-Delhi, and no where else in India or Abroad. |